रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
( ११० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जो वनमें वायु योगसों फैलि रह्यो है ताको आघ्रानकै ताके अनुसार शूर्पणखा
रामचंद्रके पास आई इति भावार्थः ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
मू०-शूर्पणखा-सवैया ॥ किन्नरहो नररूपबिचक्षणयच्छकी
स्वच्छशरीरनिसोहौ । चित्तचकोरकेचंदकिधौंमृगलोचनचा-
रुबिमाननिरोहौ । अंगधरेकि अनंगहौ केशव अंगी अनेकनके-
मनमोहौ । बीरजटानिधरेधनुबाणलियेबनिताबनमेंतुमकोहौ
॥ ३४ ॥ राम-मनोरमाछंद ॥ हमहैं दशरथमहीपतिकेसुत ।
शुभरामसुलक्ष्मण नामनसंयुत ॥ यहशासनदैपठयेनृपकानन।
मुनिपालहुमारहुराक्षसकेगन ॥३५॥ शूर्पणखा॥नृपरावणकी-
भगिनीगनि मोकहँ। जिनकीठकुराइतितीनहुलोकहँ॥ सुनिजैदु
खमोचनपंकजलोचन। अबमोहिंकरोपतिनीमनरोचन ॥३६॥
तोमर छंद ॥ तबयोंकह्योहँसिराम । अबमोहिंजनिसवाम ॥
तियजायलक्ष्मणदेखि समरूपयौवनलेखि ॥३७॥ शूर्पणखा-
दोधकछंद ॥ रामसहोदरमोतनदेखो । रावणकीभगिनीजिय-
लेखो ॥ राजकुमाररमोसँगमेरे । होहिंसबैसुखसंपतितैरे
॥ ३८ ॥ लक्ष्मण ॥ वैप्रभुहोंजनजानिसदाई । दासिभये-
महँकौनिबड़ाई ॥ जौभजियेप्रभुतौप्रभुताई ॥ दासिभये
उपहास सदाई ॥ ३९ ॥
टी०-विचक्षणप्रवीण चित्तरूपी जो चकोर हैं ताके चंद्रमाही जैसे चन्द्रमा
चकोरको सुख देत है तैसे तुम चित्तको सुख देत हौ चंद्रमा मृगनके विमान
रथको रोहत है अर्थ चढत है तुम मृगरूपी जे लोचन हैं तिनहीके विमानको
रोहतहौ अर्थ जो तुमको कोऊ देखत है ताके नयननमें ऐसे बसि जात हौ कि
उतरत नहीं ॥ ३४ ॥ शासन आज्ञा ॥ ३५ ॥ हे मन ! रोचन अर्थ मेरे मनको
तुम अति रुचत हौ ॥ ३६ ॥ आपने रूप औ यौवन संग इन्हें लेखि कहे जानु
अर्थ जैसो रूप यौवन तेरो है तैसो इनहूंको है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मदाई जन हौं
कहि या जनायों कि कबहूं प्रभुता हैबेकी आशा नहीं है ॥ ३९ ॥
मू०-मल्लिकाछंद॥ हासकेबिलासजानि। दीहमानखंडमा-
नि ॥ भक्षिबेकोचित्तचाहि। सामुहेभईसियाहि ॥ ४० ॥ तो
मरछंद ॥ तबरामचन्द्रप्रवीन । हँसिबंधुत्यौंहगदीन ॥ गुनि-
दुष्टता सहलीन । श्रुतिनासिकाबिनुकीन ॥ ४१ ॥ दोहा-
शोन छिंछिछूटतबदन, भीमभईतेहिकाल ॥ मानोकृत्याकुटि-
लयुत, पावकज्वालकराल ॥ ४२ ॥
इति श्रीमत्सकलो कलोचनचकोरचिन्तामणि-श्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजि-
द्विरचितायां शूर्पणखाश्रवणनासिकाछेदनं नामैकादशः प्रकाशः ॥११॥
टी०-जब जान्यौ कि ये मोसों रमिहैं नहीं केवल मोसों हासके बिलास उप-
हास करत हैं तब दीह कहे बडो आपनो मानखंड कहे अपमान मानिकै॥ ४०॥
॥ ४१ ॥ कराल पावक ज्वाल-सों युक्त है वदनजाको ऐसी मानो कृत्यानामा
देवी है ॥ “कृत्याक्रियादेवतयोगितिमेदिनी” ॥ ४२ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायामेकादशः प्रकाशः ॥ ११ ॥
मू०-दोहा ॥ या द्वादशे प्रकाशखर, दूषण त्रिशिरानाश ॥
सीताहरणविलाप सु,-ग्रीवमिलन हरि त्रास ॥ १ ॥
टी०-त्रासजो भय है ताको हरिकै सुग्रीवको मिलन हैं अर्थ बालिको वध
निश्चय करि सुग्रीवको त्रास हरि रामचन्द्रमित्रता करि हैं ॥ १ ॥
मू०-तोटकछंद ॥ गइशूर्पणखाखरदूषणपै । सजिल्याइति-
न्हैंजगभूषणपै ॥ शरएकअनेकतेदूरिकिये । रविकेकरज्यौंत-
मपुंजपिये ॥ २ ॥ मनोरमाछंद ॥ वृषकेश्वरदूषणज्यौंखरदू-
षण । तबदूरिकियेरविकेकुलभूषण ॥ गदशत्रुत्रिदोषज्यौंदूरि
करैवर । त्रिशिराशिरत्यौंरघुनंदनकेशर ॥ ३ ॥ भजिशूर्पण-
खागइरावणपैतब । त्रिशिराखरदूषणनाशकहेसब॥ तबशूर्पण-
( ११२ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
खासुरवातसबैसूनि । उठिरावणगोमारीचजहाँमुनि ॥ ४ ॥
मनोरमाछंद ॥ रावणबात कहीसिगरीत्यों । शूर्पणखाहिंविरूप
करीज्यौं ॥ एकहिरामअनेक संहारे । दूषणस्यौंत्रिशिराखर
मारे ॥ ५ ॥ तूअबहोहिसहायकमेरो । हौंबहुतैगुणमानिहौँते-
रो ॥ जोहंरिसीतहिल्यावनपैहौं । वैभ्रमिकोकनहींमरिहैंहैं॥६॥
मारीच ॥ रामहिंमानुपकै जनिजानो । पूरणचौदहलोकबखा-
नो ॥ जाहुँजहाँतिय लैसुनदेखो । हौंहारिकोजलहूँथललेखो॥७॥
टी०-रामचन्द्रकी आज्ञासों लक्ष्मण सीताको लैके गुफामें राख्यो है यह
कथा शेष जानो ॥ २ ॥ वृष राशिके रवि जे शेखर कहे तृणके दूषण होत है
सुखाइ डारत हैं तैसे रविके कुलके पूषण जे रामचन्द्र हैं तिन खर औ दूषण
नाम राक्षस को दूरि कियो कहे मारयो औ गेद शत्रु जो वैद्य है सो जैसे त्रिदोष
कहे कफ पित्त वात तीनोंको दोष एकही बार दूरि करत हैं तैसे रघुनंदनके शर
त्रिशिराके शिरनको एकही बार दूर करयों ॥ ३ ॥ ४ ॥ स्यों कहे सहित ॥५॥
सीताको ढूंढत भूतलमें भ्रमि कहे भूमिकै अथवा संदेहमो प्राप्त व्हैकै ॥ ६ ॥
चौदहों लोकमें पूर्ण कहे व्याप्त ॥ ७ ॥
मू०-रावण-सुन्दरीछंद ॥ तूअबमोहि सिखावत हैशठ । मैं
वशजगतकियोहठहीहठ ॥ बेगिचलेअबदेहिनऊतरु । देव
सबैजएकनहींहरु ॥ ८ ॥ दोहा ॥ याचिचल्योमारीचमन,
मरणदुहूँविधिआसु ॥ रावणकेकरनरकहै, हरिकरहरिपुरबासु॥
॥ ९ ॥ राम-सुंदरीछंद ॥ राजसुताइकमंत्रसुनोअब । चाहत
हौंभवभारहरेउसब ॥ पावकमेंनिजदेहहिंराखहु । छायशरीर
मृगहिअभिलाषहु ॥ १० ॥ चामरछंद ॥ आइयो कुरंगएक
चारुहेमहीरको । जानकी समेतचित्तमोहि रामवीरको ॥ राज
पुत्रिकासमीपसाधुबंधुंराखिकै। हाथचापबाण लैगयेगिरीशनां-
१ सूर्य्य. २ रोग.
द्वादशप्रकाशः १२. (११३)
धिकै ॥ ११ ॥ दोहा ॥ रघुनायकजबहींहन्यो, सायकशठ
मारीच ॥ हालक्ष्मणयहकहिगिरेउ, श्रीपतिकेस्वरनीच ॥
॥ १२ ॥ निशिपालिकाछंद ॥ राजतनयातबहिंबोलसुनियों
कहेउ। जाहुचलिदेवरनजातहमपैरहेउ । हेममृगहोहिंनहींरै-
निचरजानिये । दीनस्वररामकेहिभाँजिमुखआनिये ॥ १३ ॥
टी०-एक हर महादेवको छोडिकै और सब देवता मेरेजन कहे सेवक हैं ॥
॥ ८ ॥ आशु कहे जल्दी ॥ ९ ॥ छाया शरीरसों मृगै कहे चलिबेको अभि-
लाष करौ अर्थ छाया शरीर आलंब्य रहौ अथवा छाया शरीरसों या सुवर्णमृगको
अभिलाषी ॥ १० ॥ हेम सुवर्ण औ हीरनको कुरंग हरिण बनि मारीच आयो
॥ ११ ॥ जैसो रामचन्द्रको स्वरकहे शब्द है ताही स्वरसों हा लक्ष्मण यह
कहिकै गिरचौ नीच मारीचको विशेषण है ॥ १२ ॥ यह कोऊ राक्षस है हरिण-
को रूप धरिकै आयो है ताने रामचन्द्रको मारचो तासों हा लक्ष्मण ऐसो दीन-
स्वर रामचन्द्र कह्यो इति भावार्थः ॥ १३ ॥
मू०-लक्ष्मण ॥ सोचअतिपोचउरमोचुदुखदानिये । मातु
यहबातअवदातमममानिये ॥ रैनिचरछद्मबहुभाँतिअभिलाष-
हीं । दीनस्वररामकबहूंदनमुखभाषहीं ॥ १४ ॥ चंचलाछंद ॥
पक्षिराजयक्षराजप्रेतराजयातुधान । देवताअदेवतानृदेवताजि-
तेजहान ॥ पर्वतारिअर्बखर्बसर्बसर्बथाबखानि । कोटिकोटिसूर
चन्द्ररामचन्द्रदासमानि ॥ १५ ॥ चामरछन्द ॥ राजपुत्रि-
काकह्योसोऔरकोकहैसुनै । कानमूंदिबारबारशीशबीसधा-
धुनै ॥ चापकीयरेखखाँचिदेवसाखिदैचले । नांघिहैंतेभस्म
होहिंजीवजेबुरेभले ॥ १६ ॥
टी०-अति पोच कहे निषिद्ध जो दुःखदानि सोच है ताको उरसों मोचु कहे
त्याग करौ छद्म कपट ॥ १४ ॥ पक्षिराज गरुड यक्षराज कुबेर प्रेतराज यम-
राज यातुधान राक्षस देवता औ अदेवता दैत्य नृदेवता राजा औ पर्वतारि इंद्रेते
ये सब अर्ब खर्ब संख्या परिमित औ अर्बखर्ब सर्वकहे महादेव अर्बखर्बको संबंध
( ११४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
सर्वपदहूमें है तिन्हें सर्वथा कहे सब प्रकार बखानि कहे कहौं औ कोटि सूर्य औ
चन्द्रमा हैं तिन सबको रामचन्द्रके दास कहे सेवक मानौ रामचन्द्रके मारिवे
लायक ये कोऊ नहीं हैं इति भावार्थः ॥ १५ ॥ लक्ष्मणको राजपुत्रिकाने जे
कटुवचन कहे तिन्हें और कौन कहै औ कौन सुनै अर्थ अतिकटुवचन कहे जे
काहूके कहिवे सुनिबे लायक नहीं हैं औ जो थोरो सुनिबोहू करै तौ जामें आगे
और ना सुनिपरै तालिये कान मूंदिकै बिनसुने वचननके शोकसों बीसधा अर्थ
अनेक प्रकारसों शीश धुनै अथवा सीताही कान मूँदिके शीश धुनत भई कान
मूंदिवेको हेतु यह जामें लक्ष्मणके ये बोध वचन न सुनिपरै तौ लक्ष्मण वातै ना कहैं
रामचन्द्रके पास जाइ अथवा जामें कटुवचन ना सुनिपरै तालिये लक्ष्मणहीं कान-
को मूंदिकै वारवार शीशधुनतभये ॥ १६ ॥
मू०-छिद्रताकिछुद्रराजलंकनाथआइयो । भिक्षुजानिजान-
कीसोभीषकोबोलाइयो ॥ शोचपोचमोचिकैसकोचभीमवेष-
को । अंतरिक्षहींकरीज्यौंराहुचंद्ररेखको ॥ १७ ॥ दण्डक ॥ धू-
मपुरकेनिकेतमानोंधूमकेतुकी शिखाकीधूमयोनिमध्यरेखसु-
धाधामकी । चित्रकीसीपुत्रिकाकीरूरैबयरूरैमां हशम्बरछोडा-
इलईकामिनिकीकामकी ॥ पाखंडकीश्रद्धाकीमठे शबशएकाद-
शीलीन्हीकैश्वपचराजशाखाशुद्धसामकी । केशवअदृष्टसाथ
जीवजीतिजैसीतैसीलंकनाथहाथपरीछायाजायारामकी ॥१८॥
टी०-क्षुद्रनको राज जो लंकनाथ है सो छिद्र कहे अवसर ताकि भिक्षुककहे
दंडीरूप धरिकै सीतापै आयो शूर्पणखाकी नासिका काटेको जो पोच कहे बुरो
शोच है सीता हरण निश्चय करि ताको मोचिकै छोडिकै अथवा पोच रावणको
विशेषण है औ भीमवेषको जो संकोच सिकोरनो रह्यो ताको मोचिकै अर्थ जो
लघुशरीर करचोरहै ताको बडाइक अंतरिक्ष आकाश ॥ १७ ॥ धूमपुर के निकेत
कहे घरमें अर्थ धूम समूह में धूमकेतु जो अग्नि है ताकी शिखाज्योति है कि
धूमयोनि जे मेघहैं तिनके मध्यमें सुधाधाम जो चन्द्रमा है ताकी रेखा कहे
कलाहै कि रूरेकहे बडे बघरूरै कहे बौंडर वायु ग्रंथि करिकै प्रसिद्ध है तामें
चित्रपुत्रिका है किं शंबरनामा जो दैत्य है सो कामको शत्रुहै तेहि काम की
द्वादशप्रकाशः १२. (११५)
कामिनी रतिको छडाइ लीन्ही है कि पाखंडके वशमों श्रद्धापरी है यह कथा
विज्ञानगीतामें प्रसिद्ध है कि मठपतिके वश एकादशी परी कि श्वपचराजु चांडा-
लन को राजा शुद्धसामवेद की शाखा लीन्होंहै अष्ट कर्मके साथ में जैसी जीवं
ज्योति परी है तैसी छाया कृत जो राम की जाया सीता है सो लंकनाथ के
हाथ में परी ॥ १८ ॥
मू०-सीताजू-हरिलीलाछंद॥हारामहारमनहाररघुनाथधीर।
लंकाधिनाथवशजानहूँमोहिंवीर ॥ हापुत्रलक्ष्मणछोडावहुबे-
गिमोहिं। मार्त्तंडवंशयशकीसबलाजतोहिं ॥१९॥ पक्षीजटायु
यहबातसुनंतधाइ। रोक्योतुरंतबलरावणदुष्टजाइ॥कीन्हों प्रचंड
रथछत्रध्वजाबिहीन। छोड्योविपक्षतबभोजबपक्षहीन ॥२०॥
संयुताछंद॥ दशकंठसीतहिलेचल्यो।अतिवृद्धगीधहियोदल्यो॥
चितजानकीअधंकौकिये। हरितीनिद्वैअवलोकिये ॥ २१ ॥
पदपद्मकीशुभघूंघरी। मणनीलहाटकसेंजरी ॥ जनुउत्तरीय
विचारिकै । शुभडारिदीयगठारिकै ॥२२॥ दोहा ॥ सीताके
पदपद्मको, नूपुरपटजनिजानु। मनहुँकरयोसुग्रीवचर, राजश्री
प्रस्थानु॥२३॥यद्यपिश्रीरघुनाथजू, समसर्वगसर्वज्ञ।नरकैसी
लीला करत, जेहिमोहतसबअज्ञ ॥२४॥ राम-सवैया॥ निज
देखोंनहीँशुभगीतहिसीतहिकारणकौनकहै।अबहीँ।अतिमोहि-
तकैबनमांझगई सुरमारगमैमृगमारच्योजहीं ॥ कटुबातकहूतुम
सोंकहिआईकिधौँतेहित्रासडेराइरहीँ। अबहैयाहपर्णकुटीकिधौँ
और किधौंवहलक्ष्मणहोइनहीँ ॥ २५ ॥
टी०- ॥ १९ ॥ प्रचंडपदजटायुरावणरथतीन्योकोविशेषण ह्वै सकते है विपक्ष
शत्रु रावण ॥२०॥ तीनि औ द्वै कहे पांच अथवा द्वै तीनि कहिबेकी रीति शुभा-
वोक्ति है हरि वानर ॥२१॥ उत्तरीय ओढिबेको वस्त्र ॥२२॥ जब प्रस्थान भयो तब
आप आयोई चाहै ॥ २३ ॥ सम कहे सदा एक रस रहत हैं और सर्वग कहे सर्वत्र
व्याप्त हैं और सर्वज्ञ कहे सबजानत हैं ॥ २४ ॥ जो हमारे स्वरसों हा लक्ष्मण यह
( ११६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
कहिके मृग मरयो है सो हमारो शब्दजानि ताही स्वरके मार्ग ह्वै हमारे बडे
हितसों बनके मध्यमें गई है कि हे लक्ष्मण ! यह पर्णकुटी है कि कछू औरई वस्तु
है औ कि वह पर्णकुटी नहीं है और ई पर्णकुटी है ॥ २५ ॥
मू०-दोधकछन्द॥ धीरजसोंअपनोमनरोक्यो । गीधजटायु
पर्योअवलोक्यो ॥ छत्रध्वजारथदेखिकैबूझैउ । गीधकहौरण
कौनसोजूझेउ ॥ २६ ॥ जटायु ॥ रावणलैगयोराघवसीता ।
हारघुनाथरटैशुभगीता ॥ मैंबिनछत्रध्वजारथकीन्हों । ह्वैगयो
हौंवलपक्षविहीनो ॥२७॥ मैंजगमेंसबतेबडभागी । देहदशा
तबकारणलागी ॥ जो बहुभांतिनवेदनगायो।रूपसोंमैंअवलो-
कनपायो ॥२८॥ राम ॥ साधुजटायुसदाबडभागी । तोमन-
मोवपुसोंअनुरागी ॥ छूट्योशरीरसुनीयहबानी । रामहिमेंतब
ज्योतिसमानी ॥ २९ ॥ तोटकछंद ॥ दिशिदक्षिणकोकरिदा-
हचले । सरितागिरिदेखतवृक्षभले ॥ बनअंधकवंधबिलोकत
हीं। दोउसोदरखैंचलियेतबहीं ॥३०॥ जबखैवेहिकोजियबुद्धि
गुनी । दुहुँबाणनिलैदोउबाहिहनी॥वहँछाडिकैदेहचल्योजवहीं
यहव्योममेंबातकह्योतबहीं ॥ ३१ ॥ तोटकछंद ॥ पीछे
मधवामोहिंशापदई । गंधर्वतेराक्षसदेहभई॥ फिरिकैमघवास-
ह्युद्धभयो । उनकोधकैशीशमेंवज्रहयो ॥ ३२ ॥
टी०-॥२६ ॥ २७ ॥ दशा अवस्था अर्थ यह कि यह देह गृध्रकी औ यह
वृद्धावस्था तुम्हारे कछू उपकारके लायक नहीं रही तासों तुम्हारोउपकार भयो
औ ऐसो जो तुम्हारो रूप है ताकों देख्यो तासों जगमें मैं सबसों बडभागी
हौं ॥ २८ ॥ अर्थ सायुज्य मुक्ति पायो ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१॥ बाहु दई पर्यन्त
तीनिछंदके क्षेपकहैं पीछेकहे पूर्वहीं ॥ ३२ ॥
मू०-दोहा ॥ गयोशीशगडिपेटमें, पर्योधरणिपरआय ॥
कछुकरुणाजियमोंभई, दीन्हीबाहुबढ़ाय॥३३॥बाहुदई द्वैको-
शक्ती, आवैतेहिगहिखाउँ ॥ रामरूपसीताहरण,उधरहुगहनउ
पाउ॥३४॥सुरसरितेआगेचले,मिलिहैंकपिसुग्रीव।दैहैंसीताकी
खवरि, बाढैसुखअतिजीव ॥३५॥ तोटकछंद ॥ सरिताएकके-
शवसोभरई । अवलोकितहांचकवाचकई ॥ उरमेंसियप्रीतिस-
माइरही । तिनसोंरघुनायकबातकही ॥ ३६ ॥ अवलोकतहौं
जबहींजबहीं। दुखहोततुम्हैंतबहींतबहीं॥ वहबैरनचित्तकछूध-
रिये । सियदेहुबताइ कृपाकरिये ॥ ३७॥ शशिकेअवलोकन
दूरिकिये । जिनकेमुखकीछविदेखिजिये। कृतचित्तचकोरकछू-
कधरौ । सियदेहुबताय सहायकरौ ॥ ३८ ॥
टी०-॥३४॥करुणा करिकै द्वै कोश कि वाहु दई औ यह वर दियो कि जो इन
बाहुनके मध्यमें आवै ताको खाहु जब सीताहरण हैहै तब रामचन्द्र या मग अइहैं
तिनके गहन उपाय सों उद्धरहु कहै तुम्हारो उद्धार होई अर्थ जब रामचन्द्रको इन
बाहुनसों गहिहै तब तेरो उद्धार हैहै ॥ ३४ ॥ सुरसरि गोदावरी ॥ ३५ ॥३६ ॥
जब सीताको तुम अवलोकत रहे कहै देखत रहौ तब अपनासों अधिक सुन्दर
सीताके कुच देखि तुम्हारे दुख होत रहै अथवा हमको संयोगी देखत तासों
तुम्हारे दुःख होत रह्यो ॥ ३७ ॥ शशि जो अति सुन्दर जिनके मुखको देखि
शशिकी ओर विलोकिबो छोड़ि केवल जिनके मुखकी छविको देखिकै जियत
रहेहौ अथवा शशिके अवलोकन दर्शन दूरिकिये पर अर्थ जब कृष्णपक्षमें चन्द्रमा
आपनो दर्शनदृष्टि सों दूरि कियो न देखि परयो तब चन्द्रसम केवल जिनके
मुखकी छविको देखि जियत रहे हौ वह कृत कहै उपकार कछु चित्तमें धरिकै
सीताको बताइ देउ ॥ ३८ ॥
मू०-सवैया ॥ कहिकेशवयाचककेअरिचंपकशोकअशोक
लियेहरिकै । लखिकेतककेतकिजातिगुलाबतेतीक्षणजानितजे
डरिकै ॥ सुनिसाधुतुम्हैं हमबूझनआयेरहेमनमौनकहाधरिकै ।
सियकोकछुसोधुकहौकरुणामयसोकरुणाकरुणाकरिकै॥३९॥
नाराजछंद॥ हिमांशुमूरसोलगैसोबातबज्रसोबहै। दिशालगैंकु-
( ११८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शानुज्यौविलेपअंगकोदहै ॥ विशेषिकालरातिलोकरालराति
मानिये । वियोगसीयकोनकाललोकहारजानिये ॥ ४० ॥
टी०-रामचन्द्र करुण वृक्षसों कहत हैं कि चम्पक जेहैं ते याचकर्क अरि शत्रुहैं
पुष्पनको याचक जो भ्रमर है ताकों निकट नहीं आवनदेत चंपकमें भ्रमर नहीं
बैठत यह प्रसिद्ध है ता भयसों चंपक सो सीताको सोधु नहीं जांचे अशोक जे
वृक्ष हैं तिनकं शोककों हरिकै छोडिकै अशोक यह जो नाम है ताको लीन्हों
है तासों जिनहूको तज्यौहै कि जिनके शोक हैही नहीं ते हमारो दुःख देखि
दुःखी है कृपा करि सीताको सोधु काहेको बताई है केतक केवरा औ केतकी
औ गुलाब इनकी जाति जे और कंटक वृक्ष हैं कमलादि तिन्हें तीक्ष्ण कहे कंट-
कित जानिकै डरिकै तज्यौ है सो हे करुणा कहे करुण वृक्ष ! करुणा कहे
दीनतामय जे हमहैं तिनसों सीताको कछू सोधु कहौ ॥३९॥ रामचन्द्र लक्ष्मणसों
कहत हैं कि हिमांशु जो चन्द्रमा है सो हमको सूर्य सम तप्त लागत है औ वायु
वज्रसम बहात है औ दशों दिशा अग्निके समान तप्तलागतिहैं औ तुम जो
शीतलताके अर्थ हमारे अंगनमें विलेप करतहौ सो अंगनकोजारतहै औ राति
काल राति समकराल लागति है औ सीताको वियोग लोक हरकाल संहार काल
सम लागत है ॥ ४० ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ यहिभाँतिविलोकेसकलठौर । गये
शबरीपैदोउदेवमौर ॥ लियोपादोदकत्यहिपदपखारि । पुनि
अर्ध्यादिकदीन्हेंसुधारि ॥ ४१ ॥ हरदेतमंत्रजिनकोविशाल
शुभकाशीमेंपुनिमरणकाल॥ तेआयेमेरेधामआज । सबसफ-
लकरनजपतपसमाज ॥४२॥ फलभोजनकोतेहिधरेआनि ।
भयेयज्ञपुरुषअतिप्रीतिमानि ॥ तिनरामचन्द्रलक्ष्मणस्वरूप ।
तबधरेचित्तजगजोतिरूप॥४३॥ दोहा ॥ शबरीपावकपंथतब,
हरखिगईहरिलोक ॥ बननबिलोकितहरिगये, पंपातीरसशोक
॥ ४४ ॥ तोटकछंद ॥ अतिसुन्दरशीतलसोभवसै । जहँरू-
पअनेकनिलोभलसै ॥ बहुपंकजपक्षिविराजतहैं । रघुनाथवि-
लोकतलाजतहैं ॥ ४५ ॥ सिगरीऋतुशोभितसुभ्रजही । लहै
ग्रीषमपैनप्रवेशसही ॥ नवनीरनीरताँहँसरसैं । सियकेशुभ
लोचनसेदरसैं ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४१ ॥ मंत्र राम तारक तप औ जप समाज के सफल करन कहे
सफल कर्त्ता अर्थ जो कोऊ जप तप करत है ताको फल रामचंद्र ही देत हैं ॥
॥ ४२ ॥ ४३ ॥ जीवतही अग्निमां जरिकै ॥ ४४ ॥ कैसो है पंपासर अति
सुंदर है औ अति शीतल है जहां शोभा जो है सदा आय वास करति है औ
जहां कहे स्थान में जातही प्राणिन के अनेक रूप सो लोभ बसतहै अर्थ जहां
जातही प्राणिन के रहिबेको लोभबाढत हैं औ बहुत पंकज कमल औ हंसादि
पक्षी विराजतहैं ते रामचन्द्रको देखिकै लज्जित होत हैं जा अंगको जो उपमान
है ता अंगको निरखि अपना सों अधिक जानि लजात हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
मू०-विजयछंद ॥ सुन्दरसेतसरोरुहमें करहाटकहाटककी
द्युतिकोहै । तापरभौरभलेमनरोचनलोकविलोचनकीरुचिरो-
है। देखिदईउप
कह्यो सों संग मित्र जो चंदहै ताको विलोकि इनको चित्त जरत है सोऊ न्यायही
है काहेते निशाचरन की पद्धति परिपाटीको लिये है निशाचर राक्षसहू हैं चंदहू
है सो निशाचरन की राक्षसन की परिपाटीको लिये है राक्षसनहूंको देखतही
चित्तजरतहै औ मृग मित्रकहिया जनायो कि पशुनको मित्र है प्रतिकूला दुःखद
जो शुकादिक होतहैं सोऊ न्यायही है काहेते वे पक्षी पशुहैं इनकी गतिको नहीं
जानत कि ये ईश्वरहैं कमलाकरपद श्लेष है कमलनके आकर समूहसों युक्त औ
कमला लक्ष्मीके उत्पन्नकर्ता युक्ति यह कि ये तुम्हारे जामोतु हैं इनको दुःख
देना तुम्हें न चाहिये ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ ऋष्यमूकपर्वतगये, केशवश्रीरघुनाथ ॥ देखे
वानरपंचविभु, मानोदक्षिणहाथ ॥४९॥ कुसुमविचित्राछंद ॥
तबकपिराज रघुपतिदेखे । मननरनारायणसमलेखे॥ द्विजव-
पुधरि तहँहनुमत आये । बहुविधिआशिषदैमनभाये ॥ ५० ॥
हनुमान ॥ सबविधिरूरेबनमहँकोहौ । तनमनसूरेमनमथमों-
हौ ॥ शिरसिजटावकलाबपुधारी । हरिहरमानहुँविपिनबिहारी
॥ ५१ ॥ परमबियोगीसमरसभीने । तनमनएकैयुगतनकी-
ने ॥ तुमकोहौकालगिबन आये । क्यहिकुलहौकौनैपुनिजाये
॥ ५२ ॥ राम-चंचरीछंद ॥ पुत्रश्रीदशरथकेबनराजशासन
आइयो । सीयसुन्दरिसंगहीबिछुरीसोसोधनपाइयो ॥ राम
लक्ष्मणनामसंयुक्तशूरवंशबखानिये । रावरेबनकौनहौक्यहि
काजक्यौंपहिंचानिये ॥ ५३ ॥
टी०-सुग्रीव हनूमान नल नील सुषेण य पांच जे वानरहैं बिभु कहे प्रतापी
तिन सहित ऋष्यमूक को देख्यो मानों सो पृथिवीको दक्षिण हाथहै पृथिवी इति
शेषः अथवा मानों अपनो दक्षिण हाथही देख्यो है मित्रको औ भ्राता को दक्षिण
बाहुसम कहिबेकी रीतिहै ॥ ४९ ॥ नरनारायणके द्वैरूप हैं ॥ ५० ॥ रूरे सुन्दर
१ दामाद ।
द्वादशप्रकाशः १२. ( १२१ )
॥ ५१ ॥ परम वियोगी हौ अर्थ तुम्हारी चेष्टाते जानि परत है कि काहू बडे
हितको बियोग भयो है औ जटा वल्कलादि सों शान्तरसमें भीनेजानि परतहौ ॥
॥ ५२ ॥ शासनआज्ञा ॥ ५३ ॥
मू०-हनुमान-दोहा ॥ यागिरिपरसुग्रीवनृप, तासँगमंत्री
चारि ॥ वानरलईछँड़ाइतिय, दीन्होवालिनिकारि ॥ ५४ ॥
दोधकछंद ॥ वाकहँजोअपनोकरिजानो । मारहुवालिविनैयह
मानो ॥ राजदेहुजोवाकीतियाको । तोहमदेंहिंबतायसिया-
को ॥ ५५ ॥ लक्ष्मण ॥ आरतकेप्रभुआरतटारौ । दीनअना-
थनकोप्रतिपारौ ॥ स्थावरजंगमजीवजोकोऊ । सन्मुखहोतकृ-
तारथसोऊ ॥ ५६ ॥ वानरहैहनुमानसिधारेउ । सूरजकोसु-
तपायँनिपारेउ ॥ रामकह्योउठिवानरराई । राजसिरीसखिस्यो
तियपाई ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ उठेराजसुग्रीवतब, तनमनअतिसु-
खपाइ ॥ सीताजूकेपटसहित, नूपुरदीन्हेआइ ॥५८॥ तारक
छंद ॥ रघुनाथजबैपटनूपुरदेखे । कहिकेशवमानसमानाहँले-
खे ॥ अवलोकतलक्ष्मणकेकरदीन्हे । उनआदरसोंशिरमानि-
कैलीन्हे ॥ ५९ ॥ राम-दंडक ॥ पंजरकीखंजरीटनैननको-
किधौंमीनमानसको केशोदासजलुहैकिजालुहै । अंगकोकि
अंगरागगेडुआकीगलसुईकिधौंकटिजेबहीकोउरकोकिहारुहै॥
बंधनहमारोकामकेलिकोकिताडिबेकोताजनोंविचारकोकीच-
मरबिचारुहै । मानकीजमनिकाकी कंजमुखमूंदिबेकोसीता-
जूकोउत्तरीयसबसुखसारुहै ॥ ६० ॥
टी०-वानर वालिको विशेषण है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ कृतार्थ कहे कृतहै अर्थ
प्रयोजन जाको ॥ ५६ ॥ अर्थ वालिको मारि कै राज्य श्रीसहित तुम्हारी स्त्री
हम तुमको दैंहैं ऐसा निश्चय वचन रामचंद्र सुग्रीवको दियो ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
( १२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शिर मानिकै कहे शिरपर राखि कै ॥ ५९ ॥ रामचन्द्रकहत हैं कि हमारे खंजे-
रीट कहे खंजरिचस्पीनयनहैं तिनको पंजर पिंजराहै जामें परिनयन कै कढन
नहीं पावत औ कि मीनरूपी जो मानस मन है ताको जल है कि जालु है जैसे
मीन जलसों नहीं कढति तैसे मन यासों नहीं कढत औ जालको औ पंजरको
हेतु एकही है अंगन को कि अंगराग कहे चंदनादि को लेपैहै कि गेरुआ तकिया
है कि गलसुई छोटी तकिया है अर्थ स्पर्शते अंगनको अंगरागादि सम सुखदैहै
औ कि कटिजेव कहे क्षुद्रघंटिका है औ किही को जेव कहे धुकधुकी है जेवपदको
संबंध याहूमैं है औ कि उरको हार है औ कि कामकेलि समयको हमारो बंधन
फांस है औ कि कामकेलि समयको हमारे ताडिबेको ताज नोकसा है कोडाइति
अर्थ कामकेलिमें अति चंचल कर्ता है औ कि कामकेलिका जो विचार कहे
विगत चार चलन है रतांत इतिताको रत भ्रमहर चमरकहे बाल व्यजन है यहां
चमर पदते व्यजन जानौं अथवा हमारे विचारको चमर है अर्थ विचारको शोभा-
कर्त्ता है अर्थ प्रकाश कर्ता है ऐसो हमारो विचार अनुमान है औ कि सीताजूके
मानकी जमनीका कनात है अर्थ याही की आडमें सीताजूको मान रहत रह्यो
औ कि सीताजूको कंजमुख मूँदिबेको सब सुखसार उत्तरीय है याही विधि उत्त-
रीयको वर्णन हनुमन्नाटकमें है । “द्यूतेपणःप्रणयकेलिषुकंठपाशः क्रीडापरिश्रम
हरंव्यजनं रता॑ते । शय्यानिशीथसमयेजनकात्मजायाप्राप्तं मयाविधिवशादिहचो-
त्तरीयम्” ॥ ६० ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ वानरेन्द्रतबयोंहँसिबोल्यो । भीतभेद
जियकोसबखोल्यो ॥ आगिबारिपरतक्षकरीजू । रामचन्द्रहँ-
सिबाँहँधरीजू ॥ ६१ ॥
टी०-जब निश्चय मित्र जान्यो तब आपनो भीतभेदकहे बालि कृत भयके
सब भेद खोल्यो कहे कह्यो मित्र सों अंतःकरण को सब भेद कह्यो चाहिये॥६१॥
मू०-सूरपुत्रतबजीवनजान्यो । वालिजोरबहुभाँतिबखा-
न्यो॥ नारिछीनिजेहिभाँतिलईजू। सोअशेषबिनतीविनईजू।
॥ ६२॥ एकबारशरएकहनोंजो ॥ साततालबलवंतगनोतो ।
रामचन्द्रहँसिबाणचलायो॥तालबेधिफिरिकैकरआयो ॥६३॥
१ खञ्जन या खडरीच ।
द्वादशप्रकाशः १२. ( १२३ )
सुग्रीव-तारकछंद ॥ यह अद्भुतकर्मऔरपै होई । सुरसिद्धप्रसि-
द्धनमेंतुमकोई ॥ निकरीमनतेसिगरीडुचितई । तुमसोंप्रभु-
पाय सदासुखदाई ॥ ६४ ॥ विजयछंद-बावनकोपदलोकन-
मापिज्योंबावनकेवपुमाँहसिधायो । केशवसूरसुताजलसिंधु-
हिपूरिकैसूरहिको पदपायो ॥ रामकेबाणत्वचामबबेधिकैका-
म्पैआवतज्यों जगगायो ॥ रामकोशायकसातहुतालनि बेधि-
कैरामहिंकेकरआयो ॥ ६५ ॥ सोरठा ॥ जिनकेनामविलास,
अखिललोकबेधतपतित ॥ तिनको केशवदास, साततालबे-
धतकहा ॥ ६६ ॥ रामतारकछंद-अतिसंगतिबानरकीलघु-
ताई । अपराधबिनावधकौनिबडाई ॥ हतिवालिहिदेउतुम्हैं-
नृपशिक्षा । अबहैकछुमोमनऐसियइच्छा ॥ ६७ ॥
टी०-॥ ६२ ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वालिके शीघ्र वधमें आपने
अंतर निश्चयको प्रकट करत मित्रताधिक्य को दिखावत रामचन्द्र परिहासपूर्वक
सुग्रीव सों कहते हैं कि हे सुग्रीव ! वानरकी संगति अति लघुता है काहेते
अपराध विना वधमें कछू बडाई नहीं है लघुताई ही है परंतु हमारे मनमें अब
यहै इच्छा है कि वालिको मारि तुमको नृपशिक्षा दीजै अर्थात् राजा कीजिये
यह केवल वानर संगतिको प्रभाव है बिनकाज अकाज करिवो सब बानरनको
स्वभाव होतहै तिनकी संगतिते तैसो स्वभाव भयोचहै ॥ ६७ ॥
मू०-इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रच-
न्द्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायां सीताहरणरामसुग्रीव
मैत्रीवर्णनंनामद्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥
टी०-इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायां द्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥
( १२४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-॥ यातेरेहेप्रकाशमें, बालिवध्योकपिराज ॥ वर्णनवर्षा
शरदको, उदधिउलंघनसाज ॥ १ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ रविपु-
त्रबालिसों होतयुद्ध । रघुनाथभयेमनमाहँक्रुद्ध ॥ शरएकहन्यो-
उरमित्रकाम ॥ तबभूमिगिरयोकहिरामराम ॥ २ ॥ कछुचेत-
भयेतेहिबलनिधान ॥ रघुनाथविलोकेहाथबान ॥ शुभचीरज-
टाशिरश्यामगात । वनमालहियेउरविप्रलात ॥ ३ ॥ वालि ॥
तुम आदिमध्यअवशानएक । जगमोहतहौवपुधरिअनेक ॥
तुमसदाशुद्धसबकोसमान। केहिहेतुहत्योकरुणानिधान ॥४॥
राम ॥ सुनिवासवसुतबृधिबलविधान । मैंशरणागतहितहते-
प्रान ॥ यहसांटोलैकृष्णावतार । तबह्वैहौतुम संसारपार ॥ ५॥
टी०-॥ १॥ मित्र जे सुग्रीवह्रैं तिनके काम कहे अर्थ बालिके वधमें केवल सुग्रीवही
को हित है रामचंद्रको कछु हित नहीं है॥२॥३॥जगको आदि कहे उत्पत्ति मध्य
कहे प्रतिपाल अवसान कहे संसार कर्त्ता एक तुमही हौ अर्थ ब्रह्मारूप है तुम्हीं सृष्टि
करते हो विष्णु रूप है प्रतिपाल करत हौ रुद्र रूप है संहार करतहौ सो अनेक
वपुशरीर धरिकै जगको मोहत हौ अर्थ दशरथके पुत्र रामचन्द्र हैं इत्यादि मोह
बढावत हौ ॥ ४ ॥ सांटो कहे बदलो ॥ ५ ॥
मू०-रघुवीररंकतेराजकीन । युवराजबिरदअंगदहिदीन ॥
तबकिष्किंधातारासमेत ॥ सुग्रीवगयेअपनेनिकेत ॥ ६ ॥
दोहा ॥ कियोनृपतिसुग्रीवहति, बालिबलीरणधीर । गयेप्रव-
र्षण अद्रिको, लक्ष्मणश्रीरघुवीर ॥ ७ ॥ त्रिभंगीछंद ॥ देख्यो-
शुभ गिरिवरसकलसोभधरफूलबरनबहुफलनिफरे । संगसर-
भऋक्षजन केशरिकेगणमनहुधरणिसुग्रीवधरे॥सँग शिवाविरा-
जैगजमुख गाजैपरवभूतेलैचित्तहरे। शिरशुभचन्द्रकधरपरम-
दिगंबरमानो हरअहिराजधरे ॥ ८ ॥
टी०-रामचंद्र सुग्रीवको रंक कहे दरिद्री ते राजा कीन्हो सुग्रीव पदको
संबंध रंक राज पदहूंमेंहै विरद पदवी ॥ ६ ॥ प्रवर्षण नामा जो अद्रि
पर्वत है तामें जाइ वास करचो ॥ ७ ॥ रामचंद्र कैसो पर्वत देखंत भये कि
फूल हैं वरन बहु कहे अनेक रंगके औ बहुत फलन सों फरे बहुपदको संबंध
फलन हूं में हैं आगे श्लेषोत्प्रेक्षाकरि वर्णत हैं शरभवानर नाम विशेष हैं औ पशु-
जाति विशेष ॥ "शरभस्तु पशौ भिंदिकरमेवानरेभिदि इति मेदिनी" । ऋक्ष
पर्वतहूमें है सुग्रीवहूके संग जाम्बवंतादि हैं केशरी कहे सिंह ताके गण समूह औ
केशरी नामा वानर हनूमान के पिता तिनके गण सैन्य समूह शिवा पार्वती औ
शृगाली गजमुख गणेश औ हस्ती आदि और वनजीव आदि पदते गैंडा आदि
जानौं पर कहे बडे जे भृतसेवक हैं नंदिकेश्वरादि औ कोकेलचंद्रक चंद्रमा औ
कपूर अर्थ कदली वृक्षनमें कपूर होतहै ते कदली जामें बहुत हैं अथवा जल अनेक
वाप्यादिकनमें भरचो है अथ चंद्रक धर मोर ॥ "चंद्रः कर्पूरको कांपिल्य
सुवर्णवारिषु इति मेदिनी" । दिगंबरनग्नदुवौपच्छमेंएकैहै अहिराज वासुकी औ
बडे सर्प ॥ ८ ॥
मू०-तोमरछंद ॥ शिशुसोलसैसंगधाइ । बनमालज्योंसुर
राइ ॥ अहिराजसोयहिकाल । बहुशीशशोभनिमाल ॥ ९ ॥
स्वागताछंद ॥ चंद्रमंदद्युतिवासरदेखौ । भूमिहीनभुवपालवि-
शेषौ ॥ मित्रदेखियहशोभतहैनौं । राजसाजबिनुसीतहिहौं
ज्यौं ॥ १० ॥ दोहा ॥ पतिनीपतिबिनुदीनअति, पतिपति
नीबिनुमंद ॥ चंद्रबिनाज्योंयामिनी, ज्योंबिनयामिनिचंद ॥
॥ ११ ॥ स्वागताछंद ॥ देखिरामबरषाऋतुआई । रोमरो-
मबहुधादुखदाई ॥ आसपास तमकीछबिछाई रातिदिवसकछु-
जानिनजाई ॥ १२ ॥ मंदमंद धुनिसोंघनगाजैं । तुरतार-
जनुआवझबाजैं ॥ ठौरठौरचपलाचमकैक्यों । इंद्रलोकतियना-
चतिहैंज्यौं ॥ १३ ॥ मोटनकछंद ॥ सौहैंघनश्यामलघोर
घनैं । मोहैंतिनमैं बकपांतिमनैं ॥ शंखावलि पी बहुधाजल-
सों । मानीतिनकोउगिलैबलसों ॥ १४ ॥ शोभा अतिशक्र-
( १२६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शरासनमें । नानाद्युतिदीसतिहैघनमें । रत्नावलिसी दिवि-
द्वारभनो । वर्षागमबांधियदेवमनो ॥ १५ ॥
टी०-शिशु बालक धाइ जो माताते अन्य आपनो स्तन दूध पिआवति है औ
वृक्षविशेष सुरराइ कहे विष्णु ते वनमाल पहिरेहैं पर्वतमें वनकी माला पंगति-
समूहैति है अथ बडोवनहै बहुशीश सहस्र शिर औ बहुतशीशसो सो हैं वृक्ष
॥ ९ ॥ दिनमें द्युतिहीन चंद्रमाको देखि रामचंद्र लक्ष्मण सों कहतहैं मित्र ।
सूर्य अथवा मित्र लक्ष्मण को संबोधन है ॥ १० ॥ ११ ॥ एकादश छंदन् मों
जैसो वर्णन करयो है ऐसी बर्षाऋतु आई देखिकै रामचंद्र कलहंस कलानिधि
खंजन कंज याते इसयें छंद में जे वचन हैं ते कहत भये इति शेषः ॥ १२ ॥
तूर नगारे तार उच्चस्वर ॥ १३ ॥ १४ ॥ दिवि द्वार कहे आकाशके द्वारमें रत्ना-
वलि पढ़ते रतननके वन्दनवार जानौ बडे की अवाईमें बंदनवार बांधिबेकी रीति
प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥
मू०-तारकछंद ॥ घनघोरघनेदशहूं दिशिछाये । मघवाज-
नुसूरजैपैचढिआये ॥ अपराधबिनाक्षितिकेतनताये । तिनपी-
डनपीडितहैउठिधाये ॥ १६ ॥
टी०-तीनि छंद को अन्वय एक है ग्रीष्म ऋतुमें अति तेजसों सूर्य क्षिति
पृथ्वीके तनताये तप्त करचो है जो कोऊ काहूको बिन दोष दुःख देई ताको दंड
करिबो राजन को उचित है इंद्रदेवन के राजा हैं तासों सूर्यको उचित दीर्घ
दंड कियो जासों ऐसो अबना करै उत्प्रेक्षा करि यह राजनीति प्रगट देखायो
अथवा पृथ्वीको अशरण जानिकै अशरणको सहाय करिबो बड़ेनको उचित है
तासों अथवा पृथ्वीको स्त्री जानिकै स्त्री की रक्षा करिबो बडेन को उचित है तासों
दुंदुभि कहे जे गजादि वाहन पर चमूके आगे नगारे बाजत हैं निर्घात कहे
जाको वज्र शब्द सब कहत हैं सो नहीं है सबै कहे जे ते निर्घात होत हैं तेते
पवि कहे वज्र के पात गिरिवो बखानो कहे कहत हैं अर्थ जै बार निर्घात होत
है सो निर्घात नहीं है बार बार इंद्र सूर्यको वज्र चलावत हैं ताहीको शब्द
होत है सम कहे बराबरी अर्थ जैसे अत्रिकी स्त्रीके उरमें देख्यो
तैसे याके उरमें देख्यो है गोर मदाइनी कहे इंद्र धनुष नहीं है प्रत्यक्ष धनुष है
गोर मदाइनि हेंद्र धनुष को नाम पश्चिममों प्रसिद्ध है औ बर्षना तुसारहूसों
प्रगट होत है कहूँगोर सदायिन नाहीं पाठ है तौ गो जे किरणें हैं ते रसद् कहे
An exact, line-by-line transcription of the Hindi/Braj text from the image into Devanagari:
मेघनके अयन कहे घरमें मध्यममें इति नहीं है प्रत्यक्ष धनुष है सूर्य की किरणें
मेघनमें परि इंद्र धनुष होत है यह प्रसिद्ध है खड्ग कहे तरवारि द्युतिवंत चन्द्र-
शुक्रादि तौ एकही चूकसों जातिमात्रको दंड बडे कांपको जनावत है चन्द्रवन्धू
वीरबहोटी रसराज में कह्योहै नवलवधू उरलाजे इन्द्र वधूसीहोई ॥ १६ ॥
मू०-अतिगाजतबाजतदुंदुभिमानो ॥ निरघातसबैपविपा-
तबखानो ॥ धनुहैयहगोरमदाइनिनाहीं । शरजालबहैजल-
धार वृथाहीं ॥ १७ भटचातकदादुरमोरनबोलै । चपलाचम-
कैनफिरैखरगखोलै ॥ द्युतिवंतनकोबिपदाबहुकीन्हीं । धरनीक-
हँ चंद्रवधूधरिदीन्हीं ॥ १८ ॥ तरुनीयहअत्रिऋषीश्वरकीसी ।
उरमें हमचन्द्रकलासमदीसी ॥ वरषानसुनैकिलकैकिलका-
कहे चन्द्रमाकी अर्थ चन्द्रप्रकाश नहीं होन पावत औ नै जे नदी हैं ते न कहे
नहीं हैं अमल निर्मल अर्थ नदीनको जल म्लान है जात है औ कमलनको दल
समूह दलित होत है औ निकाई कहे काई सों रहित है अथवा कमलदलकी
दलित है निकाई जामें केशवदास कहत हैं कि रेणुका जो धूरिरहै ताको गमनहर
प्रबल है क कहे जल जामें अर्थ ऐसो जल चारों ओर भयो है जासों धूलि नहीं
उडति औ मुकुत कहे त्यक्त है हंसक जे हंस हैं तिनको सुखदाई शब्द जामें
वर्षामें हंस उडजातहैं यह प्रसिद्ध है औ अम्बर जो प्रकाश है तामें वलित
कहे युक्त नीलकण्ठ जे मोर हैं तिनकी मतिको मोहै कहे प्रसन्न करति हैं कालि-
का कैसी है कि भौंहैं हैं सुरचाप इन्द्रधनुषहू ते चारु जाकी औ प्रमुदित कहे
उन्नत हैं पयोधर स्तन जाके भूषणनमें जराइ कहे जराऊ जो ज्योति है तामें
तडित जो बिजुली है ताकी तरलाई चंचलता है अथवा भूषणमें जडाऊकी जो
ज्योति है सो जटिल समरलाई कहे योजित है अर्थ भूषणनमें रतननकी ज्योति
बिजुली सम दमकति है रत्नजटित भूषण जडाऊ कहावत हैं औ दूरि कीनी है
सुख मुख कहे सहज मुखही सो शशि जो चन्द्र है ताकी सुखमा शोभा अर्थ
सहजमुख ऐसो छविवान् है जामें चन्द्र द्युति मंद होति है औ अमल कहे स्वच्छ
जे नयन हैं तिन करिकै कमलदलकी निकाई दलित है अर्थ जिनके नयननके
आगे कमलनकी छवि दलि जाति है औ केशवदास कहत हैं कि प्रबल कहे
नीको जो करेनुका हस्तिनी को गमन है ताकी हरणहारी है औ मुकुत कहे
छूटचो अर्थ उच्चरित जो हंसक कहे बिछुवान को शब्द है सोहै सुखदायी जाको
अर्थ जाके चलतमें सुखदायक अनेक रंगको बिछुवानको शब्द होतहै औ अम्बर
जो वस्त्रहैं तामें वलित युक्त नीलकण्ठ जे महादेव हैं तिनकी मति को मोहन है
यहाँ काली पदते पार्वती जानो ॥ २० ॥
मू०-तारककन्द ॥ अभिसारिनिसीसमुझैंपरनारी । सत-
मारगमेटनकोअधिकारी ॥ मतिलोभमहामदमोहछयीहै ।
द्विजराजसुमित्रप्रदोषमयीहै ॥ २१ ॥ दोहा ॥ वर्णतकेशव
सकलकवि, विषमगाढ़तमसृष्टि ॥ कुपुरुषसेवाज्योंभई,
संततमिथ्यादृष्टि ॥ ॥ २२ ॥ चंद्रकलाछंद ॥ कलहंसकला
निधिखंजनकंजकछूटिदिन केशवदेखिजिये । गतिआननलो-
चनपायनकेअनुरूपकसेमनमानिलिये ॥ यहिकालकरालते-
शोधिसबैहठिकैबरषामिसदूरिकिये । अबधौं बिनप्राणप्रियार-
हिहैंकहिकौनहितूअवलम्बिहिये ॥ २३ ॥
टी०-सत कहे उत्तम मार्ग यथोचित कुलांगनन की रीति औ राजमार्गादि
ग्रामते ग्रामांतर की राह इति कि लोभ औ महामद औ मोह सों छई मति बुद्धि है
वर्षा द्विजराज चन्द्रमा औ सुमित्र सूर्य तिनके दोषमयी है अर्थ चंद्र सूर्यको उदय
नहीं होन पावत औ मति द्विजराज ब्राह्मण औ सुष्ठुमित्र इनके दोषमयी है
यासों या जानौं लोभ मद मोह युक्त प्राणी मित्र दोष द्विजदोष करत नहीं
डरत ॥ २१ ॥ विषम कहे भयानक जो गाढ तम अन्धकार है ताकी सृष्टि
कहे वृद्धि में मिथ्या दृष्टि भई जैसे कुपुरुषकी सेवामें होति है तैसी सकल कवि
वर्णत हैं अर्थ जब कुपुरुष सेवा कोऊ करत है तब वाहि यह देखि परतहै कि
कछू पायहैं जब कछू ना पायो तब पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतभई तैसे जा दृष्टि सों
सब विषय पदार्थ देखि परत हैं ताही दृष्टिसों वर्षांधकारमें निकटगत बस्तु
नहीं देखियत पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतिहै ॥ २२ ॥ अनुरूपक कहे प्रतिम जा
वस्तुके वियोगसों विकलता होति है ताकी प्रतिमा देखि कछू बोध होतहै यह
जो हमारो कराल कहे भयानक काल कहे समयहै जामें सीयावियोगादि दुःख
भये ताही काल वर्षाको व्याज करि हमको दुःख देवेको तिनहुन कलहंसादिक-
नको दूरि कीन्हों ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ बीतेबर्षोकालयों, आईशरदसुजाति ॥ गये
अँध्यारीहोतिज्यों, चारुचांदनीराति ॥ २४ ॥ मोटनकछंद ॥
दंतावलिकुन्दसमानगनो । चंद्राननकुन्तलचौरघनो ॥ भौंहैं
धनुखंजननैनमनो । राजीवनिज्यों पदपानिभनो ॥ २५ ॥
हारावलिनीरजहीपरमैं । हैंलीनपयोधरअम्बरमैं ॥ पाटीरजो-
न्हाइहिअंगधरे । इसीगतिकेशवचित्तहरे ॥ २६ ॥ श्रीनार-
१ सुंदर. २ सदृश.
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