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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

द्वादशप्रकाशः १२. (११५)
कामिनी रतिको छडाइ लीन्ही है कि पाखंडके वशमों श्रद्धापरी है यह कथा
विज्ञानगीतामें प्रसिद्ध है कि मठपतिके वश एकादशी परी कि श्वपचराजु चांडा-
लन को राजा शुद्धसामवेद की शाखा लीन्होंहै अष्ट कर्मके साथ में जैसी जीवं
ज्योति परी है तैसी छाया कृत जो राम की जाया सीता है सो लंकनाथ के
हाथ में परी ॥ १८ ॥
मू०-सीताजू-हरिलीलाछंद॥हारामहारमनहाररघुनाथधीर।
लंकाधिनाथवशजानहूँमोहिंवीर ॥ हापुत्रलक्ष्मणछोडावहुबे-
गिमोहिं। मार्त्तंडवंशयशकीसबलाजतोहिं ॥१९॥ पक्षीजटायु
यहबातसुनंतधाइ। रोक्योतुरंतबलरावणदुष्टजाइ॥कीन्हों प्रचंड
रथछत्रध्वजाबिहीन। छोड्योविपक्षतबभोजबपक्षहीन ॥२०॥
संयुताछंद॥ दशकंठसीतहिलेचल्यो।अतिवृद्धगीधहियोदल्यो॥
चितजानकीअधंकौकिये। हरितीनिद्वैअवलोकिये ॥ २१ ॥
पदपद्मकीशुभघूंघरी। मणनीलहाटकसेंजरी ॥ जनुउत्तरीय
विचारिकै । शुभडारिदीयगठारिकै ॥२२॥ दोहा ॥ सीताके
पदपद्मको, नूपुरपटजनिजानु। मनहुँकरयोसुग्रीवचर, राजश्री
प्रस्थानु॥२३॥यद्यपिश्रीरघुनाथजू, समसर्वगसर्वज्ञ।नरकैसी
लीला करत, जेहिमोहतसबअज्ञ ॥२४॥ राम-सवैया॥ निज
देखोंनहीँशुभगीतहिसीतहिकारणकौनकहै।अबहीँ।अतिमोहि-
तकैबनमांझगई सुरमारगमैमृगमारच्योजहीं ॥ कटुबातकहूतुम
सोंकहिआईकिधौँतेहित्रासडेराइरहीँ। अबहैयाहपर्णकुटीकिधौँ
और किधौंवहलक्ष्मणहोइनहीँ ॥ २५ ॥
टी०- ॥ १९ ॥ प्रचंडपदजटायुरावणरथतीन्योकोविशेषण ह्वै सकते है विपक्ष
शत्रु रावण ॥२०॥ तीनि औ द्वै कहे पांच अथवा द्वै तीनि कहिबेकी रीति शुभा-
वोक्ति है हरि वानर ॥२१॥ उत्तरीय ओढिबेको वस्त्र ॥२२॥ जब प्रस्थान भयो तब
आप आयोई चाहै ॥ २३ ॥ सम कहे सदा एक रस रहत हैं और सर्वग कहे सर्वत्र
व्याप्त हैं और सर्वज्ञ कहे सबजानत हैं ॥ २४ ॥ जो हमारे स्वरसों हा लक्ष्मण यह