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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 269 में से

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पृष्ठ 182

( १७६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

टी०-जो कोऊ तुम्हारे हितकी बात कहत है तासों कहे प्राणीको तुम
दुखदा कहे दुखदायक कहत हौ अथवा दुखदानी कहे कटुबाद कहतहौ औ दांव
कुदांव कहे समय कुसमयको गुनत नहीं हौ अर्थ जा समय मोंको करिबो
उचित है ताको बिचार नहीं करत हौ आपने मनहींकी करत हौ तासों अथवा
दांवको नही गुनत हौ बहुधा कुदांवहीको गुनत हौ तासों सुधी जे सुबुद्धि है
मंत्री जन ते मौनभावको साधत हैं कहे चुपहै रहत हैं ॥ २० ॥ २१॥
॥ २२॥ २३॥ मित्र कहे हित अमित्र कहे अहितकी चिंता करौ कि कौन
चरित्र हमको हित है कौन अहित है अथवा सब मंत्रिन मंत्र कह्यौ है तामें मित्र
अमित्रकी चिंता करौ कि कौन हितकी कहत है औ कौन अहितकी कहत
है ॥ २४ ॥ चारि भांतिके मंत्री हैं औ चारि भांतिके मंत्र होत हैं तंत्र कहे
सिद्धांत अथवा तंत्र शास्त्र ॥ २५ ॥
मू०-छप्पै ॥ एकराजकेकाजहतैंनिजकारजकाजे । जैसेर-
थनिकारिसबैमंत्रीसुखसाजे ॥ एकराजकेकाजआपनेकाज
बिगारत।जैसेलोचनहानिसहीकविबलिहिनिवारत॥एकप्रभूस
मेतअपनोभलोकरतदाशरथिदूतज्यों। एकआपनोप्रभुकोबुरो
करतरावरोपूतज्यों ॥ २६ ॥ दोहा ॥ मंत्रजोचारिप्रकारके,-
मंत्रिनकेजेप्रमान ॥ बिषेदाडिमबीजसे, गुडसेनीबसमान ॥
॥ २७ ॥ चंद्रवर्त्मछंद ॥ राजनीतिमततत्वसमुझिये। देश-
कालगुणियुद्धअरुझिये ॥ मंत्रिमित्रअरिकोगुणगहिये । लोक
लोकअपलोकनबहिये ॥ २८ ॥
टी०-दाशरथि दूत अंगद औ हनुमान सीताको देहु तुमसों इत्यादि संघिकी
बातैं कहि आपने प्रभुको काज साधत हैं औ युद्धमें आपनो मरण घातादि बचाइ
आपनो हित करत हैं औ रावरो पूत युद्ध कराइ आपनी औ तुम्हारीऊ मृत्यु
कियो चाहत है ॥ २६ ॥ विषसे खातहूंमें कटु औ गुण जिनको मृत्युदायक है
औ दाडिम बीजसे खातहूंमें मधुर औ गुण जिनको पुष्टि कर्त्ता है औ गुडसे
खातमें मधुर गुण दुखद है औ नीबसे खातमें कटु गुण सुखद है ॥ २७ ॥
कहूं यह पाठ है कि और विचार तत्व सब लहिये तौ उपजाति चंद्रवर्त्म छंद
जानौ ॥ २८ ॥