रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंचनपायनकेअनुरूपकसेमनमानिलिये ॥ यहिकालकरालते-
शोधिसबैहठिकैबरषामिसदूरिकिये । अबधौं बिनप्राणप्रियार-
हिहैंकहिकौनहितूअवलम्बिहिये ॥ २३ ॥
टी०-सत कहे उत्तम मार्ग यथोचित कुलांगनन की रीति औ राजमार्गादि
ग्रामते ग्रामांतर की राह इति कि लोभ औ महामद औ मोह सों छई मति बुद्धि है
वर्षा द्विजराज चन्द्रमा औ सुमित्र सूर्य तिनके दोषमयी है अर्थ चंद्र सूर्यको उदय
नहीं होन पावत औ मति द्विजराज ब्राह्मण औ सुष्ठुमित्र इनके दोषमयी है
यासों या जानौं लोभ मद मोह युक्त प्राणी मित्र दोष द्विजदोष करत नहीं
डरत ॥ २१ ॥ विषम कहे भयानक जो गाढ तम अन्धकार है ताकी सृष्टि
कहे वृद्धि में मिथ्या दृष्टि भई जैसे कुपुरुषकी सेवामें होति है तैसी सकल कवि
वर्णत हैं अर्थ जब कुपुरुष सेवा कोऊ करत है तब वाहि यह देखि परतहै कि
कछू पायहैं जब कछू ना पायो तब पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतभई तैसे जा दृष्टि सों
सब विषय पदार्थ देखि परत हैं ताही दृष्टिसों वर्षांधकारमें निकटगत बस्तु
नहीं देखियत पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतिहै ॥ २२ ॥ अनुरूपक कहे प्रतिम जा
वस्तुके वियोगसों विकलता होति है ताकी प्रतिमा देखि कछू बोध होतहै यह
जो हमारो कराल कहे भयानक काल कहे समयहै जामें सीयावियोगादि दुःख
भये ताही काल वर्षाको व्याज करि हमको दुःख देवेको तिनहुन कलहंसादिक-
नको दूरि कीन्हों ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ बीतेबर्षोकालयों, आईशरदसुजाति ॥ गये
अँध्यारीहोतिज्यों, चारुचांदनीराति ॥ २४ ॥ मोटनकछंद ॥
दंतावलिकुन्दसमानगनो । चंद्राननकुन्तलचौरघनो ॥ भौंहैं
धनुखंजननैनमनो । राजीवनिज्यों पदपानिभनो ॥ २५ ॥
हारावलिनीरजहीपरमैं । हैंलीनपयोधरअम्बरमैं ॥ पाटीरजो-
न्हाइहिअंगधरे । इसीगतिकेशवचित्तहरे ॥ २६ ॥ श्रीनार-
१ सुंदर. २ सदृश.
९