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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 269 में से

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पृष्ठ 125

ग्रीषमपैनप्रवेशसही ॥ नवनीरनीरताँहँसरसैं । सियकेशुभ
लोचनसेदरसैं ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४१ ॥ मंत्र राम तारक तप औ जप समाज के सफल करन कहे
सफल कर्त्ता अर्थ जो कोऊ जप तप करत है ताको फल रामचंद्र ही देत हैं ॥
॥ ४२ ॥ ४३ ॥ जीवतही अग्निमां जरिकै ॥ ४४ ॥ कैसो है पंपासर अति
सुंदर है औ अति शीतल है जहां शोभा जो है सदा आय वास करति है औ
जहां कहे स्थान में जातही प्राणिन के अनेक रूप सो लोभ बसतहै अर्थ जहां
जातही प्राणिन के रहिबेको लोभबाढत हैं औ बहुत पंकज कमल औ हंसादि
पक्षी विराजतहैं ते रामचन्द्रको देखिकै लज्जित होत हैं जा अंगको जो उपमान
है ता अंगको निरखि अपना सों अधिक जानि लजात हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
मू०-विजयछंद ॥ सुन्दरसेतसरोरुहमें करहाटकहाटककी
द्युतिकोहै । तापरभौरभलेमनरोचनलोकविलोचनकीरुचिरो-
है। देखिदईउप