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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 269 में से

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पृष्ठ 120

( ११४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
सर्वपदहूमें है तिन्हें सर्वथा कहे सब प्रकार बखानि कहे कहौं औ कोटि सूर्य औ
चन्द्रमा हैं तिन सबको रामचन्द्रके दास कहे सेवक मानौ रामचन्द्रके मारिवे
लायक ये कोऊ नहीं हैं इति भावार्थः ॥ १५ ॥ लक्ष्मणको राजपुत्रिकाने जे
कटुवचन कहे तिन्हें और कौन कहै औ कौन सुनै अर्थ अतिकटुवचन कहे जे
काहूके कहिवे सुनिबे लायक नहीं हैं औ जो थोरो सुनिबोहू करै तौ जामें आगे
और ना सुनिपरै तालिये कान मूंदिकै बिनसुने वचननके शोकसों बीसधा अर्थ
अनेक प्रकारसों शीश धुनै अथवा सीताही कान मूँदिके शीश धुनत भई कान
मूंदिवेको हेतु यह जामें लक्ष्मणके ये बोध वचन न सुनिपरै तौ लक्ष्मण वातै ना कहैं
रामचन्द्रके पास जाइ अथवा जामें कटुवचन ना सुनिपरै तालिये लक्ष्मणहीं कान-
को मूंदिकै वारवार शीशधुनतभये ॥ १६ ॥
मू०-छिद्रताकिछुद्रराजलंकनाथआइयो । भिक्षुजानिजान-
कीसोभीषकोबोलाइयो ॥ शोचपोचमोचिकैसकोचभीमवेष-
को । अंतरिक्षहींकरीज्यौंराहुचंद्ररेखको ॥ १७ ॥ दण्डक ॥ धू-
मपुरकेनिकेतमानोंधूमकेतुकी शिखाकीधूमयोनिमध्यरेखसु-
धाधामकी । चित्रकीसीपुत्रिकाकीरूरैबयरूरैमां हशम्बरछोडा-
इलईकामिनिकीकामकी ॥ पाखंडकीश्रद्धाकीमठे शबशएकाद-
शीलीन्हीकैश्वपचराजशाखाशुद्धसामकी । केशवअदृष्टसाथ
जीवजीतिजैसीतैसीलंकनाथहाथपरीछायाजायारामकी ॥१८॥
टी०-क्षुद्रनको राज जो लंकनाथ है सो छिद्र कहे अवसर ताकि भिक्षुककहे
दंडीरूप धरिकै सीतापै आयो शूर्पणखाकी नासिका काटेको जो पोच कहे बुरो
शोच है सीता हरण निश्चय करि ताको मोचिकै छोडिकै अथवा पोच रावणको
विशेषण है औ भीमवेषको जो संकोच सिकोरनो रह्यो ताको मोचिकै अर्थ जो
लघुशरीर करचोरहै ताको बडाइक अंतरिक्ष आकाश ॥ १७ ॥ धूमपुर के निकेत
कहे घरमें अर्थ धूम समूह में धूमकेतु जो अग्नि है ताकी शिखाज्योति है कि
धूमयोनि जे मेघहैं तिनके मध्यमें सुधाधाम जो चन्द्रमा है ताकी रेखा कहे
कलाहै कि रूरेकहे बडे बघरूरै कहे बौंडर वायु ग्रंथि करिकै प्रसिद्ध है तामें
चित्रपुत्रिका है किं शंबरनामा जो दैत्य है सो कामको शत्रुहै तेहि काम की