रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
दर्दी ॥३०॥ रावण-वंशस्थछंद॥ तपीजपीबिप्रनिछिप्रहीहरौं ।
अदेवद्वेषीसबदेवदंसहरौं ॥ सियानदेहौंयहनेमजीधरौं । अमा-
नुषीभूमिअवानरीकरौं ॥३१॥ अंगद-विजयछंद ॥ पाहनते
पतिनीकरिपावनटूककियोहरको धनुको रे। छत्रबिहीनकरे
क्षणमेंक्षितिगर्वहर्यौतिनकेबलको रे ॥ पर्वतपुंजपुरैनिकेपात
समानतरेअजहूंधरको रे । होइँनरायणहूँपै नयेगुणकौनईहां
नरवानरको रे ॥ ३२ ॥ रावण-चंचरीछंद ॥ देहिंअंगदरा-
जतोकहंमारिवानरराजको।बांधिदेहिंबिभीषणै अरुफोरिसेतुस-
माजको ॥ पूंछजाराहंअक्षरिपुकीपाइंलागहिंरुद्रके । सीयकोत-
वदेहूरामहिंपारजाइंसमुद्रके ॥ ३३ ॥
टी०-घाघ कहे नटादि इंद्रजालिका॥ ३०॥ सरस्वती उक्तार्थः-हे अंगद !कहै केशव
हौं कि तपी औ जपी जे विप्रहैं अथवा तपी औ जपी औ विप्रनको छिमहीं हरौं
कहौं कि तपी औ जपी जे विप्र हैं अथवा तामें कछूविचार नहीं करत औ अदेव
जे दैत्य जे राक्षस हैं तिनके द्वेषी शत्रु देवता हैं तिन्हें छिमहीं संहरत हौं कहे मारतहौं
यासों हौं बडो पापीहौं सो सियाको न देहौं यह नेम जो जीमें धरतहौं सो अब कहे
या समयमों अमानुषी कहे नाहीं हैं मानुष्य जहां औ अनरी कहे नाहीं हैं कोऊ
काहू को अरि शत्रु जहां ऐसी जो भूमि कहे स्थान है विष्णुलोक ताको करों कहे
साधत हौं । 'भूमिः क्षितौ स्थानमात्रे' इति अभिधानचिंतामणिः । ब्रह्मदोष देव-
दोषादि बडे पातकनसों छूटिबेको उपाव और नहीं है तासों सीताको नहीं देतो
कि सीताके लिये आइकै रामचंद्र मोहिं मारिहैं तौ सब पातकनसों छूटिकै
विष्णुलोक जैहौं इति भावार्थः ॥ ३१ ॥ अजहूं कहे अबहूं अर्थ एतेहूपर तौ
धरकौ कहर करौ ॥ ३२ ॥ सरस्वती उक्तार्थः यामें प्रहस्तादि मंत्रिनप्रति का-
कोक्ति है रावण कहत है कि हे अंगद ! तुम तौ नीकी शिष देतहौ परंतु प्रह-
स्तादि मंत्रिनकरि दी कर्मवश मेरी ऐसी दुर्मति है कि जब रामचंद्र येती बातें
करें तब सीताको देहुं सो ऐसो काहेको कैहैं तासों दुर्मति कृत हमारी मृत्यु विशेष
सो ह्वै चुको यह निश्चय जानौं ॥ ३३ ॥
मू०-अंगद-लंकालाइगयो बलीहनुमंतसंतनगाइयो ॥ सिंधु
बांधतशोधिकैनलंकछीरछीटबहाइयो । ताहितोहिंसमेतअंधउ-