रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशप्रकाशः १२. (११३)
धिकै ॥ ११ ॥ दोहा ॥ रघुनायकजबहींहन्यो, सायकशठ
मारीच ॥ हालक्ष्मणयहकहिगिरेउ, श्रीपतिकेस्वरनीच ॥
॥ १२ ॥ निशिपालिकाछंद ॥ राजतनयातबहिंबोलसुनियों
कहेउ। जाहुचलिदेवरनजातहमपैरहेउ । हेममृगहोहिंनहींरै-
निचरजानिये । दीनस्वररामकेहिभाँजिमुखआनिये ॥ १३ ॥
टी०-एक हर महादेवको छोडिकै और सब देवता मेरेजन कहे सेवक हैं ॥
॥ ८ ॥ आशु कहे जल्दी ॥ ९ ॥ छाया शरीरसों मृगै कहे चलिबेको अभि-
लाष करौ अर्थ छाया शरीर आलंब्य रहौ अथवा छाया शरीरसों या सुवर्णमृगको
अभिलाषी ॥ १० ॥ हेम सुवर्ण औ हीरनको कुरंग हरिण बनि मारीच आयो
॥ ११ ॥ जैसो रामचन्द्रको स्वरकहे शब्द है ताही स्वरसों हा लक्ष्मण यह
कहिकै गिरचौ नीच मारीचको विशेषण है ॥ १२ ॥ यह कोऊ राक्षस है हरिण-
को रूप धरिकै आयो है ताने रामचन्द्रको मारचो तासों हा लक्ष्मण ऐसो दीन-
स्वर रामचन्द्र कह्यो इति भावार्थः ॥ १३ ॥
मू०-लक्ष्मण ॥ सोचअतिपोचउरमोचुदुखदानिये । मातु
यहबातअवदातमममानिये ॥ रैनिचरछद्मबहुभाँतिअभिलाष-
हीं । दीनस्वररामकबहूंदनमुखभाषहीं ॥ १४ ॥ चंचलाछंद ॥
पक्षिराजयक्षराजप्रेतराजयातुधान । देवताअदेवतानृदेवताजि-
तेजहान ॥ पर्वतारिअर्बखर्बसर्बसर्बथाबखानि । कोटिकोटिसूर
चन्द्ररामचन्द्रदासमानि ॥ १५ ॥ चामरछन्द ॥ राजपुत्रि-
काकह्योसोऔरकोकहैसुनै । कानमूंदिबारबारशीशबीसधा-
धुनै ॥ चापकीयरेखखाँचिदेवसाखिदैचले । नांघिहैंतेभस्म
होहिंजीवजेबुरेभले ॥ १६ ॥
टी०-अति पोच कहे निषिद्ध जो दुःखदानि सोच है ताको उरसों मोचु कहे
त्याग करौ छद्म कपट ॥ १४ ॥ पक्षिराज गरुड यक्षराज कुबेर प्रेतराज यम-
राज यातुधान राक्षस देवता औ अदेवता दैत्य नृदेवता राजा औ पर्वतारि इंद्रेते
ये सब अर्ब खर्ब संख्या परिमित औ अर्बखर्ब सर्वकहे महादेव अर्बखर्बको संबंध