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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 169

पंचदशप्रकाशः १५. ( १६३ )
षिमर्मसकलजोलह्यो । जाहुसुमतिरावणवह अंगदसनयों-
कह्यो ॥ ४२ ॥ चंचलाछंद ॥ रामचन्द्रजूकहंतस्वर्णलंकदे-
खिवैखि । ऋक्षवानरालि ओरओरचारिहूविशेषि ॥ मंजुकं-
जगंधलुब्धसौरभीरसीविशाल । केशौदासआसपासशोभिजै-
मनोमराल ॥ ४३ ॥
टी०-नवल कहे अनेक रंग मिश्रित हैं अंशु कहे किरण जाके ऐसे जे
सूर्य हैं तिन सहित मानों कलिंदगिरि श्रृंगते हंस कहे हंस समूह उड़िगयो है
यहाँ जातिविषे एक बचन है हंसनके सदृश श्वेत छत्र हैं औ सूर्यनके सदृश
अनेक रंग नग जटित मुकुट हैं ॥ ४१ ॥ दक्षिण गिरि कहे समुद्रके दक्षिण
कूलकी गिरि समुद्र पारको गिरि इति मर्म भेद ॥ ४२ ॥ सौर भीर सम ऋक्ष
हैं मराल हंस सम वानर हैं ॥ ४३ ॥
मू०-ताम्रकोटलोहकोटस्वर्णकोटआसपास । देवकीपुरी
घिरीकिपर्वतारिकेविलास ॥ बीचबीचहैकपीशबीचबीचचक्र-
क्षजाल । लंककन्यकागरेकिपीतनीलकंठमाल ॥ ४४ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र-
चन्द्रिकायामिन्द्राजिद्विरचितायां रामसैन्यसमुद्रतरणं
नामपंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
टी०-अर्थ इंद्रकी शत्रुतासों मानो पर्वतन देवपुरीको घेरिलियों है देवपुरी
सदृश स्वर्णकोट है जाके मध्यमें पुरी है औ ताके आस पास ताम्रादिके कोट
हैं ते पर्वत समान हैं यासों या जनायो कि लंका देवपुरी सम है ॥ ४४ ॥
टी०-॥ । इति श्रीमज्जगज्जननीजनकराजकुमारीजानकीजानिप्रसादायजनजानकी-
प्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां पंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
मू०दोहा-यह वर्णनहैषोडशे, केशवदासप्रकास । रावण
अंगदसोंविविध, शोभितवचनविलास ॥ १ ॥ अंगदकूदि
गयेतहाँ, आसनगतलंकेश । मनुमधुकरकरहाटपर, शोभि-