रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
शिर मानिकै कहे शिरपर राखि कै ॥ ५९ ॥ रामचन्द्रकहत हैं कि हमारे खंजे-
रीट कहे खंजरिचस्पीनयनहैं तिनको पंजर पिंजराहै जामें परिनयन कै कढन
नहीं पावत औ कि मीनरूपी जो मानस मन है ताको जल है कि जालु है जैसे
मीन जलसों नहीं कढति तैसे मन यासों नहीं कढत औ जालको औ पंजरको
हेतु एकही है अंगन को कि अंगराग कहे चंदनादि को लेपैहै कि गेरुआ तकिया
है कि गलसुई छोटी तकिया है अर्थ स्पर्शते अंगनको अंगरागादि सम सुखदैहै
औ कि कटिजेव कहे क्षुद्रघंटिका है औ किही को जेव कहे धुकधुकी है जेवपदको
संबंध याहूमैं है औ कि उरको हार है औ कि कामकेलि समयको हमारो बंधन
फांस है औ कि कामकेलि समयको हमारे ताडिबेको ताज नोकसा है कोडाइति
अर्थ कामकेलिमें अति चंचल कर्ता है औ कि कामकेलिका जो विचार कहे
विगत चार चलन है रतांत इतिताको रत भ्रमहर चमरकहे बाल व्यजन है यहां
चमर पदते व्यजन जानौं अथवा हमारे विचारको चमर है अर्थ विचारको शोभा-
कर्त्ता है अर्थ प्रकाश कर्ता है ऐसो हमारो विचार अनुमान है औ कि सीताजूके
मानकी जमनीका कनात है अर्थ याही की आडमें सीताजूको मान रहत रह्यो
औ कि सीताजूको कंजमुख मूँदिबेको सब सुखसार उत्तरीय है याही विधि उत्त-
रीयको वर्णन हनुमन्नाटकमें है । “द्यूतेपणःप्रणयकेलिषुकंठपाशः क्रीडापरिश्रम
हरंव्यजनं रता॑ते । शय्यानिशीथसमयेजनकात्मजायाप्राप्तं मयाविधिवशादिहचो-
त्तरीयम्” ॥ ६० ॥
मू०-स्वागताछंद ॥ वानरेन्द्रतबयोंहँसिबोल्यो । भीतभेद
जियकोसबखोल्यो ॥ आगिबारिपरतक्षकरीजू । रामचन्द्रहँ-
सिबाँहँधरीजू ॥ ६१ ॥
टी०-जब निश्चय मित्र जान्यो तब आपनो भीतभेदकहे बालि कृत भयके
सब भेद खोल्यो कहे कह्यो मित्र सों अंतःकरण को सब भेद कह्यो चाहिये॥६१॥
मू०-सूरपुत्रतबजीवनजान्यो । वालिजोरबहुभाँतिबखा-
न्यो॥ नारिछीनिजेहिभाँतिलईजू। सोअशेषबिनतीविनईजू।
॥ ६२॥ एकबारशरएकहनोंजो ॥ साततालबलवंतगनोतो ।
रामचन्द्रहँसिबाणचलायो॥तालबेधिफिरिकैकरआयो ॥६३॥
१ खञ्जन या खडरीच ।