रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोहिंरहीयतनीमनशंका । देननपाइबिभीषणलंका ॥ बोलिउ-
ठौप्रभुकोप्रणपारो । नातरुहोतहैमोमुखकारो॥४७॥विभीषण-
सुंदरीछंद ॥ मैंबिनऊंरघुनाथकरौअब । देवतजोपरिदेवनको
सब ॥ औषधिलैनिशिमैंफिरिआवहि॥केशवसोसबसाथजिआ
वहि॥४८॥सोदरसूरकोदेखतहीमुख॥रावणकेपुरवैसिगरेसुख॥
बोलसुनेहनुमंतकरच्योप्रन । कूदिगयोजहँ औषधिकोबन॥४९॥
टी०-बल कहे सैन बिक्रम पराक्रम ॥ ४६ ॥ प्रभु जो मैं हौं ताको विभी-
षणको लंकदान रूपी जो प्रण है ताको पारोकहे पूरण करौं ॥ ४७ ॥ हे रघु-
नाथ ! जो मैं बिनऊं कहे बिनती करत हौं सो तुम करो हे देव ! सब मिलिकै
परिदेवन जो बिलाप है ताको छोड़ि देहु ॥ “बिलापः परिदेवनमित्यमरः”॥४८॥
प्रथम कह्यो है कि औषधि लै कै निशिहींमें फिरि आवै ताको हेतु कहत हैं सोदर जे
लक्ष्मण हैं सूर जे सूर्य हैं तिनको मुख देखतही रावणके सिगरे सुख पुरवैं कहैं
पूरित करिहैं अर्थ सूर्योदय भये लक्ष्मण न जीहैं या प्रकारको विभीषणको बोल
सुनिकै निशिहीमें हम औषधि ल्याइ हैं हनुमंत यह प्रण करचो ॥ ४९ ॥
मू०-रागषट्पद ॥ करिआदित्यअदृष्टनष्टयमकरौंअष्टबसु ।
रुद्रनबोरिसमुद्रकरौंगंधर्बसर्वपसु ॥ बलितअबरेकुबेरबलिहि-
गहिदेउंइन्द्रअब । विद्याधरनिअबिद्यकरौंबिनसिद्धिसिद्धसब ॥
निजहोहिदासिदितिकीअदितिअनिलअनलमिटिजाइजल ।
सुनि सूर जसूरजउदतहींकरौं असुरसंसारबल ॥ ५० ॥ भुजंग-
प्रयातछंद ॥ हन्योबिघ्नकारीबलीबीरबामैं । गयोशीघ्रगामी-
गयेएकधामैं ॥ चल्योलैस बैपर्बतैकैप्रणामैं ॥ नजान्यो-
बिशल्यौषधीकौनतामैं ॥ ५१ ॥
टी०-रामचन्द्र सुग्रीवसों कहत हैं कि जो सूर्य उदयको प्राप्त होई तौ जेते
देवता हैं तिनकी सबकी आयुर्दशा करौं औ देवनके शत्रु जे असुर दैत्यहैं तिनको
बल संसारभरेमों करि देउं अर्थ तीनों लोकमें दैत्यनको राज करि देउं दिति
दैत्यनकी माता अदिति देवनकी माता ॥ ५० ॥ बामकहे कुटिल ऐसा जो