रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहविहारछयोजू। सीयनिहारिसंहारिकैराक्षसशोकअशोकबनीहि
दयोजू। अक्षकुमारहिमारिकैलंकहिजारिकैनीकेहिजातभयोजू ९
टी०-महोदरने पूंछी कि तुम तहां कौन भांतिसों रहत हौ अर्थ कौने
कामके अधिकारी हौ तब अंगद कह्यो है हम राजाके इहां प्रेषक कहे यथोचित
स्थानमें दूतनके पठावनहार हैं अर्थ दूतनके नायक हैं लोक लाज दुरयो रहे
यह कहि अंगद या जनायो कि हमारे सैन्यमें ऐसो कोऊ नहीं है
जाको काहूं बांध्यो माग्यो होइ ॥ ६ ॥ ७ ॥ पाछे अंगद कह्यो है कि हम लंक
नायकके दूत हैं सो रावण पूछ्यो कि लंकनायक को है जाके तुम दूत हौ तब
अंगद कह्यो है कि विभीषण लंकनायक है कैसो है विभीषण जे देवतनके दूषण
कहे पीडा करनहार हैं तिनको दहै कहे जारत हैं यामों या जनायो कि तुमहूं देव
दूषण हो तुमहूं को दहि हैं ॥ ८ ॥ सागरके मद रह्यो कि हमको कोऊ ना नांघि
सकिहै सो नांघिकै ता मदको झारि डारचो अर्थ दूरि करचो औ चिकारिकै गर्जि-
कै त्रिकूट नाम जो लंकापुरीको पर्वत है ताके देहमें अर्थ सब पर्वतघेरमें बिहारि
कहे नीके प्रकारसों ढूंढिकै स्त्री भवनादि देखिकै छयो कहे रहत भयो ॥ ९ ॥
मू०-गंगोदकछंद ॥ रामराजानकेराजआइयेइहांधामतेरम-
हाभागजागेअबै । देविमंदोदरीकुंभकर्णादिदैमित्रमंत्रीजितैपूं-
छिदेखौसबै । राखिजैजातिकोभांतिकोंवंशकोंसाधिजैलौकमें
लोकपलौंकको । आनिकैपांपरोदैसुलैकौशलैआसुहोइशमा-
ताहिलैओकको ॥ १० ॥ रावण ॥ लोकलोकेशसोंशोचिगा-
रचैंअपनीअपनीसींवसोंसोरहै । चारिबाहैंधरेविष्णुरक्षाकरैं
वातसांचीयहैवेदवाणीकहै ॥ ताहिभूमंगहीदेवदेवेशसोंविष्णु
ब्रह्मादिदैरुद्रजूसंहरै । ताहिहोंछोड़िकैपायँकाकेपरौंआजुसंसा-
रतोपायँमेरेपरै ॥ ११ ॥ मदिराछंद ॥ रामकोकामकहारिपु-
जीतहिंकौनकबैरिपुजीत्योमहा । बालिबलीछलसोंभृगुनंदन
गर्वसहोद्विजदीनमहा ॥ दीनसोक्योंछितिक्षत्रहत्योबिनप्राण-