रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशप्रकाशः १२. ( १२१ )
॥ ५१ ॥ परम वियोगी हौ अर्थ तुम्हारी चेष्टाते जानि परत है कि काहू बडे
हितको बियोग भयो है औ जटा वल्कलादि सों शान्तरसमें भीनेजानि परतहौ ॥
॥ ५२ ॥ शासनआज्ञा ॥ ५३ ॥
मू०-हनुमान-दोहा ॥ यागिरिपरसुग्रीवनृप, तासँगमंत्री
चारि ॥ वानरलईछँड़ाइतिय, दीन्होवालिनिकारि ॥ ५४ ॥
दोधकछंद ॥ वाकहँजोअपनोकरिजानो । मारहुवालिविनैयह
मानो ॥ राजदेहुजोवाकीतियाको । तोहमदेंहिंबतायसिया-
को ॥ ५५ ॥ लक्ष्मण ॥ आरतकेप्रभुआरतटारौ । दीनअना-
थनकोप्रतिपारौ ॥ स्थावरजंगमजीवजोकोऊ । सन्मुखहोतकृ-
तारथसोऊ ॥ ५६ ॥ वानरहैहनुमानसिधारेउ । सूरजकोसु-
तपायँनिपारेउ ॥ रामकह्योउठिवानरराई । राजसिरीसखिस्यो
तियपाई ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ उठेराजसुग्रीवतब, तनमनअतिसु-
खपाइ ॥ सीताजूकेपटसहित, नूपुरदीन्हेआइ ॥५८॥ तारक
छंद ॥ रघुनाथजबैपटनूपुरदेखे । कहिकेशवमानसमानाहँले-
खे ॥ अवलोकतलक्ष्मणकेकरदीन्हे । उनआदरसोंशिरमानि-
कैलीन्हे ॥ ५९ ॥ राम-दंडक ॥ पंजरकीखंजरीटनैननको-
किधौंमीनमानसको केशोदासजलुहैकिजालुहै । अंगकोकि
अंगरागगेडुआकीगलसुईकिधौंकटिजेबहीकोउरकोकिहारुहै॥
बंधनहमारोकामकेलिकोकिताडिबेकोताजनोंविचारकोकीच-
मरबिचारुहै । मानकीजमनिकाकी कंजमुखमूंदिबेकोसीता-
जूकोउत्तरीयसबसुखसारुहै ॥ ६० ॥
टी०-वानर वालिको विशेषण है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ कृतार्थ कहे कृतहै अर्थ
प्रयोजन जाको ॥ ५६ ॥ अर्थ वालिको मारि कै राज्य श्रीसहित तुम्हारी स्त्री
हम तुमको दैंहैं ऐसा निश्चय वचन रामचंद्र सुग्रीवको दियो ॥ ५७ ॥ ५८ ॥