रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशप्रकाशः १२. ( १२३ )
सुग्रीव-तारकछंद ॥ यह अद्भुतकर्मऔरपै होई । सुरसिद्धप्रसि-
द्धनमेंतुमकोई ॥ निकरीमनतेसिगरीडुचितई । तुमसोंप्रभु-
पाय सदासुखदाई ॥ ६४ ॥ विजयछंद-बावनकोपदलोकन-
मापिज्योंबावनकेवपुमाँहसिधायो । केशवसूरसुताजलसिंधु-
हिपूरिकैसूरहिको पदपायो ॥ रामकेबाणत्वचामबबेधिकैका-
म्पैआवतज्यों जगगायो ॥ रामकोशायकसातहुतालनि बेधि-
कैरामहिंकेकरआयो ॥ ६५ ॥ सोरठा ॥ जिनकेनामविलास,
अखिललोकबेधतपतित ॥ तिनको केशवदास, साततालबे-
धतकहा ॥ ६६ ॥ रामतारकछंद-अतिसंगतिबानरकीलघु-
ताई । अपराधबिनावधकौनिबडाई ॥ हतिवालिहिदेउतुम्हैं-
नृपशिक्षा । अबहैकछुमोमनऐसियइच्छा ॥ ६७ ॥
टी०-॥ ६२ ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ वालिके शीघ्र वधमें आपने
अंतर निश्चयको प्रकट करत मित्रताधिक्य को दिखावत रामचन्द्र परिहासपूर्वक
सुग्रीव सों कहते हैं कि हे सुग्रीव ! वानरकी संगति अति लघुता है काहेते
अपराध विना वधमें कछू बडाई नहीं है लघुताई ही है परंतु हमारे मनमें अब
यहै इच्छा है कि वालिको मारि तुमको नृपशिक्षा दीजै अर्थात् राजा कीजिये
यह केवल वानर संगतिको प्रभाव है बिनकाज अकाज करिवो सब बानरनको
स्वभाव होतहै तिनकी संगतिते तैसो स्वभाव भयोचहै ॥ ६७ ॥
मू०-इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रच-
न्द्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायां सीताहरणरामसुग्रीव
मैत्रीवर्णनंनामद्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥
टी०-इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायां द्वादशः प्रकाशः ॥ १२ ॥