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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 269 में से

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पृष्ठ 116

( ११० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

जो वनमें वायु योगसों फैलि रह्यो है ताको आघ्रानकै ताके अनुसार शूर्पणखा
रामचंद्रके पास आई इति भावार्थः ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
मू०-शूर्पणखा-सवैया ॥ किन्नरहो नररूपबिचक्षणयच्छकी
स्वच्छशरीरनिसोहौ । चित्तचकोरकेचंदकिधौंमृगलोचनचा-
रुबिमाननिरोहौ । अंगधरेकि अनंगहौ केशव अंगी अनेकनके-
मनमोहौ । बीरजटानिधरेधनुबाणलियेबनिताबनमेंतुमकोहौ
॥ ३४ ॥ राम-मनोरमाछंद ॥ हमहैं दशरथमहीपतिकेसुत ।
शुभरामसुलक्ष्मण नामनसंयुत ॥ यहशासनदैपठयेनृपकानन।
मुनिपालहुमारहुराक्षसकेगन ॥३५॥ शूर्पणखा॥नृपरावणकी-
भगिनीगनि मोकहँ। जिनकीठकुराइतितीनहुलोकहँ॥ सुनिजैदु
खमोचनपंकजलोचन। अबमोहिंकरोपतिनीमनरोचन ॥३६॥
तोमर छंद ॥ तबयोंकह्योहँसिराम । अबमोहिंजनिसवाम ॥
तियजायलक्ष्मणदेखि समरूपयौवनलेखि ॥३७॥ शूर्पणखा-
दोधकछंद ॥ रामसहोदरमोतनदेखो । रावणकीभगिनीजिय-
लेखो ॥ राजकुमाररमोसँगमेरे । होहिंसबैसुखसंपतितैरे
॥ ३८ ॥ लक्ष्मण ॥ वैप्रभुहोंजनजानिसदाई । दासिभये-
महँकौनिबड़ाई ॥ जौभजियेप्रभुतौप्रभुताई ॥ दासिभये
उपहास सदाई ॥ ३९ ॥
टी०-विचक्षणप्रवीण चित्तरूपी जो चकोर हैं ताके चंद्रमाही जैसे चन्द्रमा
चकोरको सुख देत है तैसे तुम चित्तको सुख देत हौ चंद्रमा मृगनके विमान
रथको रोहत है अर्थ चढत है तुम मृगरूपी जे लोचन हैं तिनहीके विमानको
रोहतहौ अर्थ जो तुमको कोऊ देखत है ताके नयननमें ऐसे बसि जात हौ कि
उतरत नहीं ॥ ३४ ॥ शासन आज्ञा ॥ ३५ ॥ हे मन ! रोचन अर्थ मेरे मनको
तुम अति रुचत हौ ॥ ३६ ॥ आपने रूप औ यौवन संग इन्हें लेखि कहे जानु
अर्थ जैसो रूप यौवन तेरो है तैसो इनहूंको है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मदाई जन हौं
कहि या जनायों कि कबहूं प्रभुता हैबेकी आशा नहीं है ॥ ३९ ॥