रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशप्रकाशः १८. (१८३)
रिसभागीं । गावनबीनबजावनलागीं ॥ जागिउठोतबहींसुर
दोषी । क्षुद्रक्षुधाबहुभक्षणपोषी ॥ ४ ॥
टी०-कुम्भकर्णको औ मेघनादको काल कहे मृत्यु वर्णिवो ॥ १ ॥ साधन
कहे जयसिद्धिके उपाय ॥ २ ॥ साधन कहे जगाइवेको यत्न ॥ ३ ॥ यह
महादेवसे वर रह्यो हैं कि देवांगननको गान सुनि कुंभकर्ण अकालहूमें जागि है
तासों जब देवांगना आइ गावन लागीं तब जाग्यो ॥ यथा ॥ हनुमन्नाटके ॥
“निद्रां तथापि न जहाँ यदि कुंभकर्णः श्रीकंठलब्धवरकिन्नरकामिनीनाम् ॥
गंधर्वयक्षसुरासिद्धवरांगनानामाकर्ण्य गीतममृतं परमं विनिद्रः” ॥ ४ ॥
म०-नराचछंद ॥ अमत्तमत्तदंतिपंक्तिएककौरकोकरै । भु-
जापसारिआसपासमेयबोपसंहरे ॥ बिमानआसमानकेजहां
तहांभगाइयो । अमानमानसोदिवानकुंभकर्णआइयो ॥ ५ ॥
रावण ॥ समुद्रसेतुबांधिकैमनुष्यदोइआइयो ॥ लियेकुचालि
वानरालिकंकअंकलाइयो ॥ मिल्योबिभीषणौनमोहितोहिंनें-
कहूडरेउ । प्रहस्तआदिदैअनेकमंत्रिमित्रसंहरेउ ॥ ६ ॥ करो
सोकाजआशुआजचित्तमैं जोभावई । असुरूयहोइजीवजीव
शुक्रसुख्यपावई ॥ समेतिरामलक्ष्मणैसोबानरालिभक्षिये ।
सकोसमंत्रिमित्रपुत्रधामग्रामरक्षिये ॥ ७ ॥
टी०-मान (गर्व) दिवान (सभा) ॥ ५॥ बानरालिको लंकके अंक कहे
गोदमें लायो है अर्थ लंकके मध्यमें प्राप्त कियो है अथवा जो पुरी काहू कबहूं न
घेरचौ ताको घेरिकै अंक कहे कलंक लायो है यामें रामचंद्रके बलको वर्णन है
निंदा नहीं हैं तासों सरस्वती उक्तार्था नहीं कियो ॥ ६ ॥ ऐसो काज करौ जासों
देवतनको विघ्न हो जीव जे बृहस्पति हैं ते असुरूय होइ औ हमारो जय होइ
शुक्र सुख पावैं सरस्वती उक्तार्था राम लक्ष्मण समेत या बानरालिको भक्षिये
कहे भक्षण करि सकियत है अर्थ नहीं भक्षण करि सकियत काहेते अनेक नर
वानर हम भक्षण करे हैं इनको सेतुबंधनादि कर्म देखिकै हमारो जीव अति डरो
है ताते कोष कहे खजाना सहित मंत्र्यादिकनको रक्षिये कहे रक्षण करि सकित
है अर्थ नहीं रक्षण करि सकियत अर्थ ये हमको सबको मारि ग्रामादि लेन
चाहत हैं ॥ ७ ॥