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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 269 में से

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पृष्ठ 168

( १६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
नक्षत्रकी शोभा लैके चन्द्रमा आपु धारण करै तब जाके मुखके सम होय ॥
‘ऋक्षस्तुस्यानक्षत्रमृक्षभल्लयोः-इत्यभिधानचिंतामणिः’ ॥ रावणकी मीचु कैसी
है कि कुंत जो बरछी है सो है ललित कहे लचकति जाके अर्थ बरछी हाथमें
लिये है अथवा कुंतल जो भालाहैं सोहैं ललित कहे अति तीक्ष्ण जाको अर्थ
हथियारको धरे है ॥ “कुंतलोभल्लकेशयोरित्यभिधानचिंतामणिः ॥” औ
नील कहे श्यामवर्ण है औ भ्रुकुटी भौंह हैं धनुषसम विकराल जाकी इहां कवि
क्रूर स्त्री करि वर्णन है तासों भौंहनकी धनुषकी क्रूरता धर्म करि साम्य जानौ
औ नयन हैं कुमुद् कहे कुत्सित है मुद आनंद जिनमें ऐसे हैं जाके अर्थ राव-
णके वधको आनंद है विभीषणके राज्यलाभादि उत्सवको आनंद नहीं है अथवा
नयन हैं कुमुद कहे मुद जो आनंद है प्रसन्नता इति तासों रहित अर्थ अतिको-
पसों अरुण अति विकरालहैं प्रशस्त नहीं हैं औ कटाक्ष हैं बाणसम कराल जाके
औ सबल कहे बुद्धिवल सहित सदा हैं इहां बलपदते बुद्धिवल जानौ अर्थ बुद्धि-
बलसों सीता हरणादि कार्य कराइ रामचन्द्रसों विरोध कराइ दियो तार कहे
उच्चस्वर करिकै सहित है सुसुग्रीवा जाकी सुष्ठु पदको अर्थ यह कि ऐसी उच्च-
स्वर करिवेकी शक्ति और काहूकी ग्रीवामें नहीं है औ अंगद जो विजायत हैं
तेहि आदि भूषण कहे नहीं है अर्थ मुंडमालादि क्रूर भूषण पहिरे हैं औ मध्य
कहे अधम अनुत्तमेति हैं देश कहे जाके अंग ॥ “मध्यंविलग्नेन स्त्रीस्यान्न्याय्यें-
ऽतरेऽधमेऽपिचेति मेदिनी ॥” औ केशरी जो सिंह है ताकी गजपर ऐसी गति भाई
है जाको अर्थ जैसे गजके मारिवेको सिंह चलत है तैसे रावणके मारिवेको चली
आवाति है औ रामचन्द्रको जो विग्रह विरोध है सोई है अनुकूल हित जाको
अर्थ रामचन्द्रके विरोधहीसों है कार्यसिद्धि जाकी औ सब कहे पूर्ण अनेक लक्ष
जे ऋक्ष भालु हैं तिनको है बल जाके औ ऋक्षराज जे जाम्बवंत हैं तिनको ऐसो
है मुखजाको ॥ ४० ॥
मू०-हीरकछंद ॥ रावणशुभश्यामलतनुमंदिरपरसोहियो ।
मानहुदशशृंगयुतकलिंदगिरिबिमोहियो॥ राघवशरलाघवगति
छत्रमुकुटयोंहयो । हंससबलअंशसहितमानहुउडिकैगयो
॥ ४१ ॥ लजितखलतजिसुथलभाजिभवनमेंगयो । लक्षण
प्रभुतलक्षण गिरिदक्षिणपरसोभयो ॥ लंकनिरखिअंकहर-