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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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( १६६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
निहैहयराजकियो । हैहयकौनवह्रैबिसरचोजनखेलतहीतुलैं
बांधिलियो ॥ १२ ॥
टी०-जा स्त्रीके संग राज्याभिषेक होइ सो देवी कहावै ॥ "देवी कृताभिषेका-
यामित्यभिधानचिंतामणिः"॥१०॥ कल्पांतके अंतमें ब्रह्मा सृष्टि रचत हैं विष्णु
रक्षा करत हैं सो ताहि कहे लोक सृष्टिको औ देवेश इन्द्र औ विष्णु औ ब्रह्मादि
दै जे देव हैं तिन्हें रुद्र जे महादेव हैं ते भू जो भौंहहै ताके भंगही टेढ़ी करनेहीसों
संहारकालमें संहारकरि डारत हैं ॥ ११ ॥ छत्र कहे छत्रवर्णः ॥ १२ ॥
मू०-अंगद-विजयछंद ॥ सिंधुतरयोउनकोबनरातुमपैध-
नुरेखगईंतरी । बांध्योइबांधतसोनबँध्योउनबारिधिबांधिकै
बाटकरी ॥ अजहूँरघुनाथप्रतापकीबाततुन्हेंदशकंठ Santana जानिप-
री। तेलनितूलनिपूंछिborder/जरीनजरीजरीलंकजराइपरी ॥ १३ ॥
मेघनाद् ॥ छांडिदियोहमहींवनरावहपूंछकीआगनलंकज री ।
भीरमेंअक्षमत्र्योचपिबालकवादिहिंजाइप्रशास्तिकरी ॥ ताल
बिंधेअरुसिंधुबँधेयहचेटकविक्रमकौनकियो । बानरकौनरकौ
वपुरापलमँसुरनायकबांधिलियो ॥ १४ ॥
टी०-बांध्योई कहे हनुमानको बंधन तुम काहूविधिसों करिबोहू करचौ ताहू
पर बांधत ना बन्यौ तेल औ तूल कहे रूईयुक्त जो वस्तु होतिहै सो विशेष जरति
है सो या प्रकारकी पूंछ तुम करी सो ना जरी औ केवल सुवर्ण औ रत्ननमें अग्नि
प्रज्वलित नहीं होति परंतु तुम्हारी लंका तृणादि रहित केवल रत्नादिके जरायमों
औौ जरत भई रामके प्रभावसों ऐसी अनहोनी बातें होंती हैं ताहूपर तुम्हें नहीं
जानि परत इतिभावार्थः ॥ १३ ॥ वादि कहे वृथा प्रशास्ति कहे स्तुति सप्तताल
बेध्यो औ सिंधु बांध्यो यह चेटक कहे भगरविद्या है सरस्वती उक्तार्थः ॥ जो
रामचन्द्र तालवेधन सिंधुबंधन करचौ सो तो चेटक कहे भगर विद्यासम है अर्थ खेल
समहै यामें कौन विक्रम कहे अतिबल कियौहै ॥ "विक्रमस्त्वतिशक्तिता इत्यमरः” ॥
अर्थ वै चाहें तौ त्रैलोक्यको संहार करिदारें सिंधुबंधादि सदृश कर्मनमें उनको
कौन श्रम है ऐसे प्रबल वे ना होते तौ जिन हम पलमें सुरनायकको बांधि लियो
ते बानर औ नरको वपुरा है जाते अर्थ हम इंद्र लोकादिमें जाइकै इन्द्रादिको

षोडशप्रकाशः १६. ( १६७ )

जीत्यौ औ वै हमपर चढ़ि आये हैं हम वपुगसम कछु करि नहीं सकत अथवा वपुरा
समुझि हमपर चढ़िआये हैं ॥ १४ ॥
मू०-अंगद ॥ चेटकसोंधनुभंगकियोप्रभुरावरेकोअतिजीर-
नहो । बाणसमेतरहपचिकैतुमजासपैंनतज्योथलुहो ॥ बाण
सुकौनबलीवालिकेसूतवैबलिबावनबांधिलियो। ओइसोतौजिन
कीचिरचेरिननाचनचाइकैकैछांडिदियो ॥१५॥ रावण ॥ नील
सुखेनहनू उनकेनलऔरसबैकपिपुंजतिहारे । आठहु आठदिशा
बलिदैअपनोपदुलैपितुजालगिमारे ॥ तोसेसपूतहिजाइकैकैवालि
अपूतनकीपदवीपगुधारे । अंगदसंगलेमैरो सबैदलआजुहिक्यों
नहैनवपमारे ॥ १६ ॥ दोहा ॥ जोसुतअपनेबापको, बैरनलेइ
प्रकाश । तासोंजीवतहीमरचो, लोगकहैंतजि त्रास ॥ १७॥
टी०-कवित्तमें उक्ति मेघनादकी है औ जवाब रावणको अंगद दियो ता
जवाबहीसों या जानो कि रामचन्द्र सिंधुबंधनादि मम शंभु धनुषभंग चेटकहीसों
कियो है यह बात रावण कह्यो है अंगद कहत हैं कि प्रभु जे रामचन्द्र हैं तिन
चेटकसों धनुष भंग कीन्हौं औ तुम कहत हौ कि जीरण कहे पुरानो रहै परन्तु
तुमको पुरानो तो रहै पै बाणसमेत तुम पश्रम करि पचिकै कहे थकि कै
रहिगये ताहूपर थलहू ना छांडयो अर्थ रंच ना उठयों ॥ १५ ॥ नील, सुखेने,
हनूमान औ सुग्रीव औ राम लक्ष्मण औ विभीषण ये जे आठ हैं [अस्पष्ट]
नील सुखेनादि चारि वानर उनके सुग्रीवके हैं ते वालिके भयसों भागि रहे तब
संगरहे यासों या जनायो कि जो रामचन्द्र आज्ञाहूं करें औ तिनहीकि मोहसों तिनहीं
वै तिहारो राज्य न दियो चाहैं तौ सब वानर तेरेई साथी है हैं तासों तू आठहूं
आठ दिशा बलिद जे रामचन्द्र हैं आठ दिशनके आठ जो इन्द्रादि दिक्पाल हैं ते
हैं बलिदकहे भेंटक दाता जिनके अर्थ इन्द्रादि दिक्पाल जिनकर भेंट देतहैं तिनहीं
सों आपनो पद जो राज्यहै ताको ले जाके लिये सुग्रीव तिहारे पितुको मारिडारचो
है काहेते राज्य तिहारे पिताको है रामचन्द्र मर्यादापुरुषोत्तम हैं जो तू कहिहै तौ
तोकों विशेष देहं । “बलिदैत्योपहारयोरित्यभिधानचिन्तामणिः” ॥ बापमारे कहे
जो तेरे बापको मारचो है ॥ १६ ॥ १७ ॥

मू०-अंगद॥इनकोबिलगुनमानिये,क‍हिकेशवपलआधुपानी
पावकपवनप्रभु, ज्योंअसाधुत्योंसाधु॥१८॥रावण॥द्रुतविलंबि
तछंद॥ उरसिअंगदलाजकछूगहौ।जनकघातकवातवृथाकहौ॥
सहितलक्ष्मणरामहिंसंहरौ। सकलवानरराजतुम्हेंकरौ ॥१९॥
टी०-बिलगु कहे द्वेष साधु कहे भलो असाधु कहे बुरो ॥ १८ ॥ जनक
पिता सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे अंगद तुम रामचन्द्रसों मिलिबेकों हमकों कहत हौ
यामें तुमको कछु लाज नहीं होत ऐसी बात कहि कछु लाज तौ उरमें गहौ काहेते
कि तुम्हारे जनक बालि तिनके जे घातक रामचन्द्र हैं तिनकी बात वृथा है यह तुम
कहौ अर्थ रामचन्द्रकी बात वृथा नहीं होति जो मनमें संकल्प करतहैं सो करिबोई
करत हैं यासों या जनायो कि अति बली बालिके वध करिबेको संकल्प कियो सो
वध करिबोई कियो तैसे वै तो हमारे मारिबेको संकल्प करै हैं यह संकल्प वृथा काहू
उपायसों न ह्वै है तासों मैं लक्ष्मण सहित रामहिसों संहरौं कहे संहारनाशकों प्राप्त
होत हौं अर्थ लक्ष्मण सहित राम मोहिं मारतहीहैं नहीं तो ऐसो हित सीख तुमको
दियो है जासों सब वानरनको राजा तुमको करौं अर्थ सुग्रीवसों छोरि तुम्हारो
राज्य तुम्हें देऊँ अथवा जनकघातक जे सुग्रीवहैं तिनकी बात वृथा कहत हौ
अर्थ जो तुम्हारे पिताको मारचो ताकी तुम बड़ाई वृथा करत हौ मैं लक्ष्मण सहित
राम करिकै संहरौं कहे नाश कों प्राप्त होत हौं नहीं तो सुग्रीवको मारि सब वान-
रनकौ राजा तुमकों करौं ॥ १९ ॥
मू०-अंगद-निशिपालिकाछंद ॥ शत्रुसबमित्रहमचित्तपाहिं
चानहीं । दूतविधिनूतकबहूंनउरआनहीं ॥ आपुमुखदेखि
अभिलाषअभिलाषहू । राखिभुजशीशतबऔरकहँराखहू
॥ २० ॥ रावण-इन्द्रवज्राछन्द ॥ मेरीबड़ीभूलसोकाकहौंरे ।
तेरोकह्योदूतसबैसहैंरे ॥ वैजोसबैचाहततोहिंमारचो । मारों
कहातौहिंजो दैवमारचो ॥ २१ ॥ अंगद-उपेन्द्रवज्राछन्द ॥
नराचश्रीरामजहींधरैंगे। अशेषमाथेकटिभूपरैंगे ॥ शिखाशि-
वाश्वानगहैंतिहारी । फिरैंचहूँवोरनिरैविहारी ॥ २२ ॥

षोडशप्रकाशः १६. ( १६९ )

टी०-तुम्हारी जो यह नूतन कहे नवीन दूतविधि कहे दूतता तोर फोर है ताको
कबहूं न उरमें आनि हैं पाइ है ॥ २० ॥ २१ ॥ नराच वान निगैंविहारी राव-
णको संबोधन है अथवा शिवा औ श्वान औ और जे निगैविहारी काकादि हैं ते
तिहारी शिखा गहे तिहारे शिरको लिये फिरेंगे ॥ २२ ॥
मू०-रावण भुजंगप्रयातछन्द ॥ महामीचुदासीसदापाईँ-
धोवै । प्रतीहारहै कै कृपाशूरसोवै ॥ क्षपानाथलीनहेरहैछत्र-
जाको । करैगो कहाशत्रुसुग्रीवताको ॥ २३ ॥ सकामेघ-
माला शिखीपाककारी । करैकोतवालीमहादंडधारी ॥ पढ़ैवेद
ब्रह्मासदाद्वारजाके । कहाबापुरोशत्रुसुग्रीवताके ॥ २४ ॥
टी०-अंगदकहो कि श्रीराम बाण धरिकै तुमको मारिहैं ताको उत्तर रावण
दियो कि महामीचुजो है सो मेरे सदा पाईं धोइवेके अर्थ दासीहै याते अति
न्यूनदासी जनायो एकशत एक मीचु हैं तामें शत अकालमीचु हैं एक महामीचु
है शतमीचु उपायोंसों दूरि होती हैं एक महामीचु काहू उपायोंसों नहीं मिटति ।
यथा भावप्रकाशे “एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रयच्छते । तत्रैकः कालसंयुक्तः
शेषास्त्वागंतवः स्मृताः” । यामों या जनायो कि युद्धादिमें मरिबो तो अकाल-
मृत्यु है सो मेरे समीप कैसे आइ है ॥ २३ ॥ सका कहे सक्का पाककारी रसों-
ईदार ॥ २४ ॥
मू०-अंगद-विजयछन्द ॥ पेटचढ़्योपलनापलिकाचढ़िपा-
लकिहूचढ़िमोहमढ़योरे । चौकचढ़्योचित्रसारीचढ़्योगजवा-
जिचढ़योगढ़गर्बचढ़योरे । व्योमविमानचढ़्योईसहाकलिनि-
वसोंकबहूंनपढ़योरे । चेततनाहींरह्योचढ़िचित्तसोंचाहतमूढ़
चिताहूचढ़योरे ॥ २५ ॥
टी०-प्रथमहिं पेटमें चढ्यो कहे गर्भमें आयो जब जन्म भयो तब पलनामें
चढिकै झूल्यो कछू और बडो भयो पलिका जो खट्टा है तामें चढि सोवन
लाग्यो औ जब व्याह भयो तब पालकीमें चढि व्याहने चल्यो तब मोह जो
माया है तामें मढ्यो कहे युक्त भयो फेरि पाणिग्रहणमें चौकमैं चढ्यो फेरि
स्त्रीके संग चित्रसारीमें चढ्यो फेरि राजा हैकै गजवाजिमें चढ्यो औ गढपर

( १७० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चढ्यो औ गर्वपर चढ्यो अर्थ राज्याभिमान भयो औ जेहि कहे जाते अर्थ जाकी
कृपासों व्योममें विमानन पर चढ्योई रह्यो अर्थ पुष्पकादि विमानन पर चढ्यों
आकाश आकाश फिरत रह्यो केशव कहत हैं कि सो जो वह प्रभु रामचन्द्र हैं
ताकों कबहूं न पढ्यो अर्थ राम नाम कबहूं न जप्यो सो हे मूढ ! अब चिताहू
पर चढ्यो चाहत हैं ताहू पर तेरी चित्त चढि रह्यो हैं कहे मत्त है रह्यो है तामें तू
चेतत नहीं अर्थ चेत नहीं करतो चिताहूमें चढ्यो चाहत है यह कहि या जनायो
कि रामचन्द्र तोहि शीघ्रही मारि हैं तासों उनके शरणमों जाइकै आपनो
भलो करु ॥ २५ ॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद ॥ निकारयोजोमैं पालियोरा-
जजाको । दियोकाढिकैजूकहात्रासताको ॥ लियेबानराली-
कहौंबाततोसों। सोकैसेलरैरामसंग्राममोसों ॥ २६ ॥ अंगद-
बिजयछन्द ॥ हाथीनसाथीन

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षोडशप्रकाशः १६. ( १७१ )
ताकी आली कहे समूह अर्थ जिनमें अनि अग्नि है ऐसे बाण लिये हैं अथवा र
कहे तीक्ष्ण जे बाण हैं तिनकी आली कहे पंक्तिसमूह इनि तिनको लिये हैं सो
रामचंद्रके संग्राममों मोसों कहे हम ऐसो प्राणी कैसे जुरै अर्थ हम उनके युद्ध
करिवे लायक नहीं हैं। 'रस्तीक्ष्णे दहने इत्यभिधानचिंतामणिः।' 'पुस्यालिविश-
दाशये त्रिषु स्त्रियां पश्यायां सेतौ पंक्तौ च कीर्तिता' इत्यभिधान चिंतामणिः॥२६॥
वित्त धन ॥ २७॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद॥ डरैगायविप्रैअनाथैजोभाजै।
परद्रव्यछोडैपरस्त्रीहिलाजै॥ परद्रोहजासों नहोवैग्तीको। मुकैसै
लरैवेषकीन्हैयतीको॥२८॥ दोहा॥ गेंदकरेउमैंखेलको, हरगिरि
केशौदास। शीशचढायेआपने, कमलसमानसहास॥ २९ ॥
टी०-जे रामचन्द्र गाय औ विप्रको डगत हैं अथ अतिदीन गाय औ विप्र
तिनहूँको डरात हैं तासों अति कादरहैं औ अनाथ जे प्राणी हैं जिनकी नाथ
कोऊ नहीं है ताहीको भजै कहे सेवन करत हैं अर्थ ताहीसों संग करत हैं यामों या
जनायो कि भयसों रंचकहूँ परद्रव्य नहीं लै सकत हमारो राज्य कैसे लें हैं औ पर
स्त्रीको लजातहैं यासों या जनायो कि जे स्त्रीको लजात हैं ते वीरनसों कहा
धृष्टता करि हैं औ जिनमों परद्रोह कबहूं रत्तीहूभरीनाहीं हैं सकत आशय कि शत्रुता
करते डगतहैं औ ताहूपर वेष यती तपस्वीकी घरेहैं अर्थ वेषहू वीरको नहीं है सो
मोसों कैसे लरि हैं सरस्वती उक्तार्थः-मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तासों ब्रह्मशाप गोशापको
डेरातहैं भृगु लातहू मारचो ताहू पर कछू ना करचो अनाथ जे प्रह्लाद सम्भादि हैं
तिनके निकट ही रहे जा भांति कष्ट भयो ताही विधि निकट वर्गी...
औ परद्रव्य परस्त्री हरनमें पाप होत है तासों त्याग करत हैं औ परद्रोह कासों
रत्तीहूभरि नाहीं होत यासों समदर्शी जानां सबको समान हैं तिनसों हम कैसे
लरैं अर्थ वै ईश्वर हैं वेष कहे रूप मात्र यती को कीन्हे हैं ॥ २८॥२९॥
मू०-अंगद-दंडक ॥ जैसोतुमकहतउठायोएकगिरिवरऐसे
कोटिकपिनकेबालकउठावहीं। काटेजोकहतशीशकाटतघनेरे
घाघभगरकेखेलेकहाभटपदपावहीं ॥ जीतयोजोसुरेशरणशा-
पऋषिनारिहीकोसमुझहुहमद्विजनातेसमुझावहीं । गहौराम
पायँसुख पाइकैरंतपी तप सीताजूको देहु देव दुंदुभी बजा-

( १७२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

दर्दी ॥३०॥ रावण-वंशस्थछंद॥ तपीजपीबिप्रनिछिप्रहीहरौं ।
अदेवद्वेषीसबदेवदंसहरौं ॥ सियानदेहौंयहनेमजीधरौं । अमा-
नुषीभूमिअवानरीकरौं ॥३१॥ अंगद-विजयछंद ॥ पाहनते
पतिनीकरिपावनटूककियोहरको धनुको रे। छत्रबिहीनकरे
क्षणमेंक्षितिगर्वहर्यौतिनकेबलको रे ॥ पर्वतपुंजपुरैनिकेपात
समानतरेअजहूंधरको रे । होइँनरायणहूँपै नयेगुणकौनईहां
नरवानरको रे ॥ ३२ ॥ रावण-चंचरीछंद ॥ देहिंअंगदरा-
जतोकहंमारिवानरराजको।बांधिदेहिंबिभीषणै अरुफोरिसेतुस-
माजको ॥ पूंछजाराहंअक्षरिपुकीपाइंलागहिंरुद्रके । सीयकोत-
वदेहूरामहिंपारजाइंसमुद्रके ॥ ३३ ॥
टी०-घाघ कहे नटादि इंद्रजालिका॥ ३०॥ सरस्वती उक्तार्थः-हे अंगद !कहै केशव
हौं कि तपी औ जपी जे विप्रहैं अथवा तपी औ जपी औ विप्रनको छिमहीं हरौं
कहौं कि तपी औ जपी जे विप्र हैं अथवा तामें कछूविचार नहीं करत औ अदेव
जे दैत्य जे राक्षस हैं तिनके द्वेषी शत्रु देवता हैं तिन्हें छिमहीं संहरत हौं कहे मारतहौं
यासों हौं बडो पापीहौं सो सियाको न देहौं यह नेम जो जीमें धरतहौं सो अब कहे
या समयमों अमानुषी कहे नाहीं हैं मानुष्य जहां औ अनरी कहे नाहीं हैं कोऊ
काहू को अरि शत्रु जहां ऐसी जो भूमि कहे स्थान है विष्णुलोक ताको करों कहे
साधत हौं । 'भूमिः क्षितौ स्थानमात्रे' इति अभिधानचिंतामणिः । ब्रह्मदोष देव-
दोषादि बडे पातकनसों छूटिबेको उपाव और नहीं है तासों सीताको नहीं देतो
कि सीताके लिये आइकै रामचंद्र मोहिं मारिहैं तौ सब पातकनसों छूटिकै
विष्णुलोक जैहौं इति भावार्थः ॥ ३१ ॥ अजहूं कहे अबहूं अर्थ एतेहूपर तौ
धरकौ कहर करौ ॥ ३२ ॥ सरस्वती उक्तार्थः यामें प्रहस्तादि मंत्रिनप्रति का-
कोक्ति है रावण कहत है कि हे अंगद ! तुम तौ नीकी शिष देतहौ परंतु प्रह-
स्तादि मंत्रिनकरि दी कर्मवश मेरी ऐसी दुर्मति है कि जब रामचंद्र येती बातें
करें तब सीताको देहुं सो ऐसो काहेको कैहैं तासों दुर्मति कृत हमारी मृत्यु विशेष
सो ह्वै चुको यह निश्चय जानौं ॥ ३३ ॥
मू०-अंगद-लंकालाइगयो बलीहनुमंतसंतनगाइयो ॥ सिंधु
बांधतशोधिकैनलंकछीरछीटबहाइयो । ताहितोहिंसमेतअंधउ-

( १७३ )

खारिहौंउलटीकरौं। आजुराजकहाँविभीषणबैठिहैं तेहितेडरौं॥
॥ ३४ ॥ दोहा ॥ अंगदरावणकोमुकुट, लैकरिउड्योसुजान ।
मनोचलोयमलोकको, दशशिरकोप्रस्थान ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिन्द्र-
जिद्विरचितायामंगदरावणसंवादवर्णनं नाम षोडशः प्रकाशः ॥ १६ ॥
टी०-क्षीर कहे जल ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायतजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां अंगदसंवादवर्णन नाम षोडश प्रकाशः ॥ १६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्रहवेंप्रकाशमें, लंकाकोअवरोध । शत्रुच-
मूवर्णनसमर, लक्ष्मणकौ परबोध ॥१॥ अंगदलैवामुकुटको, परे
रामकेपाइ ॥ रामविभीषणकेशिरसि, भूषितकियोबनाइ ॥ २ ॥
मू०-पद्धतिकाछंद ॥ दिशिदक्षिणअंगदपूर्वनील ॥ पुनि
हनूमंतपश्चिम सुषेण ताल ॥ दिशिउत्तरलक्ष्मणसहितराम । सुग्रीव
मध्यकीन्हेविराम॥३॥ सँगयूथपयूथपवलबिलास । पुरफिरत
विभीषणआसपास ॥ निशिवासरसबकोलेतसोध । यहिभांति-
भयो लंकानिरोध ॥४॥ तबरावणसुनिलंकानिरोध । उपजौत-
नमन अतिप्रचंडक्रोध ॥ राख्योप्रहस्तहठिपूर्वपौरि । दक्षिणहिं-
महोदरगयोदौरि ॥५॥ भयोइंद्रजीतपश्चिमदुवार । हैउत्तरराव-
णबलउदार । कियोबिरूपाक्षथितमध्यदेश । कैरॅनरान्तकच-
हुंचाप्रवेश ॥६॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ अतिद्वारद्वारमहँयुद्धभये ।
बहुऋच्छकंचरनलागिगये ॥ तबस्वर्णलंकमहँशोभभई। जनुअ-
ग्निजवालमहँधूममई ॥ ७ ॥
टी०-अवरोध घेरनो औ विभीषणकरि शत्रु जो रावण हैं ताके चमूको वर्णन
है परमोत्कर्ष ॥ १ ॥ २ ॥ रामचंद्रके औ लंकाके मध्यमें सुग्रीव विश्राम
कीन्हे हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ छंद उपजातिहै ॥ ७ ॥

( १७४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मू०-दोहा ॥ मरकतमणिके शोभिजै, सबैकँगूरचारु ॥
आइगयो जनुदानको, पातककोपरिवारु ॥ ८ ॥ कुसुमविचित्रा
छंद ॥ तवनिकसोरावणसुतशूरो । जेहिरनजीत्योहरिखलपू-
रो ॥ तपबलमायातमउपजायो। कपिदलकेमनसंभ्रमछायो ॥
॥ ९ ॥ दोधकछंद ॥ काहुनदेखिपरेवहयोधा । यद्यपिहैंसिगरे
बुद्धिबोधा ॥ शायकसोंअहिनायकसाध्यो । सोदरस्योरघुना-
यकबांध्यो ॥ १० ॥ रामहिंबांधिगयोजबलंका । रावणकी
सिगरीगईशंका । देखिबंधेतबसोदरदोऊ । यूथपयूथत्रसेसब-
कोऊ ॥ ११ ॥ स्वागताछंद ॥ इंद्रजीततेहिलैउरलायो । आ-
जुकाजसबमोमनभायो ॥ कैबिमानअधिरूढतिधाये। जानकी
हिरघुनाथदेखाये ॥ १२ ॥ राजपुत्रयुतनागनिदेख्यो । भूमि-
युक्तरुचंदनलेख्यो ॥ पन्नगारिप्रभुपन्नगसाईं । कालचालक-
हुजानिनजाई ॥ १३ ॥ दोहा ॥ कालसर्पकेकवलते, छोरत-
जिनकोनाम॥ बँधेतेब्राह्मणवचनवश, मायासर्पहिराम ॥१४॥
टी०-कंगूरनमें ऋक्ष लपटे हैं तासों मानों मरकत मणिहीके कंगूरा शोभित
हैं पातक देवदोष ब्रह्मदोषादि ॥ ८ ॥ हरि इन्द्र ॥ ९ ॥ बुद्धि बोधाकहे बुद्धि-
युक्त ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ तेहि रावण इंद्रजीतको उरमें लगायो ॥ १२ ॥
भूमिमें युक्त कहे गिरे चंदन वृक्षहू नागयुक्त रहतहैं दुःखयुक्त सीता यह कहत
भई कि हे पन्नगारिप्रभु ! हे पन्नगसांई ! पन्नग जे सर्प हैं यात... अरि कहे
भक्षक जे गरुड हैं तिनके तुम स्वामी हौ यासों या जनायो कि तुम्हार वाहनजे
गरुड हैं. ते अनेक सर्प भक्षण करतहैं औ पन्नगसांई कहि या जनायी कि तुम
सदा सर्प ही पर सोयो करत हौ ते तुम नागपासमें बाँधे हौ तौ काल जो समयहै
ताकी चाल कछू जानि नहीं परति वलाबल समय ही नत उन्नतको उन्नत नत
करत है इति भावार्थः ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ पन्नगारितबहींतहँआये । कालजाल-
सबमारिभगाये ॥ लंकमांझतबहींगइसीता । आनन्दकंदनव-

लोकिसुगीता ॥ १५ ॥ गरुड-इंद्रवज्राछंद ॥ श्रीरामनारा-
यणैलोक कर्त्ता । ब्रह्मादिरुद्रादिकैदुःखहर्त्ता ॥ सीतेशमोको-
कछूदेहुशिक्षा । नान्हींबडीईशजोहोइइक्षा ॥ १६ ॥ राम ॥
कीबेहुतोकाजसबैसोकीन्हों । आयेइहांमोकंसुखदीन्हों ॥
पांलागिबैकुंठप्रभाविहारी। स्वर्लोकगोततक्षणविष्णुधारी॥१७॥
इंद्रवज्राछन्द ॥ धूम्राक्षआयोजनुदंडधारी।ताकोहनूमनभयेप्र-
हारी॥जितेअकंपादिबलिष्ठभारे।संग्राममें अंगदवीरमारे ॥१८॥
उपेंद्रवज्राछंद ॥ अकंपधूम्राक्षहिजानिजूस्यो । महोदरैरावण-
मंत्रबूझ्यो॥सदाहमोरतुममंत्रबादी।रैकहहोतैअतिही विषादी ॥
टी०-॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ छंद उपजाति है ॥ १८ ॥ विषादी कहे
दुखी उदासीन इति ॥ १९ ॥
मू०-महोदर ॥ कहैजोकोऊहितवंतबानी । कहौसोतासों
अतिदुःखदानी ॥ गुनीनदावैबहुधाकुदावै ॥ सुधीतबैसाध-
तमौनभावै ॥ २० ॥ कहोशुकाचार्य्यसुहौंकहौजूं । सदातु-
म्हारोहितसंग्रहौजूं ॥ नृपालभूमौविविधचारिजानों । सुनो
महाराजसबैबखानों ॥ २१ ॥ भुजंगप्रयातछंद ॥ यहैलो-
कएकै सदासाधिजानै । बलीबैनज्योंआपुहीईशमानै ॥
करैसाधनाएकपरलोकहीको । हरिश्चन्द्रजैसेगयेदैमहीको
॥ २२ ॥ दुहूंलोककोएकसाधैंसयाने । बिदेहीनज्योंवेद-
बानीबखाने ॥ नटैलोकदोऊहठीएकऐसे । त्रिशंकैहँसैंज्यों-
भलेऊअनैसे ॥ २३ ॥ दोहा ॥ चहूंराजकोमैंकहूँ, तुमसों
राजचरित्र ॥ रुचैसोकीजैचित्तमें, चिंतहुमित्र अमित्र
॥ २४ ॥ चारिभांतिमंत्रीकहे, चारिभांतिकेमंत्र ॥ मोहिंसु-
नायोशुकजू, सोधिसोधिसबतंत्र ॥ २५ ॥

( १७६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

टी०-जो कोऊ तुम्हारे हितकी बात कहत है तासों कहे प्राणीको तुम
दुखदा कहे दुखदायक कहत हौ अथवा दुखदानी कहे कटुबाद कहतहौ औ दांव
कुदांव कहे समय कुसमयको गुनत नहीं हौ अर्थ जा समय मोंको करिबो
उचित है ताको बिचार नहीं करत हौ आपने मनहींकी करत हौ तासों अथवा
दांवको नही गुनत हौ बहुधा कुदांवहीको गुनत हौ तासों सुधी जे सुबुद्धि है
मंत्री जन ते मौनभावको साधत हैं कहे चुपहै रहत हैं ॥ २० ॥ २१॥
॥ २२॥ २३॥ मित्र कहे हित अमित्र कहे अहितकी चिंता करौ कि कौन
चरित्र हमको हित है कौन अहित है अथवा सब मंत्रिन मंत्र कह्यौ है तामें मित्र
अमित्रकी चिंता करौ कि कौन हितकी कहत है औ कौन अहितकी कहत
है ॥ २४ ॥ चारि भांतिके मंत्री हैं औ चारि भांतिके मंत्र होत हैं तंत्र कहे
सिद्धांत अथवा तंत्र शास्त्र ॥ २५ ॥
मू०-छप्पै ॥ एकराजकेकाजहतैंनिजकारजकाजे । जैसेर-
थनिकारिसबैमंत्रीसुखसाजे ॥ एकराजकेकाजआपनेकाज
बिगारत।जैसेलोचनहानिसहीकविबलिहिनिवारत॥एकप्रभूस
मेतअपनोभलोकरतदाशरथिदूतज्यों। एकआपनोप्रभुकोबुरो
करतरावरोपूतज्यों ॥ २६ ॥ दोहा ॥ मंत्रजोचारिप्रकारके,-
मंत्रिनकेजेप्रमान ॥ बिषेदाडिमबीजसे, गुडसेनीबसमान ॥
॥ २७ ॥ चंद्रवर्त्मछंद ॥ राजनीतिमततत्वसमुझिये। देश-
कालगुणियुद्धअरुझिये ॥ मंत्रिमित्रअरिकोगुणगहिये । लोक
लोकअपलोकनबहिये ॥ २८ ॥
टी०-दाशरथि दूत अंगद औ हनुमान सीताको देहु तुमसों इत्यादि संघिकी
बातैं कहि आपने प्रभुको काज साधत हैं औ युद्धमें आपनो मरण घातादि बचाइ
आपनो हित करत हैं औ रावरो पूत युद्ध कराइ आपनी औ तुम्हारीऊ मृत्यु
कियो चाहत है ॥ २६ ॥ विषसे खातहूंमें कटु औ गुण जिनको मृत्युदायक है
औ दाडिम बीजसे खातहूंमें मधुर औ गुण जिनको पुष्टि कर्त्ता है औ गुडसे
खातमें मधुर गुण दुखद है औ नीबसे खातमें कटु गुण सुखद है ॥ २७ ॥
कहूं यह पाठ है कि और विचार तत्व सब लहिये तौ उपजाति चंद्रवर्त्म छंद
जानौ ॥ २८ ॥

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सप्तदशप्रकाशः १७. (१७७)
मू०-रावण ॥ चारिभांतिनृपतातुमकहियो ॥ चारिमंत्रिम
तमैनमग़हियो ॥ राममारिसुरएकनबचिहैं ॥ इंद्रलोकबसो
बासहिरचिहैं ॥ २९ ॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ उठिकैप्रहस्तसजि-
सेनचले । बहुभांतिजाइकपिपैंजदले ॥ तबदौरिनीलउठिसु-
ष्ट्रिहन्यो । असुहीनगिरद्योसुवमुंडसन्यो ॥ ३० ॥ वंशस्थ-
छंद ॥ महाबलीजूझतहीप्रहस्तको । चल्योतहींरावणमीडिए-
स्तको ॥ अनेकभेरीबहुदुंदुभीबजैं । गयंदक्रोधांधजहांतहांग-
जैं ॥ ३१ ॥ सनीरजमीमूतनिकासशोभहीं । बिलोकिजाको
सुरसिद्धक्षोभहीं ॥ प्रचंडनैऋत्यसमेतिदेखिये । सप्रेतमानों
महाकाललेखिये ॥ ३२ ॥ बिभीषण-वसंततिलकाछंद ॥ को
दंडमंडितमहारथवंतजोहै । सिंहध्वजासमरपंडितवृन्दमोह्रै ॥
माहाबलीप्रबलकालकरालनेता । सामेघनादसुरनायकयुद्ध
जेता ॥ ३३ ॥
टी०-रामचन्द्रको मारिकै औ सुर देवता येकौ ना मोंसों बचिहैं अर्थ सब देव
नहूंको मारिकै इंद्रलोकमें बसोबास रचिहों सरस्वती उक्तार्थ-रामचंद्र जैहैं ते हमें
मारिकै एको देवतान बचिहैं कहे बाकी रहिहैं सब देवनको बसोबास इंद्रलोक
में रचिहैं अर्थ हमारे भयसों इंद्रलोकसों भागिकै देवता कंदरादिकनमें जाइ
बसे हैं तिन्हें निर्भय करिकै इंद्रलोकमें बसाइ हैं ॥ २९ ॥ छन्दउपजाति है ॥
॥ ३० ॥ ३१ ॥ सनीर कहे सजल जीमूत कहे मघनके निकास सदृश शोभित
है क्षोभहीं कहे डेरात हैं नैऋत्य राक्षस ॥ ३२ ॥ रामचन्द्र पूंछतौहै इति कथा
शेषः नेता कहे दंड कर्त्ता ॥ ३३ ॥
मू०-जोव्याघ्रवेषरथव्याघ्रनिकेतधारी । संरक्तलोचनकुबेर-
विपत्तिकारी ॥ लीन्हेंत्रिशूलसुरशूलसमूलमानों । श्रीराघवेंद-
द्रअतिकायब हैसोजानों ॥ ३४ ॥ जोकांचनीयरथशृंगमयूर
माली । जाकेउदारउरषण्मुखशक्तिशाली ॥ स्वर्धामधामहर-
१२

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( १७८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कीरतिकैनजानी । सोईमहोदरवृकोदरबंधुमानी ॥ ३५ ॥
जाकेरथायपरसर्पध्वजाविराजै । श्रीसूर्यमण्डलविडंबनज्योति
साजै ॥ आखंडलीयवपुजोतनत्राणधारी । देवांतकैसोसुरलो-
कविपत्तिकारी ॥ ३६ ॥ जोहंसकेतुभुजदंडनिषङ्गधारी । सं-
ग्रामसिंधुबहुधाअवगाहकारी ॥ लीन्हीछँडाइजेहिदेवअदेव
वामा । सोईखरात्मजबलीमकराक्षनामा ॥ ३७ ॥
टी०-त्रिशूल कैसो है सुर जे देवताहैं तिनको मानौं समूल कहे पूर्णशूल कहे
मृत्युहै । “शूलोस्त्री रोगआयुधे मृत्युकेतनयोगेषु ” इतिमेदिनी ॥ ३४ ॥ कांच-
नीयरथ कहे सुवर्णको रथ ताके शृंगमें अग्रभागमें मयूरनकी मालापंगति
लगी है अर्थ मयूरध्वजी है जाकी शक्ति बरछी षण्मुख जे स्वामिकार्त्तिक हैं

सप्तदशप्रकाशः १७. ( १७९ )
गृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठतु निर्विशंकाः ॥ इहागतं मां सहितं भवद्भिर्व्रनौकसः
छिद्रमिदं विदित्वा । शून्यां पुरीं दुःप्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः ॥
विसर्जियित्वा सचिवांस्तस्ततान् गतेषु रक्षस्सु यथा नियोगे ॥'' सो गिरिजे पर्वतहैं
तिनके ग्राम कहे समूह लै लैके हरि जे वानरहैं तिनको समूह मारतहै तिन गिरि
समूहनमें रावण पद्मिनी कमलिनी पत्रमें दंतीसम विहार कौतुक करतहै अर्थ
गिरि ग्राम रावण की देहमें दंतीकी देहमें पद्मिनीपत्र सम लागत है ॥ ४०॥
मू०-सवैया ॥ देखिबिभीषणकोरनरावणशक्तिगहीकररोष
रहींहै। छूटतहीहनूमंतसोंबीचहिंपूंछलपेटिकैडारिदईहै॥ दूसरि
ब्रह्मकीशक्तिअमोघचलावतहीहाइहाइभई है। राख्योभलेशर-
णागतलक्ष्मणफूलिकैफूलिसीओढिलई है ॥ ४१॥ सुग्विनी-
छंद ॥ जोरहींलक्ष्मणैलेनलाग्योजहीं।मुष्टिछातीहनूमंतमारयो
तहीं॥ आशुहीप्राणकोनाशसोह्वैगयो। दंडद्वैतीनमेंचेतताको
भयो॥ ४२॥ मरहट्टाछंद ॥ आयोडरिप्राणनिलैधनुबाणनि-
कपिदलदियोभगाइ ॥ चढिहनूमंतपररामचन्द्रतबरावणरों-
क्योजाइ ॥ धरिएकबाणतबसूत्तछत्रध्वजकाटेमुकुटबनाइ ॥
लागेदूजो शरछूटिगयोबरुलंकगयोअकुलाइ ॥४३॥ दोधक-
छंद॥ यद्यपिहैअतिनिर्गुणताई। मानुषदेहधरेरघुराई ॥लक्ष्मण-
रामजहीं अवलोक्यो॥ नैननतेनरह्योजलरोक्यो॥४४॥राम॥
वारकलक्ष्मणमोहिं बिलोको । मोकहँप्राणचलेतजिरोको ॥
हौंसुमिरौंगुणकेतिकतेरे । सोदरपुत्रसहायकमरे ॥ ४५ ॥
टी०-फूलिकै प्रसन्न ह्वैकै ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ हनूमानसों प्राणनको डरिकै
कपि दलको भगायो जाय तहां हनूमान क्यों न गये तौ जब रावण वा ठोरसों
भागो तब लक्ष्मणको लै हनूमान रामचन्द्रके पास गये इतिकथाशेषः ॥ ४३ । '
॥ ४४ ॥ ४५ ॥
मू०-लोचनबाहुतुहींधनुमेरो । तूबलबिक्रमवारकहेरो ॥ तू-
बिनहौंपलप्राणनराखौं । सत्यकहौंकछुझूठनभाखों ॥ ४६ ॥

( १८० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोहिंरहीयतनीमनशंका । देननपाइबिभीषणलंका ॥ बोलिउ-
ठौप्रभुकोप्रणपारो । नातरुहोतहैमोमुखकारो॥४७॥विभीषण-
सुंदरीछंद ॥ मैंबिनऊंरघुनाथकरौअब । देवतजोपरिदेवनको
सब ॥ औषधिलैनिशिमैंफिरिआवहि॥केशवसोसबसाथजिआ
वहि॥४८॥सोदरसूरकोदेखतहीमुख॥रावणकेपुरवैसिगरेसुख॥
बोलसुनेहनुमंतकरच्योप्रन । कूदिगयोजहँ औषधिकोबन॥४९॥
टी०-बल कहे सैन बिक्रम पराक्रम ॥ ४६ ॥ प्रभु जो मैं हौं ताको विभी-
षणको लंकदान रूपी जो प्रण है ताको पारोकहे पूरण करौं ॥ ४७ ॥ हे रघु-
नाथ ! जो मैं बिनऊं कहे बिनती करत हौं सो तुम करो हे देव ! सब मिलिकै
परिदेवन जो बिलाप है ताको छोड़ि देहु ॥ “बिलापः परिदेवनमित्यमरः”॥४८॥
प्रथम कह्यो है कि औषधि लै कै निशिहींमें फिरि आवै ताको हेतु कहत हैं सोदर जे
लक्ष्मण हैं सूर जे सूर्य हैं तिनको मुख देखतही रावणके सिगरे सुख पुरवैं कहैं
पूरित करिहैं अर्थ सूर्योदय भये लक्ष्मण न जीहैं या प्रकारको विभीषणको बोल
सुनिकै निशिहीमें हम औषधि ल्याइ हैं हनुमंत यह प्रण करचो ॥ ४९ ॥
मू०-रागषट्पद ॥ करिआदित्यअदृष्टनष्टयमकरौंअष्टबसु ।
रुद्रनबोरिसमुद्रकरौंगंधर्बसर्वपसु ॥ बलितअबरेकुबेरबलिहि-
गहिदेउंइन्द्रअब । विद्याधरनिअबिद्यकरौंबिनसिद्धिसिद्धसब ॥
निजहोहिदासिदितिकीअदितिअनिलअनलमिटिजाइजल ।
सुनि सूर जसूरजउदतहींकरौं असुरसंसारबल ॥ ५० ॥ भुजंग-
प्रयातछंद ॥ हन्योबिघ्नकारीबलीबीरबामैं । गयोशीघ्रगामी-
गयेएकधामैं ॥ चल्योलैस बैपर्बतैकैप्रणामैं ॥ नजान्यो-
बिशल्यौषधीकौनतामैं ॥ ५१ ॥
टी०-रामचन्द्र सुग्रीवसों कहत हैं कि जो सूर्य उदयको प्राप्त होई तौ जेते
देवता हैं तिनकी सबकी आयुर्दशा करौं औ देवनके शत्रु जे असुर दैत्यहैं तिनको
बल संसारभरेमों करि देउं अर्थ तीनों लोकमें दैत्यनको राज करि देउं दिति
दैत्यनकी माता अदिति देवनकी माता ॥ ५० ॥ बामकहे कुटिल ऐसा जो

[सप्तदशप्रकाशः १७. ( १८१ )]

हनुमानके सूर्योदय पर्यंत विलंबाइवेके लिये कपट तपस्वीकोरूप धरे मगमें बैठो
कार्यको विघ्नकारी कालनेमि राक्षस है ताको मारिकै एक यामै पहरै गये कहे
बीते औषधि पास गयो विशल्यौषधी कहे विशल्यकरनी औषधी ॥ ५१ ॥
मू०-लसैंऔषधीचारुभोव्योमचारी। कहैदेखियोंदेवदेवाधि-
कारी ॥ पुरीभौमकीसीलिये शीशराजै । महामंगलार्थीहिनूमंत
गाजै ॥ ५२ ॥ लगीशक्तिरामानुजेरामसाथी । जडेह्वैगयेज्यों
गिरैहेमहाथी ॥ तिन्हेंज्याइबेकोसुनोप्रेमपाली । चल्योज्वाल
मालीहिलेकीर्तिमाली॥५३॥ किधौं प्रातहीकालजीमेंबिचार्यो
चल्योअंशु लैंअंशुमालीसँहारचो॥ किधौंजातज्वालामुखीजोर
लीन्हें । महामृत्युजामैंमिटेहोमकीन्हें ॥ ५४ ॥
टी०-वा पर्वतमें ज्वलित औषधी सोहती हैं ताको लै हनुमान व्योमचारी आकाश
मगगामी भयो देव औ देवाधिकारी गंधर्वादि अथवा देवदेव जे इन्द्र हैं तिनके
अधिकारी जे देवता हैं अर्थ औषधिनकी रक्षामों जिनदेवतनको इंद्र अधिकार
दियो है अथवा देवदेव इंद्र औ मंत्रादिमें अधिकारी जे देवता हैं ते कहत हैं कि
महामंगल कल्याणके अर्थी जे हनुमान हैं ते भौम जे मंगल हैं तिनकी पुरीहीको
लिये जात हैं अनेक मंगल सम ज्वलित औषधी वृंद है मंगल पद श्लेष हैं कल्याण
औ भौमको नाम है ॥ ५२ ॥ तिन्हें कहे तिन लक्ष्मणको ज्याइवेको औषधिनके
ज्वालाकी माली कहे समूह हैं जामें सो ज्वालमाली कहावै ऐसा जो पर्वत है
ताहीको लैकै चल्यो है अर्थ ज्वलित हैं औषधिवृंद जामें ऐसो जो औषधिपर्वत
द्रोणाचल है ताहीको लिये जात हैं अथवा ज्वालकी है माली समूह जामें ऐसी जो
विशल्यकरनी औषधि है ताहीको लै चल्यो है अथवा ज्वालमाली जे अग्नि हैं
तिनको लै चल्यो है कीर्तिमाली हनूमानको विशेषण है ॥ ५३ ॥ औ प्रातहि
कहे सूर्योदय होतही लक्ष्मणको काल कहे मृत्यु जीमें बिचारचो है सो अंशुमाली
जे सूर्य हैं तिनको संहारि कहे मारिकै सूर्यके अंशु कहे किरण अथवा प्रभाव लिये
जात हैं जामें सूर्योदय ना होइ ॥ “अंशुः प्रभाकिरणयोरिति” मेदिनी ॥५४॥
मू०-बिनापत्रह्वैयत्रपाला शफूले।रमैंकोकिलासीभ्रमैंभौरभूले ॥
सदानंदरा मैंमहानंदकोलै । हनूमंतआयेबसंतैमनोलै ॥ ५५ ॥

( १८२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोटनकछंद ॥ ठाढेभयेलक्ष्मणमूरिछिये । दूनीशुभशोभशरी
रलिये ॥ कोदंडलियेयहबातररै । लंकेशनजीवितजाइधरै ॥
॥ ५६ ॥ श्रीरामतहींउरलाइलियो । सूंघ्योशिरआशिष-
कोटिदियो ॥ कोलाहलयूथपयूथकियो ॥ लंकाहहलीदश-
कंठहियो ॥ ५७ ॥
इति श्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिन्द्रजिद्विरचितायांलक्ष्मणमूर्च्छामोचनं
नामसप्तदशः प्रकाशः ॥ १७ ॥
टी०-यत्र जा पर्वतमें औषधीवृंद नहीं हैं विनापत्र फूले पलाशके वृक्ष
हैं या प्रकार भूले कोकिलनकी आली पंगती रमती हैं औ जामें भ्रमें कहे
घूमत हैं बसंत कैसो है कि यत्र कहे जामें विनापत्र पलाश फूलि रहेहैं औ
जामें कोकिलावली रमती हैं औ भूले कहे उन्मत्ततासों देहकी सुधि बिसराये
मौर भ्रमत हैं यामें (श्लेषोत्प्रेक्षा) है सो सदानन्द जे राम हैं तिनके महानंदके
लिये हनूमान मानो बसंत ही ल्याये हैं बसंतको देखि सबको आनंद होत है
तासों अथवा जैसे राजनके इहां आनंदार्थमाली वसंत बनाइकै लैजात हैं तैसे
मानो रामचन्द्रके महाआनंदको हनूमान बसंतको रूपही बनाइ ल्याये हैं ॥५५॥
मूरि जो औषधि है ताको छिये कहे छुये सों ॥ ५६ ॥ ५७ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद-
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां सप्तदशः प्रकाशः ॥ १७॥
मू०-॥ दोहा ॥ अष्टादशप्रकाशमें, केशवदासकराल ।
कुम्भकर्णकोबर्णिबो, मेघनादकोकाल ॥ १ ॥ दोधकछंद ॥
रावणलक्ष्मणकोसुनिनिके । छूटिगयेसबसाधनजीके । रेसुत
मंत्रिविलंब न लावो । कुंभकरन्नहिजाइजगावो ॥ २ ॥ राक्षस
लक्ष्मणसाधनकीन्हे । दुंदुभिदीहबजाइ नवीने ॥ मत्तअमत्त
बडेअरुबारे । कुंजरपुंजजगावतहारे ॥ ३ ॥ आइजहींसुरना-

अष्टादशप्रकाशः १८. (१८३)
रिसभागीं । गावनबीनबजावनलागीं ॥ जागिउठोतबहींसुर
दोषी । क्षुद्रक्षुधाबहुभक्षणपोषी ॥ ४ ॥
टी०-कुम्भकर्णको औ मेघनादको काल कहे मृत्यु वर्णिवो ॥ १ ॥ साधन
कहे जयसिद्धिके उपाय ॥ २ ॥ साधन कहे जगाइवेको यत्न ॥ ३ ॥ यह
महादेवसे वर रह्यो हैं कि देवांगननको गान सुनि कुंभकर्ण अकालहूमें जागि है
तासों जब देवांगना आइ गावन लागीं तब जाग्यो ॥ यथा ॥ हनुमन्नाटके ॥
“निद्रां तथापि न जहाँ यदि कुंभकर्णः श्रीकंठलब्धवरकिन्नरकामिनीनाम् ॥
गंधर्वयक्षसुरासिद्धवरांगनानामाकर्ण्य गीतममृतं परमं विनिद्रः” ॥ ४ ॥
म०-नराचछंद ॥ अमत्तमत्तदंतिपंक्तिएककौरकोकरै । भु-
जापसारिआसपासमेयबोपसंहरे ॥ बिमानआसमानकेजहां
तहांभगाइयो । अमानमानसोदिवानकुंभकर्णआइयो ॥ ५ ॥
रावण ॥ समुद्रसेतुबांधिकैमनुष्यदोइआइयो ॥ लियेकुचालि
वानरालिकंकअंकलाइयो ॥ मिल्योबिभीषणौनमोहितोहिंनें-
कहूडरेउ । प्रहस्तआदिदैअनेकमंत्रिमित्रसंहरेउ ॥ ६ ॥ करो
सोकाजआशुआजचित्तमैं जोभावई । असुरूयहोइजीवजीव
शुक्रसुख्यपावई ॥ समेतिरामलक्ष्मणैसोबानरालिभक्षिये ।
सकोसमंत्रिमित्रपुत्रधामग्रामरक्षिये ॥ ७ ॥
टी०-मान (गर्व) दिवान (सभा) ॥ ५॥ बानरालिको लंकके अंक कहे
गोदमें लायो है अर्थ लंकके मध्यमें प्राप्त कियो है अथवा जो पुरी काहू कबहूं न
घेरचौ ताको घेरिकै अंक कहे कलंक लायो है यामें रामचंद्रके बलको वर्णन है
निंदा नहीं हैं तासों सरस्वती उक्तार्था नहीं कियो ॥ ६ ॥ ऐसो काज करौ जासों
देवतनको विघ्न हो जीव जे बृहस्पति हैं ते असुरूय होइ औ हमारो जय होइ
शुक्र सुख पावैं सरस्वती उक्तार्था राम लक्ष्मण समेत या बानरालिको भक्षिये
कहे भक्षण करि सकियत है अर्थ नहीं भक्षण करि सकियत काहेते अनेक नर
वानर हम भक्षण करे हैं इनको सेतुबंधनादि कर्म देखिकै हमारो जीव अति डरो
है ताते कोष कहे खजाना सहित मंत्र्यादिकनको रक्षिये कहे रक्षण करि सकित
है अर्थ नहीं रक्षण करि सकियत अर्थ ये हमको सबको मारि ग्रामादि लेन
चाहत हैं ॥ ७ ॥

( १८४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-कुंभकर्ण-मनोरमाछंद ॥ सुनियेकुलभूषणदेवविद्वेष-
ण । बहुआजिविराजिनकेतुमपूषण ॥ भवभूपजेचारिपदार-
थसाधत । तिनकोकबहूंनहिं बाधकबाधत ॥ ८ ॥ पंकजबा-
टिकाछंद ॥ धर्मकरतअतिअर्थबढावत । संततिहितरतिको-
विदगावत । संततिउपजतहीनिशिबासर । साधततनमनमुक्ति
महीधर ॥ ९ ॥
टी०-बहुतै जे हैं आजि कहे समरनके बिराजी कहे शोभनहार अर्थ
अनेक समरकर्ता तिनके मध्यमें तुम पूषण पाठ है तहाँ अर्थ कि बहुत जे
आजिविराजी संग्रामकर्त्ता हैं तिनके तम पूषण कहे तमको मूषण सम हौ अर्थ सूर्य
तमको नाश करत है तैसे तुम संग्रामकर्त्ता जे शत्रु भट हैं तिन्हें नाश करत हो
चारि पदार्थ अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष, ॥ ८ ॥ चारों पदार्थनके साधिबेको समय
कहत हैं कि महीधर जे राजा हैं ते सन्तत कहे निरंतर धर्महू करत हैं औ संतति
अर्थ द्रव्यहूको बढावत हैं अथवा धर्मको करत अर्थ बढावत हैं अर्थ सतरीतिसों
अर्थ बढावत हैं औ संततहित हैं रतीस्त्री भोग अर्थ काम साधन जिनको ऐसे
कोविद गावत हैं अर्थ ये तीन्यों एकही समयमों साध्य हैं औ जब संतति कहे
पुत्र उत्पन्न भयो तब निशि औ बासर तन औ मन करिकै मुक्तिको साधन
करत हैं आजतक तुम अर्थ, धर्म, कामको साधन कीन्हों अब तुम्हारो पुत्र
समर्थ है ताको सब राजभार सौंपि सीताको रामचंद्रको दैकै हेतु करि मुक्ति
साधन करौ इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ राजाअरुयुवराजजग, प्रोहितमंत्रीमित्र ।
कामीकुटिलनसेइये, कृंपणकृतघ्नअमित्र ॥१०॥ घनाक्षरी ॥
कामीबामीझूठक्रोधीकोंढ़ीकुलद्वेषीखलुकातरकृतघ्नीमित्रदोष-
द्विजद्रोहीये । कुपुरुषकिंपुरुषकाहलीकलहीक्रूरकुटिलकुमंत्री-
कुलहीनकेशौठोहिये ॥पापीलोभीशठअंधबावरोबधिरगूंगाबौ-
नाअविवेकीहठीछलीनिरमोहिये।सूमसर्वभक्षीदैववादीजोकुबा-
दीजड़अपयशीएसोभूमिभूपतिनसोहिये ॥ ११ ॥

अष्टादशप्रकाशः १८. ( १८५ )
टी०-ये पाँचों गजादि इन दूषण सहित होहिं तौ सेवनके योग्य नहीं योग
नहीं होत, अथवा यथाक्रममोंजानो राजा कामी काहेते उचितानुचित विचार बिना
सुन्दरी देखि प्रजाजनकी स्त्रिनको गहि मंगावतहैं तासों देश उजार होतहै औ
युवराज कुटिल काहेते मंत्र्यादिकनमां विरोध राज्यविध्वंस करतहैं औ मोहित
कृपण कहे दरिद्र काहेते विवाहादि समयमों द्रव्य लोभ वश वेदविहित घटचादि
विताइ अमंगल करत हैं अथवा शत्रुओं कछु द्रव्य पाइ मरणादिके लये राशि
नाम बतावत हैं औ मंत्री कृतघ्नी काहेते स्वामीको कृत विसारि शत्रुओं मिलि
राज्य छोडावैं औ मित्र अमित्र कहे हृदयमों भलो ना चाहै काहेते कछू गूढ
मंत्र कहै सो शत्रु पास पहुँचावै ये पाँचौं इन पाँचहुन दोष सहित सेवन योग
नहीं होत यासों या जनायो कि तुम राजा हौ तुम्हें ऐसो काम साधन ना
चाहिये जासों ईश्वर जे रामचंद्र हैं तिनकी स्त्रीको हरि ल्यायो हौ ॥ १० ॥
वामी (वाममार्गी) कुपुरुष कहे पुरुषार्थ रहित किंपुरुष कहे कुछुहै पुरुषकी
आकृति जिनकी काहला (रोगी) दैववादी कहे जे भाग भरोसे रहत हैं याहूमें
या जनायो कि तुमको ऐसो कामसाधन ना चाहिये ॥ ११ ॥
मू०-निशिपालिकाछंद ॥ बानरनजानुसुरजानुशुभगाथ-
हैं ॥ मानुषनजानुरघुनाथजगनाथहैं । जानकिहिदेहुकारि
नेहुकुलदेहुसो ॥ आजुरणसाजपुनिगाजुहँसिमेहुसो ॥ १२ ॥
रावण-दोहा ॥ कुंभकरणकरियुद्धकै,सोइरहौघरजाइ।वेगिबि-
भीषणज्योंमिल्यो,गहौशत्रुकेपाइ ॥१३॥ मंदोदरी-दो०॥ इंद्र-
जीतअतिकायसुनि, नरांतकसुखदाइ । भयनसोंप्रभुझुकतहैं,-
क्यों नकहौसमुझाय ॥ १४ ॥ मंदोदरी-चंचलाछंद ॥ देव- :
कुंभकर्णकेसमानजानियेनआन। इन्द्रचंद्रबिष्णुरुद्रब्रह्मकोहरे
उगुमान ॥ राजकाजकोकहैजोमानियेसोप्रेमपालि। कचलीन-
कोचलेनकालकीकुचालिचालि ॥ १५ ॥
टी०-कुल औ देहसों नेह करिकै जानकीको देहु यह कहि या जनायो कि
ना देहौ तौ रामचंद्र तुम्हारे कुलके सहित तुम्हारो नाश करि हैं ॥ १२ ॥ कारि
कहे करौ ॥ १३ ॥ झुकत कहे रिस करत है भयनसों बहुवचन कहि या जनायो