रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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खारिहौंउलटीकरौं। आजुराजकहाँविभीषणबैठिहैं तेहितेडरौं॥
॥ ३४ ॥ दोहा ॥ अंगदरावणकोमुकुट, लैकरिउड्योसुजान ।
मनोचलोयमलोकको, दशशिरकोप्रस्थान ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिन्द्र-
जिद्विरचितायामंगदरावणसंवादवर्णनं नाम षोडशः प्रकाशः ॥ १६ ॥
टी०-क्षीर कहे जल ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायतजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां अंगदसंवादवर्णन नाम षोडश प्रकाशः ॥ १६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्रहवेंप्रकाशमें, लंकाकोअवरोध । शत्रुच-
मूवर्णनसमर, लक्ष्मणकौ परबोध ॥१॥ अंगदलैवामुकुटको, परे
रामकेपाइ ॥ रामविभीषणकेशिरसि, भूषितकियोबनाइ ॥ २ ॥
मू०-पद्धतिकाछंद ॥ दिशिदक्षिणअंगदपूर्वनील ॥ पुनि
हनूमंतपश्चिम सुषेण ताल ॥ दिशिउत्तरलक्ष्मणसहितराम । सुग्रीव
मध्यकीन्हेविराम॥३॥ सँगयूथपयूथपवलबिलास । पुरफिरत
विभीषणआसपास ॥ निशिवासरसबकोलेतसोध । यहिभांति-
भयो लंकानिरोध ॥४॥ तबरावणसुनिलंकानिरोध । उपजौत-
नमन अतिप्रचंडक्रोध ॥ राख्योप्रहस्तहठिपूर्वपौरि । दक्षिणहिं-
महोदरगयोदौरि ॥५॥ भयोइंद्रजीतपश्चिमदुवार । हैउत्तरराव-
णबलउदार । कियोबिरूपाक्षथितमध्यदेश । कैरॅनरान्तकच-
हुंचाप्रवेश ॥६॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ अतिद्वारद्वारमहँयुद्धभये ।
बहुऋच्छकंचरनलागिगये ॥ तबस्वर्णलंकमहँशोभभई। जनुअ-
ग्निजवालमहँधूममई ॥ ७ ॥
टी०-अवरोध घेरनो औ विभीषणकरि शत्रु जो रावण हैं ताके चमूको वर्णन
है परमोत्कर्ष ॥ १ ॥ २ ॥ रामचंद्रके औ लंकाके मध्यमें सुग्रीव विश्राम
कीन्हे हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ छंद उपजातिहै ॥ ७ ॥