रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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( १६६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
निहैहयराजकियो । हैहयकौनवह्रैबिसरचोजनखेलतहीतुलैं
बांधिलियो ॥ १२ ॥
टी०-जा स्त्रीके संग राज्याभिषेक होइ सो देवी कहावै ॥ "देवी कृताभिषेका-
यामित्यभिधानचिंतामणिः"॥१०॥ कल्पांतके अंतमें ब्रह्मा सृष्टि रचत हैं विष्णु
रक्षा करत हैं सो ताहि कहे लोक सृष्टिको औ देवेश इन्द्र औ विष्णु औ ब्रह्मादि
दै जे देव हैं तिन्हें रुद्र जे महादेव हैं ते भू जो भौंहहै ताके भंगही टेढ़ी करनेहीसों
संहारकालमें संहारकरि डारत हैं ॥ ११ ॥ छत्र कहे छत्रवर्णः ॥ १२ ॥
मू०-अंगद-विजयछंद ॥ सिंधुतरयोउनकोबनरातुमपैध-
नुरेखगईंतरी । बांध्योइबांधतसोनबँध्योउनबारिधिबांधिकै
बाटकरी ॥ अजहूँरघुनाथप्रतापकीबाततुन्हेंदशकंठ Santana जानिप-
री। तेलनितूलनिपूंछिborder/जरीनजरीजरीलंकजराइपरी ॥ १३ ॥
मेघनाद् ॥ छांडिदियोहमहींवनरावहपूंछकीआगनलंकज री ।
भीरमेंअक्षमत्र्योचपिबालकवादिहिंजाइप्रशास्तिकरी ॥ ताल
बिंधेअरुसिंधुबँधेयहचेटकविक्रमकौनकियो । बानरकौनरकौ
वपुरापलमँसुरनायकबांधिलियो ॥ १४ ॥
टी०-बांध्योई कहे हनुमानको बंधन तुम काहूविधिसों करिबोहू करचौ ताहू
पर बांधत ना बन्यौ तेल औ तूल कहे रूईयुक्त जो वस्तु होतिहै सो विशेष जरति
है सो या प्रकारकी पूंछ तुम करी सो ना जरी औ केवल सुवर्ण औ रत्ननमें अग्नि
प्रज्वलित नहीं होति परंतु तुम्हारी लंका तृणादि रहित केवल रत्नादिके जरायमों
औौ जरत भई रामके प्रभावसों ऐसी अनहोनी बातें होंती हैं ताहूपर तुम्हें नहीं
जानि परत इतिभावार्थः ॥ १३ ॥ वादि कहे वृथा प्रशास्ति कहे स्तुति सप्तताल
बेध्यो औ सिंधु बांध्यो यह चेटक कहे भगरविद्या है सरस्वती उक्तार्थः ॥ जो
रामचन्द्र तालवेधन सिंधुबंधन करचौ सो तो चेटक कहे भगर विद्यासम है अर्थ खेल
समहै यामें कौन विक्रम कहे अतिबल कियौहै ॥ "विक्रमस्त्वतिशक्तिता इत्यमरः” ॥
अर्थ वै चाहें तौ त्रैलोक्यको संहार करिदारें सिंधुबंधादि सदृश कर्मनमें उनको
कौन श्रम है ऐसे प्रबल वे ना होते तौ जिन हम पलमें सुरनायकको बांधि लियो
ते बानर औ नरको वपुरा है जाते अर्थ हम इंद्र लोकादिमें जाइकै इन्द्रादिको