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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 269 में से

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पृष्ठ 183

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सप्तदशप्रकाशः १७. (१७७)
मू०-रावण ॥ चारिभांतिनृपतातुमकहियो ॥ चारिमंत्रिम
तमैनमग़हियो ॥ राममारिसुरएकनबचिहैं ॥ इंद्रलोकबसो
बासहिरचिहैं ॥ २९ ॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ उठिकैप्रहस्तसजि-
सेनचले । बहुभांतिजाइकपिपैंजदले ॥ तबदौरिनीलउठिसु-
ष्ट्रिहन्यो । असुहीनगिरद्योसुवमुंडसन्यो ॥ ३० ॥ वंशस्थ-
छंद ॥ महाबलीजूझतहीप्रहस्तको । चल्योतहींरावणमीडिए-
स्तको ॥ अनेकभेरीबहुदुंदुभीबजैं । गयंदक्रोधांधजहांतहांग-
जैं ॥ ३१ ॥ सनीरजमीमूतनिकासशोभहीं । बिलोकिजाको
सुरसिद्धक्षोभहीं ॥ प्रचंडनैऋत्यसमेतिदेखिये । सप्रेतमानों
महाकाललेखिये ॥ ३२ ॥ बिभीषण-वसंततिलकाछंद ॥ को
दंडमंडितमहारथवंतजोहै । सिंहध्वजासमरपंडितवृन्दमोह्रै ॥
माहाबलीप्रबलकालकरालनेता । सामेघनादसुरनायकयुद्ध
जेता ॥ ३३ ॥
टी०-रामचन्द्रको मारिकै औ सुर देवता येकौ ना मोंसों बचिहैं अर्थ सब देव
नहूंको मारिकै इंद्रलोकमें बसोबास रचिहों सरस्वती उक्तार्थ-रामचंद्र जैहैं ते हमें
मारिकै एको देवतान बचिहैं कहे बाकी रहिहैं सब देवनको बसोबास इंद्रलोक
में रचिहैं अर्थ हमारे भयसों इंद्रलोकसों भागिकै देवता कंदरादिकनमें जाइ
बसे हैं तिन्हें निर्भय करिकै इंद्रलोकमें बसाइ हैं ॥ २९ ॥ छन्दउपजाति है ॥
॥ ३० ॥ ३१ ॥ सनीर कहे सजल जीमूत कहे मघनके निकास सदृश शोभित
है क्षोभहीं कहे डेरात हैं नैऋत्य राक्षस ॥ ३२ ॥ रामचन्द्र पूंछतौहै इति कथा
शेषः नेता कहे दंड कर्त्ता ॥ ३३ ॥
मू०-जोव्याघ्रवेषरथव्याघ्रनिकेतधारी । संरक्तलोचनकुबेर-
विपत्तिकारी ॥ लीन्हेंत्रिशूलसुरशूलसमूलमानों । श्रीराघवेंद-
द्रअतिकायब हैसोजानों ॥ ३४ ॥ जोकांचनीयरथशृंगमयूर
माली । जाकेउदारउरषण्मुखशक्तिशाली ॥ स्वर्धामधामहर-
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