रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ मरकतमणिके शोभिजै, सबैकँगूरचारु ॥
आइगयो जनुदानको, पातककोपरिवारु ॥ ८ ॥ कुसुमविचित्रा
छंद ॥ तवनिकसोरावणसुतशूरो । जेहिरनजीत्योहरिखलपू-
रो ॥ तपबलमायातमउपजायो। कपिदलकेमनसंभ्रमछायो ॥
॥ ९ ॥ दोधकछंद ॥ काहुनदेखिपरेवहयोधा । यद्यपिहैंसिगरे
बुद्धिबोधा ॥ शायकसोंअहिनायकसाध्यो । सोदरस्योरघुना-
यकबांध्यो ॥ १० ॥ रामहिंबांधिगयोजबलंका । रावणकी
सिगरीगईशंका । देखिबंधेतबसोदरदोऊ । यूथपयूथत्रसेसब-
कोऊ ॥ ११ ॥ स्वागताछंद ॥ इंद्रजीततेहिलैउरलायो । आ-
जुकाजसबमोमनभायो ॥ कैबिमानअधिरूढतिधाये। जानकी
हिरघुनाथदेखाये ॥ १२ ॥ राजपुत्रयुतनागनिदेख्यो । भूमि-
युक्तरुचंदनलेख्यो ॥ पन्नगारिप्रभुपन्नगसाईं । कालचालक-
हुजानिनजाई ॥ १३ ॥ दोहा ॥ कालसर्पकेकवलते, छोरत-
जिनकोनाम॥ बँधेतेब्राह्मणवचनवश, मायासर्पहिराम ॥१४॥
टी०-कंगूरनमें ऋक्ष लपटे हैं तासों मानों मरकत मणिहीके कंगूरा शोभित
हैं पातक देवदोष ब्रह्मदोषादि ॥ ८ ॥ हरि इन्द्र ॥ ९ ॥ बुद्धि बोधाकहे बुद्धि-
युक्त ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ तेहि रावण इंद्रजीतको उरमें लगायो ॥ १२ ॥
भूमिमें युक्त कहे गिरे चंदन वृक्षहू नागयुक्त रहतहैं दुःखयुक्त सीता यह कहत
भई कि हे पन्नगारिप्रभु ! हे पन्नगसांई ! पन्नग जे सर्प हैं यात... अरि कहे
भक्षक जे गरुड हैं तिनके तुम स्वामी हौ यासों या जनायो कि तुम्हार वाहनजे
गरुड हैं. ते अनेक सर्प भक्षण करतहैं औ पन्नगसांई कहि या जनायी कि तुम
सदा सर्प ही पर सोयो करत हौ ते तुम नागपासमें बाँधे हौ तौ काल जो समयहै
ताकी चाल कछू जानि नहीं परति वलाबल समय ही नत उन्नतको उन्नत नत
करत है इति भावार्थः ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ पन्नगारितबहींतहँआये । कालजाल-
सबमारिभगाये ॥ लंकमांझतबहींगइसीता । आनन्दकंदनव-