रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशक्ती, आवैतेहिगहिखाउँ ॥ रामरूपसीताहरण,उधरहुगहनउ
पाउ॥३४॥सुरसरितेआगेचले,मिलिहैंकपिसुग्रीव।दैहैंसीताकी
खवरि, बाढैसुखअतिजीव ॥३५॥ तोटकछंद ॥ सरिताएकके-
शवसोभरई । अवलोकितहांचकवाचकई ॥ उरमेंसियप्रीतिस-
माइरही । तिनसोंरघुनायकबातकही ॥ ३६ ॥ अवलोकतहौं
जबहींजबहीं। दुखहोततुम्हैंतबहींतबहीं॥ वहबैरनचित्तकछूध-
रिये । सियदेहुबताइ कृपाकरिये ॥ ३७॥ शशिकेअवलोकन
दूरिकिये । जिनकेमुखकीछविदेखिजिये। कृतचित्तचकोरकछू-
कधरौ । सियदेहुबताय सहायकरौ ॥ ३८ ॥
टी०-॥३४॥करुणा करिकै द्वै कोश कि वाहु दई औ यह वर दियो कि जो इन
बाहुनके मध्यमें आवै ताको खाहु जब सीताहरण हैहै तब रामचन्द्र या मग अइहैं
तिनके गहन उपाय सों उद्धरहु कहै तुम्हारो उद्धार होई अर्थ जब रामचन्द्रको इन
बाहुनसों गहिहै तब तेरो उद्धार हैहै ॥ ३४ ॥ सुरसरि गोदावरी ॥ ३५ ॥३६ ॥
जब सीताको तुम अवलोकत रहे कहै देखत रहौ तब अपनासों अधिक सुन्दर
सीताके कुच देखि तुम्हारे दुख होत रहै अथवा हमको संयोगी देखत तासों
तुम्हारे दुःख होत रह्यो ॥ ३७ ॥ शशि जो अति सुन्दर जिनके मुखको देखि
शशिकी ओर विलोकिबो छोड़ि केवल जिनके मुखकी छविको देखिकै जियत
रहेहौ अथवा शशिके अवलोकन दर्शन दूरिकिये पर अर्थ जब कृष्णपक्षमें चन्द्रमा
आपनो दर्शनदृष्टि सों दूरि कियो न देखि परयो तब चन्द्रसम केवल जिनके
मुखकी छविको देखि जियत रहे हौ वह कृत कहै उपकार कछु चित्तमें धरिकै
सीताको बताइ देउ ॥ ३८ ॥
मू०-सवैया ॥ कहिकेशवयाचककेअरिचंपकशोकअशोक
लियेहरिकै । लखिकेतककेतकिजातिगुलाबतेतीक्षणजानितजे
डरिकै ॥ सुनिसाधुतुम्हैं हमबूझनआयेरहेमनमौनकहाधरिकै ।
सियकोकछुसोधुकहौकरुणामयसोकरुणाकरुणाकरिकै॥३९॥
नाराजछंद॥ हिमांशुमूरसोलगैसोबातबज्रसोबहै। दिशालगैंकु-