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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 269 में से

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पृष्ठ 124

( ११८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

शानुज्यौविलेपअंगकोदहै ॥ विशेषिकालरातिलोकरालराति
मानिये । वियोगसीयकोनकाललोकहारजानिये ॥ ४० ॥
टी०-रामचन्द्र करुण वृक्षसों कहत हैं कि चम्पक जेहैं ते याचकर्क अरि शत्रुहैं
पुष्पनको याचक जो भ्रमर है ताकों निकट नहीं आवनदेत चंपकमें भ्रमर नहीं
बैठत यह प्रसिद्ध है ता भयसों चंपक सो सीताको सोधु नहीं जांचे अशोक जे
वृक्ष हैं तिनकं शोककों हरिकै छोडिकै अशोक यह जो नाम है ताको लीन्हों
है तासों जिनहूको तज्यौहै कि जिनके शोक हैही नहीं ते हमारो दुःख देखि
दुःखी है कृपा करि सीताको सोधु काहेको बताई है केतक केवरा औ केतकी
औ गुलाब इनकी जाति जे और कंटक वृक्ष हैं कमलादि तिन्हें तीक्ष्ण कहे कंट-
कित जानिकै डरिकै तज्यौ है सो हे करुणा कहे करुण वृक्ष ! करुणा कहे
दीनतामय जे हमहैं तिनसों सीताको कछू सोधु कहौ ॥३९॥ रामचन्द्र लक्ष्मणसों
कहत हैं कि हिमांशु जो चन्द्रमा है सो हमको सूर्य सम तप्त लागत है औ वायु
वज्रसम बहात है औ दशों दिशा अग्निके समान तप्तलागतिहैं औ तुम जो
शीतलताके अर्थ हमारे अंगनमें विलेप करतहौ सो अंगनकोजारतहै औ राति
काल राति समकराल लागति है औ सीताको वियोग लोक हरकाल संहार काल
सम लागत है ॥ ४० ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ यहिभाँतिविलोकेसकलठौर । गये
शबरीपैदोउदेवमौर ॥ लियोपादोदकत्यहिपदपखारि । पुनि
अर्ध्यादिकदीन्हेंसुधारि ॥ ४१ ॥ हरदेतमंत्रजिनकोविशाल
शुभकाशीमेंपुनिमरणकाल॥ तेआयेमेरेधामआज । सबसफ-
लकरनजपतपसमाज ॥४२॥ फलभोजनकोतेहिधरेआनि ।
भयेयज्ञपुरुषअतिप्रीतिमानि ॥ तिनरामचन्द्रलक्ष्मणस्वरूप ।
तबधरेचित्तजगजोतिरूप॥४३॥ दोहा ॥ शबरीपावकपंथतब,
हरखिगईहरिलोक ॥ बननबिलोकितहरिगये, पंपातीरसशोक
॥ ४४ ॥ तोटकछंद ॥ अतिसुन्दरशीतलसोभवसै । जहँरू-
पअनेकनिलोभलसै ॥ बहुपंकजपक्षिविराजतहैं । रघुनाथवि-
लोकतलाजतहैं ॥ ४५ ॥ सिगरीऋतुशोभितसुभ्रजही । लहै