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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 269 में से

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पृष्ठ 174

मू०-अंगद॥इनकोबिलगुनमानिये,क‍हिकेशवपलआधुपानी
पावकपवनप्रभु, ज्योंअसाधुत्योंसाधु॥१८॥रावण॥द्रुतविलंबि
तछंद॥ उरसिअंगदलाजकछूगहौ।जनकघातकवातवृथाकहौ॥
सहितलक्ष्मणरामहिंसंहरौ। सकलवानरराजतुम्हेंकरौ ॥१९॥
टी०-बिलगु कहे द्वेष साधु कहे भलो असाधु कहे बुरो ॥ १८ ॥ जनक
पिता सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे अंगद तुम रामचन्द्रसों मिलिबेकों हमकों कहत हौ
यामें तुमको कछु लाज नहीं होत ऐसी बात कहि कछु लाज तौ उरमें गहौ काहेते
कि तुम्हारे जनक बालि तिनके जे घातक रामचन्द्र हैं तिनकी बात वृथा है यह तुम
कहौ अर्थ रामचन्द्रकी बात वृथा नहीं होति जो मनमें संकल्प करतहैं सो करिबोई
करत हैं यासों या जनायो कि अति बली बालिके वध करिबेको संकल्प कियो सो
वध करिबोई कियो तैसे वै तो हमारे मारिबेको संकल्प करै हैं यह संकल्प वृथा काहू
उपायसों न ह्वै है तासों मैं लक्ष्मण सहित रामहिसों संहरौं कहे संहारनाशकों प्राप्त
होत हौं अर्थ लक्ष्मण सहित राम मोहिं मारतहीहैं नहीं तो ऐसो हित सीख तुमको
दियो है जासों सब वानरनको राजा तुमको करौं अर्थ सुग्रीवसों छोरि तुम्हारो
राज्य तुम्हें देऊँ अथवा जनकघातक जे सुग्रीवहैं तिनकी बात वृथा कहत हौ
अर्थ जो तुम्हारे पिताको मारचो ताकी तुम बड़ाई वृथा करत हौ मैं लक्ष्मण सहित
राम करिकै संहरौं कहे नाश कों प्राप्त होत हौं नहीं तो सुग्रीवको मारि सब वान-
रनकौ राजा तुमकों करौं ॥ १९ ॥
मू०-अंगद-निशिपालिकाछंद ॥ शत्रुसबमित्रहमचित्तपाहिं
चानहीं । दूतविधिनूतकबहूंनउरआनहीं ॥ आपुमुखदेखि
अभिलाषअभिलाषहू । राखिभुजशीशतबऔरकहँराखहू
॥ २० ॥ रावण-इन्द्रवज्राछन्द ॥ मेरीबड़ीभूलसोकाकहौंरे ।
तेरोकह्योदूतसबैसहैंरे ॥ वैजोसबैचाहततोहिंमारचो । मारों
कहातौहिंजो दैवमारचो ॥ २१ ॥ अंगद-उपेन्द्रवज्राछन्द ॥
नराचश्रीरामजहींधरैंगे। अशेषमाथेकटिभूपरैंगे ॥ शिखाशि-
वाश्वानगहैंतिहारी । फिरैंचहूँवोरनिरैविहारी ॥ २२ ॥