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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पंचदशप्रकाशः १५. (१६१)

मू०-दण्डक॥कुंतलललितनीलभ्रुकुटीधनुषनैनकुमुदकटा-
क्षबाणसबलसदाईहै॥ सुग्रीवसहिततारअंगदादिभूषणरुमध्य
देशकेशरीसुगजगतिभाईहै॥ विग्रहानुकूलसबलक्षलक्षऋक्षब-
लक्षऋक्षराजमुखीमुखकेशोदासगाईहै। रामचन्द्रजूकीचमूराज्य
श्रीविभीषणकीरावणकीमीचुदरकूचचलिआई है ॥ ४० ॥

टी०-रामचन्द्र चमू कैसीहै कि कुंतल औ ललित औ नील औ भ्रुकुटी औ
धनुष औ कुमुद औ कटाक्ष औ बाण औ सबलई जे वानर हैं ते सदा हैं जामें
अथवा बाण पर्यंत इन नामन करिकै युक्त औ सदा सबल कहे बलवान ऐसे
जे वानर ऋक्ष हैं ते हैं जामें औ सुग्रीव सहित है औ तार नामा जे वानरहैं तिन
सहितहै औ अंगदादिक जे भूषण कहे सेनानायक हैं तिनसों युक्त है औ मध्य
देशनामा औ केशरीनामा औ सुगज नामा जे वानरहैं तिनकी गति भाई कहे
नीकी है जामें औ विग्रहनामा औ अनुकूलनामा औ ऋक्षराज मुख कहे ऋक्षराज
जे जाम्बवंत हैं ते हैं मुख कहे मुखिया जामें ऐसो लक्ष लक्ष कहे अनेक लक्ष
ऋक्षन ऋक्षनकोहै बल सैन्य जामें विभीषणकी राज्यश्री कैसी है कि कुंतल
जे केश हैं ते हैं ललित कहे सुंदर औ नील कहे श्याम जाके औ भ्रुकुटी धनुष
सम जाकी औ नयन हैं कुमुद कहे कमलसम जाके औ कटाक्ष हैं बाणसम जाके
औ सबल कहे सुंदरता सहित सदा है अर्थ जाकी छवि काहू समयमों म्लानि
नहीं होति ॥ "बलं गंधरसे रूपे-इति मेदिनी"॥ औ सुष्ठु जो ग्रीवा है सो सहितहै
तार कहे विमल मुक्तनसों अर्थ मोतिनकी माला पहिरे है॥ "तारो निर्मलमौक्तिके
मुक्ताशुद्धावबुध्नादे-इत्यभिधानचिंतामणिः"॥ औ अंगद जो विजायठ हैं
तेहि आदिदै जे भूषण हैं तिनसों युक्त है औ मध्यदेश जो कटि है सो है केशरी
कहे सिंहको ऐसो जाको औ सुष्ठु जो गज है अर्थ जो अति ललित चाल चलत
है ताकी ऐसी गति है भाई कहे नीकी जाकी औ विग्रह कहे शरीर है अनुकूल
कहे यथोचित सब कहे पूर्ण अर्थ जैसो जौन अंग चाहिये तौन अंग तैसोई है
अथवा अनुकूल कहे हित है सबको अर्थ जे देखत हैं ताको मन वश है जात
है अथवा अनुकूल कहे व्याधि रहित 'गात्रं वपुः संहननं शरीरं वर्ष्म विग्रहः
इत्यमरः'॥ औ लक्ष लक्ष जे ऋक्ष नक्षत्र हैं गन कहे जो बल सौंदर्य है तेहि
सहित जो ऋक्षराजचन्द्रमा है ताते सदृशहै मुख जाको अर्थ जब अनेक लक्ष

११

( १६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
नक्षत्रकी शोभा लैके चन्द्रमा आपु धारण करै तब जाके मुखके सम होय ॥
‘ऋक्षस्तुस्यानक्षत्रमृक्षभल्लयोः-इत्यभिधानचिंतामणिः’ ॥ रावणकी मीचु कैसी
है कि कुंत जो बरछी है सो है ललित कहे लचकति जाके अर्थ बरछी हाथमें
लिये है अथवा कुंतल जो भालाहैं सोहैं ललित कहे अति तीक्ष्ण जाको अर्थ
हथियारको धरे है ॥ “कुंतलोभल्लकेशयोरित्यभिधानचिंतामणिः ॥” औ
नील कहे श्यामवर्ण है औ भ्रुकुटी भौंह हैं धनुषसम विकराल जाकी इहां कवि
क्रूर स्त्री करि वर्णन है तासों भौंहनकी धनुषकी क्रूरता धर्म करि साम्य जानौ
औ नयन हैं कुमुद् कहे कुत्सित है मुद आनंद जिनमें ऐसे हैं जाके अर्थ राव-
णके वधको आनंद है विभीषणके राज्यलाभादि उत्सवको आनंद नहीं है अथवा
नयन हैं कुमुद कहे मुद जो आनंद है प्रसन्नता इति तासों रहित अर्थ अतिको-
पसों अरुण अति विकरालहैं प्रशस्त नहीं हैं औ कटाक्ष हैं बाणसम कराल जाके
औ सबल कहे बुद्धिवल सहित सदा हैं इहां बलपदते बुद्धिवल जानौ अर्थ बुद्धि-
बलसों सीता हरणादि कार्य कराइ रामचन्द्रसों विरोध कराइ दियो तार कहे
उच्चस्वर करिकै सहित है सुसुग्रीवा जाकी सुष्ठु पदको अर्थ यह कि ऐसी उच्च-
स्वर करिवेकी शक्ति और काहूकी ग्रीवामें नहीं है औ अंगद जो विजायत हैं
तेहि आदि भूषण कहे नहीं है अर्थ मुंडमालादि क्रूर भूषण पहिरे हैं औ मध्य
कहे अधम अनुत्तमेति हैं देश कहे जाके अंग ॥ “मध्यंविलग्नेन स्त्रीस्यान्न्याय्यें-
ऽतरेऽधमेऽपिचेति मेदिनी ॥” औ केशरी जो सिंह है ताकी गजपर ऐसी गति भाई
है जाको अर्थ जैसे गजके मारिवेको सिंह चलत है तैसे रावणके मारिवेको चली
आवाति है औ रामचन्द्रको जो विग्रह विरोध है सोई है अनुकूल हित जाको
अर्थ रामचन्द्रके विरोधहीसों है कार्यसिद्धि जाकी औ सब कहे पूर्ण अनेक लक्ष
जे ऋक्ष भालु हैं तिनको है बल जाके औ ऋक्षराज जे जाम्बवंत हैं तिनको ऐसो
है मुखजाको ॥ ४० ॥
मू०-हीरकछंद ॥ रावणशुभश्यामलतनुमंदिरपरसोहियो ।
मानहुदशशृंगयुतकलिंदगिरिबिमोहियो॥ राघवशरलाघवगति
छत्रमुकुटयोंहयो । हंससबलअंशसहितमानहुउडिकैगयो
॥ ४१ ॥ लजितखलतजिसुथलभाजिभवनमेंगयो । लक्षण
प्रभुतलक्षण गिरिदक्षिणपरसोभयो ॥ लंकनिरखिअंकहर-

पंचदशप्रकाशः १५. ( १६३ )
षिमर्मसकलजोलह्यो । जाहुसुमतिरावणवह अंगदसनयों-
कह्यो ॥ ४२ ॥ चंचलाछंद ॥ रामचन्द्रजूकहंतस्वर्णलंकदे-
खिवैखि । ऋक्षवानरालि ओरओरचारिहूविशेषि ॥ मंजुकं-
जगंधलुब्धसौरभीरसीविशाल । केशौदासआसपासशोभिजै-
मनोमराल ॥ ४३ ॥
टी०-नवल कहे अनेक रंग मिश्रित हैं अंशु कहे किरण जाके ऐसे जे
सूर्य हैं तिन सहित मानों कलिंदगिरि श्रृंगते हंस कहे हंस समूह उड़िगयो है
यहाँ जातिविषे एक बचन है हंसनके सदृश श्वेत छत्र हैं औ सूर्यनके सदृश
अनेक रंग नग जटित मुकुट हैं ॥ ४१ ॥ दक्षिण गिरि कहे समुद्रके दक्षिण
कूलकी गिरि समुद्र पारको गिरि इति मर्म भेद ॥ ४२ ॥ सौर भीर सम ऋक्ष
हैं मराल हंस सम वानर हैं ॥ ४३ ॥
मू०-ताम्रकोटलोहकोटस्वर्णकोटआसपास । देवकीपुरी
घिरीकिपर्वतारिकेविलास ॥ बीचबीचहैकपीशबीचबीचचक्र-
क्षजाल । लंककन्यकागरेकिपीतनीलकंठमाल ॥ ४४ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र-
चन्द्रिकायामिन्द्राजिद्विरचितायां रामसैन्यसमुद्रतरणं
नामपंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
टी०-अर्थ इंद्रकी शत्रुतासों मानो पर्वतन देवपुरीको घेरिलियों है देवपुरी
सदृश स्वर्णकोट है जाके मध्यमें पुरी है औ ताके आस पास ताम्रादिके कोट
हैं ते पर्वत समान हैं यासों या जनायो कि लंका देवपुरी सम है ॥ ४४ ॥
टी०-॥ । इति श्रीमज्जगज्जननीजनकराजकुमारीजानकीजानिप्रसादायजनजानकी-
प्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां पंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
मू०दोहा-यह वर्णनहैषोडशे, केशवदासप्रकास । रावण
अंगदसोंविविध, शोभितवचनविलास ॥ १ ॥ अंगदकूदि
गयेतहाँ, आसनगतलंकेश । मनुमधुकरकरहाटपर, शोभि-

तश्यामलवेष ॥ ॥ २ ॥ प्रतीहारनाराचछंद ॥ पढोबिरंचि
मोनवेदजीवसोरछंडिरे । कुबेरबेरकैकहीनयक्षभीरमंडिरे ।
दिनेशजाइदूरिबैठुनारदादिसंगहीं । नबोलुचंदमंदबुद्धिइंद्रकीसभानहीं ॥ ३ ॥ चित्रपदाछंद ॥ अंगदयोसूनिबानी ।
चित्तमहारिसआनी ॥ ठेलिकै लोगअनेक । जाइसभामहँ-
बैठे ॥ ४ ॥ चित्रपदाछंद ॥ कौनहोपठयेसोकौनैइहांत तुम्हैं-
कहकामहै ॥ अंगद ॥ जातिबानरलंकनायक दूतअंगदनाम
है ॥ रावण ॥ कौनहैवहबांधिकैहमदेहपूछिसबैदही । लंकजारि-
सँहारिअक्षगयोसोबातवृथाकही ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ आसनमें गत कहे बैठो ॥ २ ॥ रावणके सभाभवनमें जाइ
अंगद ऐसे कौतुक देखत भये प्रतीहार या प्रकारके अनादर पूर्वक बचन
ब्रह्मादिसों कहत हैं हे कुबेर ! तुमसों कैयो बार कह्यो कि तुम यक्षनकी भीरको
न मंडौ अर्थ यक्षनकी भीरको संग लै इहां न आयो करो सो तुम आइवां करत हौ ३॥
॥ ४ ॥ लंकनायक बिभीषण॥ ५ ॥
[L

हविहारछयोजू। सीयनिहारिसंहारिकैराक्षसशोकअशोकबनीहि
दयोजू। अक्षकुमारहिमारिकैलंकहिजारिकैनीकेहिजातभयोजू ९

टी०-महोदरने पूंछी कि तुम तहां कौन भांतिसों रहत हौ अर्थ कौने
कामके अधिकारी हौ तब अंगद कह्यो है हम राजाके इहां प्रेषक कहे यथोचित
स्थानमें दूतनके पठावनहार हैं अर्थ दूतनके नायक हैं लोक लाज दुरयो रहे
यह कहि अंगद या जनायो कि हमारे सैन्यमें ऐसो कोऊ नहीं है
जाको काहूं बांध्यो माग्यो होइ ॥ ६ ॥ ७ ॥ पाछे अंगद कह्यो है कि हम लंक
नायकके दूत हैं सो रावण पूछ्यो कि लंकनायक को है जाके तुम दूत हौ तब
अंगद कह्यो है कि विभीषण लंकनायक है कैसो है विभीषण जे देवतनके दूषण
कहे पीडा करनहार हैं तिनको दहै कहे जारत हैं यामों या जनायो कि तुमहूं देव
दूषण हो तुमहूं को दहि हैं ॥ ८ ॥ सागरके मद रह्यो कि हमको कोऊ ना नांघि
सकिहै सो नांघिकै ता मदको झारि डारचो अर्थ दूरि करचो औ चिकारिकै गर्जि-
कै त्रिकूट नाम जो लंकापुरीको पर्वत है ताके देहमें अर्थ सब पर्वतघेरमें बिहारि
कहे नीके प्रकारसों ढूंढिकै स्त्री भवनादि देखिकै छयो कहे रहत भयो ॥ ९ ॥

मू०-गंगोदकछंद ॥ रामराजानकेराजआइयेइहांधामतेरम-
हाभागजागेअबै । देविमंदोदरीकुंभकर्णादिदैमित्रमंत्रीजितैपूं-
छिदेखौसबै । राखिजैजातिकोभांतिकोंवंशकोंसाधिजैलौकमें
लोकपलौंकको । आनिकैपांपरोदैसुलैकौशलैआसुहोइशमा-
ताहिलैओकको ॥ १० ॥ रावण ॥ लोकलोकेशसोंशोचिगा-
रचैंअपनीअपनीसींवसोंसोरहै । चारिबाहैंधरेविष्णुरक्षाकरैं
वातसांचीयहैवेदवाणीकहै ॥ ताहिभूमंगहीदेवदेवेशसोंविष्णु
ब्रह्मादिदैरुद्रजूसंहरै । ताहिहोंछोड़िकैपायँकाकेपरौंआजुसंसा-
रतोपायँमेरेपरै ॥ ११ ॥ मदिराछंद ॥ रामकोकामकहारिपु-
जीतहिंकौनकबैरिपुजीत्योमहा । बालिबलीछलसोंभृगुनंदन
गर्वसहोद्विजदीनमहा ॥ दीनसोक्योंछितिक्षत्रहत्योबिनप्राण-

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

( १६६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
निहैहयराजकियो । हैहयकौनवह्रैबिसरचोजनखेलतहीतुलैं
बांधिलियो ॥ १२ ॥
टी०-जा स्त्रीके संग राज्याभिषेक होइ सो देवी कहावै ॥ "देवी कृताभिषेका-
यामित्यभिधानचिंतामणिः"॥१०॥ कल्पांतके अंतमें ब्रह्मा सृष्टि रचत हैं विष्णु
रक्षा करत हैं सो ताहि कहे लोक सृष्टिको औ देवेश इन्द्र औ विष्णु औ ब्रह्मादि
दै जे देव हैं तिन्हें रुद्र जे महादेव हैं ते भू जो भौंहहै ताके भंगही टेढ़ी करनेहीसों
संहारकालमें संहारकरि डारत हैं ॥ ११ ॥ छत्र कहे छत्रवर्णः ॥ १२ ॥
मू०-अंगद-विजयछंद ॥ सिंधुतरयोउनकोबनरातुमपैध-
नुरेखगईंतरी । बांध्योइबांधतसोनबँध्योउनबारिधिबांधिकै
बाटकरी ॥ अजहूँरघुनाथप्रतापकीबाततुन्हेंदशकंठ Santana जानिप-
री। तेलनितूलनिपूंछिborder/जरीनजरीजरीलंकजराइपरी ॥ १३ ॥
मेघनाद् ॥ छांडिदियोहमहींवनरावहपूंछकीआगनलंकज री ।
भीरमेंअक्षमत्र्योचपिबालकवादिहिंजाइप्रशास्तिकरी ॥ ताल
बिंधेअरुसिंधुबँधेयहचेटकविक्रमकौनकियो । बानरकौनरकौ
वपुरापलमँसुरनायकबांधिलियो ॥ १४ ॥
टी०-बांध्योई कहे हनुमानको बंधन तुम काहूविधिसों करिबोहू करचौ ताहू
पर बांधत ना बन्यौ तेल औ तूल कहे रूईयुक्त जो वस्तु होतिहै सो विशेष जरति
है सो या प्रकारकी पूंछ तुम करी सो ना जरी औ केवल सुवर्ण औ रत्ननमें अग्नि
प्रज्वलित नहीं होति परंतु तुम्हारी लंका तृणादि रहित केवल रत्नादिके जरायमों
औौ जरत भई रामके प्रभावसों ऐसी अनहोनी बातें होंती हैं ताहूपर तुम्हें नहीं
जानि परत इतिभावार्थः ॥ १३ ॥ वादि कहे वृथा प्रशास्ति कहे स्तुति सप्तताल
बेध्यो औ सिंधु बांध्यो यह चेटक कहे भगरविद्या है सरस्वती उक्तार्थः ॥ जो
रामचन्द्र तालवेधन सिंधुबंधन करचौ सो तो चेटक कहे भगर विद्यासम है अर्थ खेल
समहै यामें कौन विक्रम कहे अतिबल कियौहै ॥ "विक्रमस्त्वतिशक्तिता इत्यमरः” ॥
अर्थ वै चाहें तौ त्रैलोक्यको संहार करिदारें सिंधुबंधादि सदृश कर्मनमें उनको
कौन श्रम है ऐसे प्रबल वे ना होते तौ जिन हम पलमें सुरनायकको बांधि लियो
ते बानर औ नरको वपुरा है जाते अर्थ हम इंद्र लोकादिमें जाइकै इन्द्रादिको

षोडशप्रकाशः १६. ( १६७ )

जीत्यौ औ वै हमपर चढ़ि आये हैं हम वपुगसम कछु करि नहीं सकत अथवा वपुरा
समुझि हमपर चढ़िआये हैं ॥ १४ ॥
मू०-अंगद ॥ चेटकसोंधनुभंगकियोप्रभुरावरेकोअतिजीर-
नहो । बाणसमेतरहपचिकैतुमजासपैंनतज्योथलुहो ॥ बाण
सुकौनबलीवालिकेसूतवैबलिबावनबांधिलियो। ओइसोतौजिन
कीचिरचेरिननाचनचाइकैकैछांडिदियो ॥१५॥ रावण ॥ नील
सुखेनहनू उनकेनलऔरसबैकपिपुंजतिहारे । आठहु आठदिशा
बलिदैअपनोपदुलैपितुजालगिमारे ॥ तोसेसपूतहिजाइकैकैवालि
अपूतनकीपदवीपगुधारे । अंगदसंगलेमैरो सबैदलआजुहिक्यों
नहैनवपमारे ॥ १६ ॥ दोहा ॥ जोसुतअपनेबापको, बैरनलेइ
प्रकाश । तासोंजीवतहीमरचो, लोगकहैंतजि त्रास ॥ १७॥
टी०-कवित्तमें उक्ति मेघनादकी है औ जवाब रावणको अंगद दियो ता
जवाबहीसों या जानो कि रामचन्द्र सिंधुबंधनादि मम शंभु धनुषभंग चेटकहीसों
कियो है यह बात रावण कह्यो है अंगद कहत हैं कि प्रभु जे रामचन्द्र हैं तिन
चेटकसों धनुष भंग कीन्हौं औ तुम कहत हौ कि जीरण कहे पुरानो रहै परन्तु
तुमको पुरानो तो रहै पै बाणसमेत तुम पश्रम करि पचिकै कहे थकि कै
रहिगये ताहूपर थलहू ना छांडयो अर्थ रंच ना उठयों ॥ १५ ॥ नील, सुखेने,
हनूमान औ सुग्रीव औ राम लक्ष्मण औ विभीषण ये जे आठ हैं [अस्पष्ट]
नील सुखेनादि चारि वानर उनके सुग्रीवके हैं ते वालिके भयसों भागि रहे तब
संगरहे यासों या जनायो कि जो रामचन्द्र आज्ञाहूं करें औ तिनहीकि मोहसों तिनहीं
वै तिहारो राज्य न दियो चाहैं तौ सब वानर तेरेई साथी है हैं तासों तू आठहूं
आठ दिशा बलिद जे रामचन्द्र हैं आठ दिशनके आठ जो इन्द्रादि दिक्पाल हैं ते
हैं बलिदकहे भेंटक दाता जिनके अर्थ इन्द्रादि दिक्पाल जिनकर भेंट देतहैं तिनहीं
सों आपनो पद जो राज्यहै ताको ले जाके लिये सुग्रीव तिहारे पितुको मारिडारचो
है काहेते राज्य तिहारे पिताको है रामचन्द्र मर्यादापुरुषोत्तम हैं जो तू कहिहै तौ
तोकों विशेष देहं । “बलिदैत्योपहारयोरित्यभिधानचिन्तामणिः” ॥ बापमारे कहे
जो तेरे बापको मारचो है ॥ १६ ॥ १७ ॥

मू०-अंगद॥इनकोबिलगुनमानिये,क‍हिकेशवपलआधुपानी
पावकपवनप्रभु, ज्योंअसाधुत्योंसाधु॥१८॥रावण॥द्रुतविलंबि
तछंद॥ उरसिअंगदलाजकछूगहौ।जनकघातकवातवृथाकहौ॥
सहितलक्ष्मणरामहिंसंहरौ। सकलवानरराजतुम्हेंकरौ ॥१९॥
टी०-बिलगु कहे द्वेष साधु कहे भलो असाधु कहे बुरो ॥ १८ ॥ जनक
पिता सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे अंगद तुम रामचन्द्रसों मिलिबेकों हमकों कहत हौ
यामें तुमको कछु लाज नहीं होत ऐसी बात कहि कछु लाज तौ उरमें गहौ काहेते
कि तुम्हारे जनक बालि तिनके जे घातक रामचन्द्र हैं तिनकी बात वृथा है यह तुम
कहौ अर्थ रामचन्द्रकी बात वृथा नहीं होति जो मनमें संकल्प करतहैं सो करिबोई
करत हैं यासों या जनायो कि अति बली बालिके वध करिबेको संकल्प कियो सो
वध करिबोई कियो तैसे वै तो हमारे मारिबेको संकल्प करै हैं यह संकल्प वृथा काहू
उपायसों न ह्वै है तासों मैं लक्ष्मण सहित रामहिसों संहरौं कहे संहारनाशकों प्राप्त
होत हौं अर्थ लक्ष्मण सहित राम मोहिं मारतहीहैं नहीं तो ऐसो हित सीख तुमको
दियो है जासों सब वानरनको राजा तुमको करौं अर्थ सुग्रीवसों छोरि तुम्हारो
राज्य तुम्हें देऊँ अथवा जनकघातक जे सुग्रीवहैं तिनकी बात वृथा कहत हौ
अर्थ जो तुम्हारे पिताको मारचो ताकी तुम बड़ाई वृथा करत हौ मैं लक्ष्मण सहित
राम करिकै संहरौं कहे नाश कों प्राप्त होत हौं नहीं तो सुग्रीवको मारि सब वान-
रनकौ राजा तुमकों करौं ॥ १९ ॥
मू०-अंगद-निशिपालिकाछंद ॥ शत्रुसबमित्रहमचित्तपाहिं
चानहीं । दूतविधिनूतकबहूंनउरआनहीं ॥ आपुमुखदेखि
अभिलाषअभिलाषहू । राखिभुजशीशतबऔरकहँराखहू
॥ २० ॥ रावण-इन्द्रवज्राछन्द ॥ मेरीबड़ीभूलसोकाकहौंरे ।
तेरोकह्योदूतसबैसहैंरे ॥ वैजोसबैचाहततोहिंमारचो । मारों
कहातौहिंजो दैवमारचो ॥ २१ ॥ अंगद-उपेन्द्रवज्राछन्द ॥
नराचश्रीरामजहींधरैंगे। अशेषमाथेकटिभूपरैंगे ॥ शिखाशि-
वाश्वानगहैंतिहारी । फिरैंचहूँवोरनिरैविहारी ॥ २२ ॥

षोडशप्रकाशः १६. ( १६९ )

टी०-तुम्हारी जो यह नूतन कहे नवीन दूतविधि कहे दूतता तोर फोर है ताको
कबहूं न उरमें आनि हैं पाइ है ॥ २० ॥ २१ ॥ नराच वान निगैंविहारी राव-
णको संबोधन है अथवा शिवा औ श्वान औ और जे निगैविहारी काकादि हैं ते
तिहारी शिखा गहे तिहारे शिरको लिये फिरेंगे ॥ २२ ॥
मू०-रावण भुजंगप्रयातछन्द ॥ महामीचुदासीसदापाईँ-
धोवै । प्रतीहारहै कै कृपाशूरसोवै ॥ क्षपानाथलीनहेरहैछत्र-
जाको । करैगो कहाशत्रुसुग्रीवताको ॥ २३ ॥ सकामेघ-
माला शिखीपाककारी । करैकोतवालीमहादंडधारी ॥ पढ़ैवेद
ब्रह्मासदाद्वारजाके । कहाबापुरोशत्रुसुग्रीवताके ॥ २४ ॥
टी०-अंगदकहो कि श्रीराम बाण धरिकै तुमको मारिहैं ताको उत्तर रावण
दियो कि महामीचुजो है सो मेरे सदा पाईं धोइवेके अर्थ दासीहै याते अति
न्यूनदासी जनायो एकशत एक मीचु हैं तामें शत अकालमीचु हैं एक महामीचु
है शतमीचु उपायोंसों दूरि होती हैं एक महामीचु काहू उपायोंसों नहीं मिटति ।
यथा भावप्रकाशे “एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रयच्छते । तत्रैकः कालसंयुक्तः
शेषास्त्वागंतवः स्मृताः” । यामों या जनायो कि युद्धादिमें मरिबो तो अकाल-
मृत्यु है सो मेरे समीप कैसे आइ है ॥ २३ ॥ सका कहे सक्का पाककारी रसों-
ईदार ॥ २४ ॥
मू०-अंगद-विजयछन्द ॥ पेटचढ़्योपलनापलिकाचढ़िपा-
लकिहूचढ़िमोहमढ़योरे । चौकचढ़्योचित्रसारीचढ़्योगजवा-
जिचढ़योगढ़गर्बचढ़योरे । व्योमविमानचढ़्योईसहाकलिनि-
वसोंकबहूंनपढ़योरे । चेततनाहींरह्योचढ़िचित्तसोंचाहतमूढ़
चिताहूचढ़योरे ॥ २५ ॥
टी०-प्रथमहिं पेटमें चढ्यो कहे गर्भमें आयो जब जन्म भयो तब पलनामें
चढिकै झूल्यो कछू और बडो भयो पलिका जो खट्टा है तामें चढि सोवन
लाग्यो औ जब व्याह भयो तब पालकीमें चढि व्याहने चल्यो तब मोह जो
माया है तामें मढ्यो कहे युक्त भयो फेरि पाणिग्रहणमें चौकमैं चढ्यो फेरि
स्त्रीके संग चित्रसारीमें चढ्यो फेरि राजा हैकै गजवाजिमें चढ्यो औ गढपर

( १७० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चढ्यो औ गर्वपर चढ्यो अर्थ राज्याभिमान भयो औ जेहि कहे जाते अर्थ जाकी
कृपासों व्योममें विमानन पर चढ्योई रह्यो अर्थ पुष्पकादि विमानन पर चढ्यों
आकाश आकाश फिरत रह्यो केशव कहत हैं कि सो जो वह प्रभु रामचन्द्र हैं
ताकों कबहूं न पढ्यो अर्थ राम नाम कबहूं न जप्यो सो हे मूढ ! अब चिताहू
पर चढ्यो चाहत हैं ताहू पर तेरी चित्त चढि रह्यो हैं कहे मत्त है रह्यो है तामें तू
चेतत नहीं अर्थ चेत नहीं करतो चिताहूमें चढ्यो चाहत है यह कहि या जनायो
कि रामचन्द्र तोहि शीघ्रही मारि हैं तासों उनके शरणमों जाइकै आपनो
भलो करु ॥ २५ ॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद ॥ निकारयोजोमैं पालियोरा-
जजाको । दियोकाढिकैजूकहात्रासताको ॥ लियेबानराली-
कहौंबाततोसों। सोकैसेलरैरामसंग्राममोसों ॥ २६ ॥ अंगद-
बिजयछन्द ॥ हाथीनसाथीन

यहाँ पृष्ठ के पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Markdown/देवनागरी) प्रस्तुत है:

षोडशप्रकाशः १६. ( १७१ )
ताकी आली कहे समूह अर्थ जिनमें अनि अग्नि है ऐसे बाण लिये हैं अथवा र
कहे तीक्ष्ण जे बाण हैं तिनकी आली कहे पंक्तिसमूह इनि तिनको लिये हैं सो
रामचंद्रके संग्राममों मोसों कहे हम ऐसो प्राणी कैसे जुरै अर्थ हम उनके युद्ध
करिवे लायक नहीं हैं। 'रस्तीक्ष्णे दहने इत्यभिधानचिंतामणिः।' 'पुस्यालिविश-
दाशये त्रिषु स्त्रियां पश्यायां सेतौ पंक्तौ च कीर्तिता' इत्यभिधान चिंतामणिः॥२६॥
वित्त धन ॥ २७॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद॥ डरैगायविप्रैअनाथैजोभाजै।
परद्रव्यछोडैपरस्त्रीहिलाजै॥ परद्रोहजासों नहोवैग्तीको। मुकैसै
लरैवेषकीन्हैयतीको॥२८॥ दोहा॥ गेंदकरेउमैंखेलको, हरगिरि
केशौदास। शीशचढायेआपने, कमलसमानसहास॥ २९ ॥
टी०-जे रामचन्द्र गाय औ विप्रको डगत हैं अथ अतिदीन गाय औ विप्र
तिनहूँको डरात हैं तासों अति कादरहैं औ अनाथ जे प्राणी हैं जिनकी नाथ
कोऊ नहीं है ताहीको भजै कहे सेवन करत हैं अर्थ ताहीसों संग करत हैं यामों या
जनायो कि भयसों रंचकहूँ परद्रव्य नहीं लै सकत हमारो राज्य कैसे लें हैं औ पर
स्त्रीको लजातहैं यासों या जनायो कि जे स्त्रीको लजात हैं ते वीरनसों कहा
धृष्टता करि हैं औ जिनमों परद्रोह कबहूं रत्तीहूभरीनाहीं हैं सकत आशय कि शत्रुता
करते डगतहैं औ ताहूपर वेष यती तपस्वीकी घरेहैं अर्थ वेषहू वीरको नहीं है सो
मोसों कैसे लरि हैं सरस्वती उक्तार्थः-मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तासों ब्रह्मशाप गोशापको
डेरातहैं भृगु लातहू मारचो ताहू पर कछू ना करचो अनाथ जे प्रह्लाद सम्भादि हैं
तिनके निकट ही रहे जा भांति कष्ट भयो ताही विधि निकट वर्गी...
औ परद्रव्य परस्त्री हरनमें पाप होत है तासों त्याग करत हैं औ परद्रोह कासों
रत्तीहूभरि नाहीं होत यासों समदर्शी जानां सबको समान हैं तिनसों हम कैसे
लरैं अर्थ वै ईश्वर हैं वेष कहे रूप मात्र यती को कीन्हे हैं ॥ २८॥२९॥
मू०-अंगद-दंडक ॥ जैसोतुमकहतउठायोएकगिरिवरऐसे
कोटिकपिनकेबालकउठावहीं। काटेजोकहतशीशकाटतघनेरे
घाघभगरकेखेलेकहाभटपदपावहीं ॥ जीतयोजोसुरेशरणशा-
पऋषिनारिहीकोसमुझहुहमद्विजनातेसमुझावहीं । गहौराम
पायँसुख पाइकैरंतपी तप सीताजूको देहु देव दुंदुभी बजा-

( १७२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

दर्दी ॥३०॥ रावण-वंशस्थछंद॥ तपीजपीबिप्रनिछिप्रहीहरौं ।
अदेवद्वेषीसबदेवदंसहरौं ॥ सियानदेहौंयहनेमजीधरौं । अमा-
नुषीभूमिअवानरीकरौं ॥३१॥ अंगद-विजयछंद ॥ पाहनते
पतिनीकरिपावनटूककियोहरको धनुको रे। छत्रबिहीनकरे
क्षणमेंक्षितिगर्वहर्यौतिनकेबलको रे ॥ पर्वतपुंजपुरैनिकेपात
समानतरेअजहूंधरको रे । होइँनरायणहूँपै नयेगुणकौनईहां
नरवानरको रे ॥ ३२ ॥ रावण-चंचरीछंद ॥ देहिंअंगदरा-
जतोकहंमारिवानरराजको।बांधिदेहिंबिभीषणै अरुफोरिसेतुस-
माजको ॥ पूंछजाराहंअक्षरिपुकीपाइंलागहिंरुद्रके । सीयकोत-
वदेहूरामहिंपारजाइंसमुद्रके ॥ ३३ ॥
टी०-घाघ कहे नटादि इंद्रजालिका॥ ३०॥ सरस्वती उक्तार्थः-हे अंगद !कहै केशव
हौं कि तपी औ जपी जे विप्रहैं अथवा तपी औ जपी औ विप्रनको छिमहीं हरौं
कहौं कि तपी औ जपी जे विप्र हैं अथवा तामें कछूविचार नहीं करत औ अदेव
जे दैत्य जे राक्षस हैं तिनके द्वेषी शत्रु देवता हैं तिन्हें छिमहीं संहरत हौं कहे मारतहौं
यासों हौं बडो पापीहौं सो सियाको न देहौं यह नेम जो जीमें धरतहौं सो अब कहे
या समयमों अमानुषी कहे नाहीं हैं मानुष्य जहां औ अनरी कहे नाहीं हैं कोऊ
काहू को अरि शत्रु जहां ऐसी जो भूमि कहे स्थान है विष्णुलोक ताको करों कहे
साधत हौं । 'भूमिः क्षितौ स्थानमात्रे' इति अभिधानचिंतामणिः । ब्रह्मदोष देव-
दोषादि बडे पातकनसों छूटिबेको उपाव और नहीं है तासों सीताको नहीं देतो
कि सीताके लिये आइकै रामचंद्र मोहिं मारिहैं तौ सब पातकनसों छूटिकै
विष्णुलोक जैहौं इति भावार्थः ॥ ३१ ॥ अजहूं कहे अबहूं अर्थ एतेहूपर तौ
धरकौ कहर करौ ॥ ३२ ॥ सरस्वती उक्तार्थः यामें प्रहस्तादि मंत्रिनप्रति का-
कोक्ति है रावण कहत है कि हे अंगद ! तुम तौ नीकी शिष देतहौ परंतु प्रह-
स्तादि मंत्रिनकरि दी कर्मवश मेरी ऐसी दुर्मति है कि जब रामचंद्र येती बातें
करें तब सीताको देहुं सो ऐसो काहेको कैहैं तासों दुर्मति कृत हमारी मृत्यु विशेष
सो ह्वै चुको यह निश्चय जानौं ॥ ३३ ॥
मू०-अंगद-लंकालाइगयो बलीहनुमंतसंतनगाइयो ॥ सिंधु
बांधतशोधिकैनलंकछीरछीटबहाइयो । ताहितोहिंसमेतअंधउ-

( १७३ )

खारिहौंउलटीकरौं। आजुराजकहाँविभीषणबैठिहैं तेहितेडरौं॥
॥ ३४ ॥ दोहा ॥ अंगदरावणकोमुकुट, लैकरिउड्योसुजान ।
मनोचलोयमलोकको, दशशिरकोप्रस्थान ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिन्द्र-
जिद्विरचितायामंगदरावणसंवादवर्णनं नाम षोडशः प्रकाशः ॥ १६ ॥
टी०-क्षीर कहे जल ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायतजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां अंगदसंवादवर्णन नाम षोडश प्रकाशः ॥ १६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्रहवेंप्रकाशमें, लंकाकोअवरोध । शत्रुच-
मूवर्णनसमर, लक्ष्मणकौ परबोध ॥१॥ अंगदलैवामुकुटको, परे
रामकेपाइ ॥ रामविभीषणकेशिरसि, भूषितकियोबनाइ ॥ २ ॥
मू०-पद्धतिकाछंद ॥ दिशिदक्षिणअंगदपूर्वनील ॥ पुनि
हनूमंतपश्चिम सुषेण ताल ॥ दिशिउत्तरलक्ष्मणसहितराम । सुग्रीव
मध्यकीन्हेविराम॥३॥ सँगयूथपयूथपवलबिलास । पुरफिरत
विभीषणआसपास ॥ निशिवासरसबकोलेतसोध । यहिभांति-
भयो लंकानिरोध ॥४॥ तबरावणसुनिलंकानिरोध । उपजौत-
नमन अतिप्रचंडक्रोध ॥ राख्योप्रहस्तहठिपूर्वपौरि । दक्षिणहिं-
महोदरगयोदौरि ॥५॥ भयोइंद्रजीतपश्चिमदुवार । हैउत्तरराव-
णबलउदार । कियोबिरूपाक्षथितमध्यदेश । कैरॅनरान्तकच-
हुंचाप्रवेश ॥६॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ अतिद्वारद्वारमहँयुद्धभये ।
बहुऋच्छकंचरनलागिगये ॥ तबस्वर्णलंकमहँशोभभई। जनुअ-
ग्निजवालमहँधूममई ॥ ७ ॥
टी०-अवरोध घेरनो औ विभीषणकरि शत्रु जो रावण हैं ताके चमूको वर्णन
है परमोत्कर्ष ॥ १ ॥ २ ॥ रामचंद्रके औ लंकाके मध्यमें सुग्रीव विश्राम
कीन्हे हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ छंद उपजातिहै ॥ ७ ॥

( १७४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

मू०-दोहा ॥ मरकतमणिके शोभिजै, सबैकँगूरचारु ॥
आइगयो जनुदानको, पातककोपरिवारु ॥ ८ ॥ कुसुमविचित्रा
छंद ॥ तवनिकसोरावणसुतशूरो । जेहिरनजीत्योहरिखलपू-
रो ॥ तपबलमायातमउपजायो। कपिदलकेमनसंभ्रमछायो ॥
॥ ९ ॥ दोधकछंद ॥ काहुनदेखिपरेवहयोधा । यद्यपिहैंसिगरे
बुद्धिबोधा ॥ शायकसोंअहिनायकसाध्यो । सोदरस्योरघुना-
यकबांध्यो ॥ १० ॥ रामहिंबांधिगयोजबलंका । रावणकी
सिगरीगईशंका । देखिबंधेतबसोदरदोऊ । यूथपयूथत्रसेसब-
कोऊ ॥ ११ ॥ स्वागताछंद ॥ इंद्रजीततेहिलैउरलायो । आ-
जुकाजसबमोमनभायो ॥ कैबिमानअधिरूढतिधाये। जानकी
हिरघुनाथदेखाये ॥ १२ ॥ राजपुत्रयुतनागनिदेख्यो । भूमि-
युक्तरुचंदनलेख्यो ॥ पन्नगारिप्रभुपन्नगसाईं । कालचालक-
हुजानिनजाई ॥ १३ ॥ दोहा ॥ कालसर्पकेकवलते, छोरत-
जिनकोनाम॥ बँधेतेब्राह्मणवचनवश, मायासर्पहिराम ॥१४॥
टी०-कंगूरनमें ऋक्ष लपटे हैं तासों मानों मरकत मणिहीके कंगूरा शोभित
हैं पातक देवदोष ब्रह्मदोषादि ॥ ८ ॥ हरि इन्द्र ॥ ९ ॥ बुद्धि बोधाकहे बुद्धि-
युक्त ॥ १० ॥ ॥ ११ ॥ तेहि रावण इंद्रजीतको उरमें लगायो ॥ १२ ॥
भूमिमें युक्त कहे गिरे चंदन वृक्षहू नागयुक्त रहतहैं दुःखयुक्त सीता यह कहत
भई कि हे पन्नगारिप्रभु ! हे पन्नगसांई ! पन्नग जे सर्प हैं यात... अरि कहे
भक्षक जे गरुड हैं तिनके तुम स्वामी हौ यासों या जनायो कि तुम्हार वाहनजे
गरुड हैं. ते अनेक सर्प भक्षण करतहैं औ पन्नगसांई कहि या जनायी कि तुम
सदा सर्प ही पर सोयो करत हौ ते तुम नागपासमें बाँधे हौ तौ काल जो समयहै
ताकी चाल कछू जानि नहीं परति वलाबल समय ही नत उन्नतको उन्नत नत
करत है इति भावार्थः ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ पन्नगारितबहींतहँआये । कालजाल-
सबमारिभगाये ॥ लंकमांझतबहींगइसीता । आनन्दकंदनव-

लोकिसुगीता ॥ १५ ॥ गरुड-इंद्रवज्राछंद ॥ श्रीरामनारा-
यणैलोक कर्त्ता । ब्रह्मादिरुद्रादिकैदुःखहर्त्ता ॥ सीतेशमोको-
कछूदेहुशिक्षा । नान्हींबडीईशजोहोइइक्षा ॥ १६ ॥ राम ॥
कीबेहुतोकाजसबैसोकीन्हों । आयेइहांमोकंसुखदीन्हों ॥
पांलागिबैकुंठप्रभाविहारी। स्वर्लोकगोततक्षणविष्णुधारी॥१७॥
इंद्रवज्राछन्द ॥ धूम्राक्षआयोजनुदंडधारी।ताकोहनूमनभयेप्र-
हारी॥जितेअकंपादिबलिष्ठभारे।संग्राममें अंगदवीरमारे ॥१८॥
उपेंद्रवज्राछंद ॥ अकंपधूम्राक्षहिजानिजूस्यो । महोदरैरावण-
मंत्रबूझ्यो॥सदाहमोरतुममंत्रबादी।रैकहहोतैअतिही विषादी ॥
टी०-॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ छंद उपजाति है ॥ १८ ॥ विषादी कहे
दुखी उदासीन इति ॥ १९ ॥
मू०-महोदर ॥ कहैजोकोऊहितवंतबानी । कहौसोतासों
अतिदुःखदानी ॥ गुनीनदावैबहुधाकुदावै ॥ सुधीतबैसाध-
तमौनभावै ॥ २० ॥ कहोशुकाचार्य्यसुहौंकहौजूं । सदातु-
म्हारोहितसंग्रहौजूं ॥ नृपालभूमौविविधचारिजानों । सुनो
महाराजसबैबखानों ॥ २१ ॥ भुजंगप्रयातछंद ॥ यहैलो-
कएकै सदासाधिजानै । बलीबैनज्योंआपुहीईशमानै ॥
करैसाधनाएकपरलोकहीको । हरिश्चन्द्रजैसेगयेदैमहीको
॥ २२ ॥ दुहूंलोककोएकसाधैंसयाने । बिदेहीनज्योंवेद-
बानीबखाने ॥ नटैलोकदोऊहठीएकऐसे । त्रिशंकैहँसैंज्यों-
भलेऊअनैसे ॥ २३ ॥ दोहा ॥ चहूंराजकोमैंकहूँ, तुमसों
राजचरित्र ॥ रुचैसोकीजैचित्तमें, चिंतहुमित्र अमित्र
॥ २४ ॥ चारिभांतिमंत्रीकहे, चारिभांतिकेमंत्र ॥ मोहिंसु-
नायोशुकजू, सोधिसोधिसबतंत्र ॥ २५ ॥

( १७६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

टी०-जो कोऊ तुम्हारे हितकी बात कहत है तासों कहे प्राणीको तुम
दुखदा कहे दुखदायक कहत हौ अथवा दुखदानी कहे कटुबाद कहतहौ औ दांव
कुदांव कहे समय कुसमयको गुनत नहीं हौ अर्थ जा समय मोंको करिबो
उचित है ताको बिचार नहीं करत हौ आपने मनहींकी करत हौ तासों अथवा
दांवको नही गुनत हौ बहुधा कुदांवहीको गुनत हौ तासों सुधी जे सुबुद्धि है
मंत्री जन ते मौनभावको साधत हैं कहे चुपहै रहत हैं ॥ २० ॥ २१॥
॥ २२॥ २३॥ मित्र कहे हित अमित्र कहे अहितकी चिंता करौ कि कौन
चरित्र हमको हित है कौन अहित है अथवा सब मंत्रिन मंत्र कह्यौ है तामें मित्र
अमित्रकी चिंता करौ कि कौन हितकी कहत है औ कौन अहितकी कहत
है ॥ २४ ॥ चारि भांतिके मंत्री हैं औ चारि भांतिके मंत्र होत हैं तंत्र कहे
सिद्धांत अथवा तंत्र शास्त्र ॥ २५ ॥
मू०-छप्पै ॥ एकराजकेकाजहतैंनिजकारजकाजे । जैसेर-
थनिकारिसबैमंत्रीसुखसाजे ॥ एकराजकेकाजआपनेकाज
बिगारत।जैसेलोचनहानिसहीकविबलिहिनिवारत॥एकप्रभूस
मेतअपनोभलोकरतदाशरथिदूतज्यों। एकआपनोप्रभुकोबुरो
करतरावरोपूतज्यों ॥ २६ ॥ दोहा ॥ मंत्रजोचारिप्रकारके,-
मंत्रिनकेजेप्रमान ॥ बिषेदाडिमबीजसे, गुडसेनीबसमान ॥
॥ २७ ॥ चंद्रवर्त्मछंद ॥ राजनीतिमततत्वसमुझिये। देश-
कालगुणियुद्धअरुझिये ॥ मंत्रिमित्रअरिकोगुणगहिये । लोक
लोकअपलोकनबहिये ॥ २८ ॥
टी०-दाशरथि दूत अंगद औ हनुमान सीताको देहु तुमसों इत्यादि संघिकी
बातैं कहि आपने प्रभुको काज साधत हैं औ युद्धमें आपनो मरण घातादि बचाइ
आपनो हित करत हैं औ रावरो पूत युद्ध कराइ आपनी औ तुम्हारीऊ मृत्यु
कियो चाहत है ॥ २६ ॥ विषसे खातहूंमें कटु औ गुण जिनको मृत्युदायक है
औ दाडिम बीजसे खातहूंमें मधुर औ गुण जिनको पुष्टि कर्त्ता है औ गुडसे
खातमें मधुर गुण दुखद है औ नीबसे खातमें कटु गुण सुखद है ॥ २७ ॥
कहूं यह पाठ है कि और विचार तत्व सब लहिये तौ उपजाति चंद्रवर्त्म छंद
जानौ ॥ २८ ॥

Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:

सप्तदशप्रकाशः १७. (१७७)
मू०-रावण ॥ चारिभांतिनृपतातुमकहियो ॥ चारिमंत्रिम
तमैनमग़हियो ॥ राममारिसुरएकनबचिहैं ॥ इंद्रलोकबसो
बासहिरचिहैं ॥ २९ ॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ उठिकैप्रहस्तसजि-
सेनचले । बहुभांतिजाइकपिपैंजदले ॥ तबदौरिनीलउठिसु-
ष्ट्रिहन्यो । असुहीनगिरद्योसुवमुंडसन्यो ॥ ३० ॥ वंशस्थ-
छंद ॥ महाबलीजूझतहीप्रहस्तको । चल्योतहींरावणमीडिए-
स्तको ॥ अनेकभेरीबहुदुंदुभीबजैं । गयंदक्रोधांधजहांतहांग-
जैं ॥ ३१ ॥ सनीरजमीमूतनिकासशोभहीं । बिलोकिजाको
सुरसिद्धक्षोभहीं ॥ प्रचंडनैऋत्यसमेतिदेखिये । सप्रेतमानों
महाकाललेखिये ॥ ३२ ॥ बिभीषण-वसंततिलकाछंद ॥ को
दंडमंडितमहारथवंतजोहै । सिंहध्वजासमरपंडितवृन्दमोह्रै ॥
माहाबलीप्रबलकालकरालनेता । सामेघनादसुरनायकयुद्ध
जेता ॥ ३३ ॥
टी०-रामचन्द्रको मारिकै औ सुर देवता येकौ ना मोंसों बचिहैं अर्थ सब देव
नहूंको मारिकै इंद्रलोकमें बसोबास रचिहों सरस्वती उक्तार्थ-रामचंद्र जैहैं ते हमें
मारिकै एको देवतान बचिहैं कहे बाकी रहिहैं सब देवनको बसोबास इंद्रलोक
में रचिहैं अर्थ हमारे भयसों इंद्रलोकसों भागिकै देवता कंदरादिकनमें जाइ
बसे हैं तिन्हें निर्भय करिकै इंद्रलोकमें बसाइ हैं ॥ २९ ॥ छन्दउपजाति है ॥
॥ ३० ॥ ३१ ॥ सनीर कहे सजल जीमूत कहे मघनके निकास सदृश शोभित
है क्षोभहीं कहे डेरात हैं नैऋत्य राक्षस ॥ ३२ ॥ रामचन्द्र पूंछतौहै इति कथा
शेषः नेता कहे दंड कर्त्ता ॥ ३३ ॥
मू०-जोव्याघ्रवेषरथव्याघ्रनिकेतधारी । संरक्तलोचनकुबेर-
विपत्तिकारी ॥ लीन्हेंत्रिशूलसुरशूलसमूलमानों । श्रीराघवेंद-
द्रअतिकायब हैसोजानों ॥ ३४ ॥ जोकांचनीयरथशृंगमयूर
माली । जाकेउदारउरषण्मुखशक्तिशाली ॥ स्वर्धामधामहर-
१२

Here is the complete, line-by-line transcription of the page into Devanagari text, following the original layout and spelling:

( १७८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कीरतिकैनजानी । सोईमहोदरवृकोदरबंधुमानी ॥ ३५ ॥
जाकेरथायपरसर्पध्वजाविराजै । श्रीसूर्यमण्डलविडंबनज्योति
साजै ॥ आखंडलीयवपुजोतनत्राणधारी । देवांतकैसोसुरलो-
कविपत्तिकारी ॥ ३६ ॥ जोहंसकेतुभुजदंडनिषङ्गधारी । सं-
ग्रामसिंधुबहुधाअवगाहकारी ॥ लीन्हीछँडाइजेहिदेवअदेव
वामा । सोईखरात्मजबलीमकराक्षनामा ॥ ३७ ॥
टी०-त्रिशूल कैसो है सुर जे देवताहैं तिनको मानौं समूल कहे पूर्णशूल कहे
मृत्युहै । “शूलोस्त्री रोगआयुधे मृत्युकेतनयोगेषु ” इतिमेदिनी ॥ ३४ ॥ कांच-
नीयरथ कहे सुवर्णको रथ ताके शृंगमें अग्रभागमें मयूरनकी मालापंगति
लगी है अर्थ मयूरध्वजी है जाकी शक्ति बरछी षण्मुख जे स्वामिकार्त्तिक हैं

सप्तदशप्रकाशः १७. ( १७९ )
गृहगोपुरेषु सुनिर्वृतास्तिष्ठतु निर्विशंकाः ॥ इहागतं मां सहितं भवद्भिर्व्रनौकसः
छिद्रमिदं विदित्वा । शून्यां पुरीं दुःप्रसहां प्रमथ्य प्रधर्षयेयुः सहसा समेताः ॥
विसर्जियित्वा सचिवांस्तस्ततान् गतेषु रक्षस्सु यथा नियोगे ॥'' सो गिरिजे पर्वतहैं
तिनके ग्राम कहे समूह लै लैके हरि जे वानरहैं तिनको समूह मारतहै तिन गिरि
समूहनमें रावण पद्मिनी कमलिनी पत्रमें दंतीसम विहार कौतुक करतहै अर्थ
गिरि ग्राम रावण की देहमें दंतीकी देहमें पद्मिनीपत्र सम लागत है ॥ ४०॥
मू०-सवैया ॥ देखिबिभीषणकोरनरावणशक्तिगहीकररोष
रहींहै। छूटतहीहनूमंतसोंबीचहिंपूंछलपेटिकैडारिदईहै॥ दूसरि
ब्रह्मकीशक्तिअमोघचलावतहीहाइहाइभई है। राख्योभलेशर-
णागतलक्ष्मणफूलिकैफूलिसीओढिलई है ॥ ४१॥ सुग्विनी-
छंद ॥ जोरहींलक्ष्मणैलेनलाग्योजहीं।मुष्टिछातीहनूमंतमारयो
तहीं॥ आशुहीप्राणकोनाशसोह्वैगयो। दंडद्वैतीनमेंचेतताको
भयो॥ ४२॥ मरहट्टाछंद ॥ आयोडरिप्राणनिलैधनुबाणनि-
कपिदलदियोभगाइ ॥ चढिहनूमंतपररामचन्द्रतबरावणरों-
क्योजाइ ॥ धरिएकबाणतबसूत्तछत्रध्वजकाटेमुकुटबनाइ ॥
लागेदूजो शरछूटिगयोबरुलंकगयोअकुलाइ ॥४३॥ दोधक-
छंद॥ यद्यपिहैअतिनिर्गुणताई। मानुषदेहधरेरघुराई ॥लक्ष्मण-
रामजहीं अवलोक्यो॥ नैननतेनरह्योजलरोक्यो॥४४॥राम॥
वारकलक्ष्मणमोहिं बिलोको । मोकहँप्राणचलेतजिरोको ॥
हौंसुमिरौंगुणकेतिकतेरे । सोदरपुत्रसहायकमरे ॥ ४५ ॥
टी०-फूलिकै प्रसन्न ह्वैकै ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ हनूमानसों प्राणनको डरिकै
कपि दलको भगायो जाय तहां हनूमान क्यों न गये तौ जब रावण वा ठोरसों
भागो तब लक्ष्मणको लै हनूमान रामचन्द्रके पास गये इतिकथाशेषः ॥ ४३ । '
॥ ४४ ॥ ४५ ॥
मू०-लोचनबाहुतुहींधनुमेरो । तूबलबिक्रमवारकहेरो ॥ तू-
बिनहौंपलप्राणनराखौं । सत्यकहौंकछुझूठनभाखों ॥ ४६ ॥

( १८० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मोहिंरहीयतनीमनशंका । देननपाइबिभीषणलंका ॥ बोलिउ-
ठौप्रभुकोप्रणपारो । नातरुहोतहैमोमुखकारो॥४७॥विभीषण-
सुंदरीछंद ॥ मैंबिनऊंरघुनाथकरौअब । देवतजोपरिदेवनको
सब ॥ औषधिलैनिशिमैंफिरिआवहि॥केशवसोसबसाथजिआ
वहि॥४८॥सोदरसूरकोदेखतहीमुख॥रावणकेपुरवैसिगरेसुख॥
बोलसुनेहनुमंतकरच्योप्रन । कूदिगयोजहँ औषधिकोबन॥४९॥
टी०-बल कहे सैन बिक्रम पराक्रम ॥ ४६ ॥ प्रभु जो मैं हौं ताको विभी-
षणको लंकदान रूपी जो प्रण है ताको पारोकहे पूरण करौं ॥ ४७ ॥ हे रघु-
नाथ ! जो मैं बिनऊं कहे बिनती करत हौं सो तुम करो हे देव ! सब मिलिकै
परिदेवन जो बिलाप है ताको छोड़ि देहु ॥ “बिलापः परिदेवनमित्यमरः”॥४८॥
प्रथम कह्यो है कि औषधि लै कै निशिहींमें फिरि आवै ताको हेतु कहत हैं सोदर जे
लक्ष्मण हैं सूर जे सूर्य हैं तिनको मुख देखतही रावणके सिगरे सुख पुरवैं कहैं
पूरित करिहैं अर्थ सूर्योदय भये लक्ष्मण न जीहैं या प्रकारको विभीषणको बोल
सुनिकै निशिहीमें हम औषधि ल्याइ हैं हनुमंत यह प्रण करचो ॥ ४९ ॥
मू०-रागषट्पद ॥ करिआदित्यअदृष्टनष्टयमकरौंअष्टबसु ।
रुद्रनबोरिसमुद्रकरौंगंधर्बसर्वपसु ॥ बलितअबरेकुबेरबलिहि-
गहिदेउंइन्द्रअब । विद्याधरनिअबिद्यकरौंबिनसिद्धिसिद्धसब ॥
निजहोहिदासिदितिकीअदितिअनिलअनलमिटिजाइजल ।
सुनि सूर जसूरजउदतहींकरौं असुरसंसारबल ॥ ५० ॥ भुजंग-
प्रयातछंद ॥ हन्योबिघ्नकारीबलीबीरबामैं । गयोशीघ्रगामी-
गयेएकधामैं ॥ चल्योलैस बैपर्बतैकैप्रणामैं ॥ नजान्यो-
बिशल्यौषधीकौनतामैं ॥ ५१ ॥
टी०-रामचन्द्र सुग्रीवसों कहत हैं कि जो सूर्य उदयको प्राप्त होई तौ जेते
देवता हैं तिनकी सबकी आयुर्दशा करौं औ देवनके शत्रु जे असुर दैत्यहैं तिनको
बल संसारभरेमों करि देउं अर्थ तीनों लोकमें दैत्यनको राज करि देउं दिति
दैत्यनकी माता अदिति देवनकी माता ॥ ५० ॥ बामकहे कुटिल ऐसा जो