रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकह्यो सों संग मित्र जो चंदहै ताको विलोकि इनको चित्त जरत है सोऊ न्यायही
है काहेते निशाचरन की पद्धति परिपाटीको लिये है निशाचर राक्षसहू हैं चंदहू
है सो निशाचरन की राक्षसन की परिपाटीको लिये है राक्षसनहूंको देखतही
चित्तजरतहै औ मृग मित्रकहिया जनायो कि पशुनको मित्र है प्रतिकूला दुःखद
जो शुकादिक होतहैं सोऊ न्यायही है काहेते वे पक्षी पशुहैं इनकी गतिको नहीं
जानत कि ये ईश्वरहैं कमलाकरपद श्लेष है कमलनके आकर समूहसों युक्त औ
कमला लक्ष्मीके उत्पन्नकर्ता युक्ति यह कि ये तुम्हारे जामोतु हैं इनको दुःख
देना तुम्हें न चाहिये ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ ऋष्यमूकपर्वतगये, केशवश्रीरघुनाथ ॥ देखे
वानरपंचविभु, मानोदक्षिणहाथ ॥४९॥ कुसुमविचित्राछंद ॥
तबकपिराज रघुपतिदेखे । मननरनारायणसमलेखे॥ द्विजव-
पुधरि तहँहनुमत आये । बहुविधिआशिषदैमनभाये ॥ ५० ॥
हनुमान ॥ सबविधिरूरेबनमहँकोहौ । तनमनसूरेमनमथमों-
हौ ॥ शिरसिजटावकलाबपुधारी । हरिहरमानहुँविपिनबिहारी
॥ ५१ ॥ परमबियोगीसमरसभीने । तनमनएकैयुगतनकी-
ने ॥ तुमकोहौकालगिबन आये । क्यहिकुलहौकौनैपुनिजाये
॥ ५२ ॥ राम-चंचरीछंद ॥ पुत्रश्रीदशरथकेबनराजशासन
आइयो । सीयसुन्दरिसंगहीबिछुरीसोसोधनपाइयो ॥ राम
लक्ष्मणनामसंयुक्तशूरवंशबखानिये । रावरेबनकौनहौक्यहि
काजक्यौंपहिंचानिये ॥ ५३ ॥
टी०-सुग्रीव हनूमान नल नील सुषेण य पांच जे वानरहैं बिभु कहे प्रतापी
तिन सहित ऋष्यमूक को देख्यो मानों सो पृथिवीको दक्षिण हाथहै पृथिवी इति
शेषः अथवा मानों अपनो दक्षिण हाथही देख्यो है मित्रको औ भ्राता को दक्षिण
बाहुसम कहिबेकी रीतिहै ॥ ४९ ॥ नरनारायणके द्वैरूप हैं ॥ ५० ॥ रूरे सुन्दर
१ दामाद ।