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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

बलीपावनपादुकालै। प्रदक्षिणारामसियाहुकोदै॥ गयेतेनंदी
पुरबासकीनौं। सबंधुश्रीरामहिचित्तदीनों ॥ ४५ ॥ दोहा ॥
केशवभरतहिआदिदै, सकलनगरकेलोग ॥ बनसमानघरघर
बसे सकलविगतसंभोग ॥ ४६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिद्रजिद्विरचितायांभरतस्यचित्रकूटागमनं
नामदशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
टीका-पादुकारूपी इष्ट कहे स्वामी देहु आशय यह कि राज्य पर स्वामी
चाहिये ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजाकीजानकीजानिप्रसादायजनजान-
कीप्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायादशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
मू०-दोहा ॥ एकादशैप्रकाशमें, पंचवटीकोवास॥शूर्पणखा-
केरूपको, रघुपतिकरिहैंनाश ॥ १॥ भरतोद्धता

एकादशप्रकाशः ११. (१०३)
राजै जनुकेशवतपबलकी। तनुवलितपलितजनुसकलवासना
निकरिगईथलथलकी॥ कांपतिशुभग्रीवासबअँगसींवादेखत
चित्तभुलाहीं। जनुअपनेमनप्रतियहउपदेशतियाजगमेंकछु
नाहीं॥६॥प्रमिताक्षराछंद॥ हरवाइजाइ सियपाँइँपरी।
ऋषिनारिसूंघिशिरगोदधरी॥ बहुअंगरागअँगअंगरये। बहु
भाँतिताहिउपदेशदये॥ ७॥ स्रग्विणीछंद॥ रामआगेचले
मध्यसीताचली। बंधुपाछेभयेसामसोमैभली॥ देखिदेहीसबै
कोटिधाकेभनो। जीवजीवैशकेबीचमायामनो॥ ८॥
टी०-मनको शोधिसांधि शुद्ध करि करि गुनकी जो उर विशेष धरयो है
अर्थ तुम्हारो ध्यान करयो है अथवा मनहींको शुद्ध करिकै जो उरमें धारण करयो
अर्थ मनकी जो चंचलता है ताहि छोड़ाइ अपनेवश्य करचो है सो हे रामचन्द्र !
ताको सब को फल जो तुम्हारे दर्शन हैं ताको पायो॥ ३॥ ४॥ जरा कहे
बुढाईरूपी जो सखी है ताके साथ देख्यो॥ ५॥ तन वलितकहे युक्त है पलितकहे
ढिलाइसों अर्थ वृद्धता सों त्वचामें सिकुरा परिगये हैं सो मानों थलथल की
अंगअंगकी वासना विषय वासना निकरिगई है ताहीते अंग अंग सिकुरि
गयेहैं सींवा मर्यादा॥ ६ ॥ हरवाइकहं हरवराइकै॥ ७॥ बनोकहे कह्यो
जीवैश ईश्वर॥ ८॥
मू०-मालतीछंद॥ विपिनविराधबलिष्ठदेखियो। नृपतन-
याभयभीतलेखियो॥ तबरघुनाथबाणकैकहयो। निजनिर्णवा
पंथकोठयो॥ ९॥ दोहा॥ रघुनायकसायकधरे, सकललोक
शिरमौर॥ गयेकृपाकरिभक्तिवश,ऋषिअगस्त्यकेठौर॥१०॥
वसंततिलकाछंद॥ श्रीरामलक्ष्मणअगस्त्यसनारिदेख्यो।
स्वाहासमेतशुभपावकरूपलेख्यो॥ साष्टांगक्षिप्रअभिवंदन
जाइ कीन्हों॥ सानंदआशिषअशेषऋषीशदीन्हों॥ ११॥
बैठारि आसनसबैअभिलाषपूजे। सीतासमेतरघुनाथसबन्धु-

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

( १०४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
पूजे ॥ जाके निमित्तहमयज्ञयज्योसोपायो । ब्रह्मांडमंडनस्व-
रूपजोवेदगायो ॥ १२ ॥
टी०-निर्वाण जो मोक्ष है ताके पंथ कहे राह में ठयो कहे युक्त करचो
अर्थ मुक्ति दियो ॥ ९ ॥ सकल लोक शिरमौर जे रघुनाथ हैं ते सायक जे
बाण हैं तिनको धरे अगस्त्यके ठौरमें गये अथवा रघुनायक भक्तिके वश कृपा-
कारिकै अगस्त्यके ठौर गये तहां सकललोक शिरमौर जे अपने सायक हैं तिन्हें
धरे धारण करचो विष्णु के धनुर्वाण अगस्त्य के यहां धरे रहे हैं ते रामचंद्र को
अगस्त्य दियो हे यह कथा वाल्मीकीय रामायणमें है अथवा सकललोक शिर-
मौर जो विष्णु हैं तिनके सायकधरेधारणकरचो अथवा रघुनायकके सकल लोक
शिरमौर सायक अगस्त्यके ठौर धरे हैं तालिये औ भक्ति वश कृपाकारि अग-
स्त्यके ठौर गये ॥ १० ॥ स्वाहा अग्नि की स्त्री ॥ ११ ॥ सबै आपने अभि-
लाष पूजे पूर्ण करे ब्रह्माण्ड को मंडन भूषण जो यह रावरो स्वरूप है ताहीके
मिलिबे के लिये हम यज्ञ यज्यो होम्योकरचो इति सो यह स्वरूप पायो ॥ १२ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ ब्रह्मादिदेवजबबिनयकीन । तटक्षीर
सिन्धुकेपरमदीन ॥ तुमकह्योदेवअवतरहूजाइ। सुतहोंदशरथ-
कोहोतुआइ ॥ १३॥ हमतबतेमनआनन्दमानि । मनचितवत
तवआगमनजानि। ह्वाँरहिजैकारिजैदेवकाजु । ममफूलिफल्यो
तपवृक्षआजु ॥ १४ ॥ श्रीराम-पृथ्वीछंद ॥ अगस्त्यऋषिरा-
जजुबचनएकमेरोसुनौ।प्रशस्तसबभाँतिभूतलसुदेशजीमेंगुनौ॥
सनीरतरुखंडमंडितसमृद्धशोभाधरैं। तहांहमनिवासकीबिमल
पर्णशालाकरैं ॥ १५ ॥ अगस्त्य-पद्मावतीछंद ॥ यद्यपिजग
कर्त्तापालकहर्त्तापरिपूरणवेदनगाये । अतितदपिकृपाकरिमा-
नुषवपुधारिथलपूछनहमसोंआये ॥ सुनिसुरवरनायकराक्षस-
घायकरक्षहुमुनिजनयशलीजै । शुभगोदावरितटविशदपंचव-
टपर्णकुटीतहँप्रभुकीजै ॥ १६ ॥ दोहा ॥ केशवकहेअगस्त्यके-
पंचवटीकेतीर ॥ पर्णकुटीपावनकरी, रामचन्द्ररणधीर॥ १७॥

नवम से द्वादश प्रकाश: वनगमन, पञ्चवटी वास एवं सीता-हरण प्रसंग

एकादशप्रकाशः ११. (१०५)
॥ त्रिभंगीछंद ॥ फलफूलनपूरेतरुवररूरैकोकिलकुलकल रव-
बोलैं । अतिमत्तमयूरीपियरसपूरीवनबनप्रतिनाचतिडोलैं ॥
साराशुकपंडितगुणगणमण्डितभावनिमैंअरथबखानैं ॥ देखहु
रघुनायकसीयसहायकमदनरतिमधुजानै ॥ १८ ॥
टी०-॥ १३ ॥ तब कहे तुम्हारो ॥ १४ ॥ प्रशस्तनीको सुदेश समउच्च
नीच रहितेति सनीरु सजल औ नरु जे वृक्ष हैं तिनको जो खण्ड समूह है तासों
मण्डित युक्त औ समृद्ध कहे बर्द्धमान अधिक इति शोभाको धरै धारण करे
होई निवासको कहे बसिवे की ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ रामचन्द्रके आगमन-
सों दंडकारण्यमें रूरै कहे सुन्दर जे तरुवृक्ष हैं ते फल, औ फूलनसों पूरे युक्त
भये अथवा रूरैजे फल औ फूल हैं तिनसों तरुवर पूरे औ कोकिल के जे कुल-
जाति समूह हैं ते कल कहे अव्यक्त मधुररव शब्दको बोलतहैं ॥"काकलीतुकले-
सूक्ष्मध्वनौतुमधुरास्फुटे ॥ कलो मंद्रस्तुगंभीरेतारोत्युच्चैस्त्रयस्त्रिषु ” इत्यमरः ॥
औ अतिमत्त जे मयूरीहैं ते पिय जे मयूर हैं तिनके रसमैं प्रेममें पूरी वनवन प्रति
नाचत डोलती हैं अर्थ जहाँ जहाँ मोर नाचत हैं तहाँ तहाँ संग मयूरी डोलती
हैं औ सारो सारिका औ शुक जे गुणगणसों मंडित पंडित प्रवीणहैं अर्थ अनेक
गुणनमें पंडित हैं ते भावनियम कहे अनेक भाव अभिप्राय युक्त गानके अर्थ को
बखानत हैं अथवा नृत्यके जे अनेक भाव चेष्टा हैं तिनमें अर्थ को बखानत हैं
जब जैसी चेष्टा देखत हैं तब तैसे अर्थ के प्रयोजनको बखान करत हैं तामैं
तर्क करतहैं कि रघुनायक रामचन्द्र औ सीता औ सहायक जे लक्ष्मण हैं तिनको
इन वृक्षादिकन देख्यो है सो मानो मदन काम औ रतिसहित मधुवसन्त जानत
हैं तौ वसंतहूकै आगमनमें ये कौतुक होत हैं तासों उत्प्रेक्षा करयो औ युक्ति
यह कि वसंत वनको प्रभुहैं मो प्रभुकी अवाईमें अनेक वितान बिछावन नृत्यादि
रचना सब करत हैं सो रतिसहित मदन जो मित्र है तासों युक्त वसंतको आवत
देखि वन करचो प्रफुल्लित जे अनेक कुंज हैं तेई वस्त्र भवन औ वितान हैं औ
गिरे जे पुष्पहैं तेई पुष्प बिछावने हैं कोकिल गावत हैं मोर नाचन हैं सारो
शुक बखान करत हैं वेश्यादि नृत्य कारिनहूमें बखान कर्त्ता एकरहत है ॥ १८ ॥
मू०-लक्ष्मण-सवैया ॥ सबजातिफटीदुखकीदुपटीकपटी
नरहैजहँएकघटी । निघटीरुचिमीचघटीहूँघटीजगजीवयतीन-

( १०६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
कीछूटतीतटी । अघओघकीबेरीकटीबिकटीनिकटीप्रकटीगुरु-
ज्ञानगटी । चहुँओरननाचतिमुक्तिनटीगुणधूरजटीवनपञ्च-
वटी ॥ १९ ॥
टी०-दुपटी द्वैपाटको ओढिबे को वस्त्र सो जहाँ जा पंचवटीकं निकट सब
फाटि जाति है नेकहू नहीं रहति अर्थ सब दुःख जहां नशि जात हैं औ कपटी
जीव जहां एक घडी नहीं रहत यासों या जनायो कि जहाँ जातही कपटीको
कपट दूरि होतहै औ जाकी शोभा निरखि जगके जे यती तपस्वी जीव हैं तिनकी
तटी कहैं ध्यान स्थिती सो छूटि औ मीचुकी रुचि घटीहू घटी कहैं घरी
घरीमें निघटी घटत भई अर्थ यती जीवनको मरे ते मुक्ति होति है परन्तु जा
स्थानकी शोभा निरखि मुक्तिहू की इच्छा नहीं करत अघ पाप ओघ समूह बेरी
बंधन जंजीरसो ऐसी जो पंचवटीहै सो धूर्जटी जो महादेव हैं तिनके गुणनसों
जटी कहे युक्त है यई दुःख नाशनादि गुण महादेवहू मों हैं अथवा ये जे दुःख
नाशनादि गुणहैं तिनसों औ धूर्जटी जे महादेव हैं तिनसों जटी कहे युक्त हैं
पंचवटी ॥ १९ ॥
मू०-हाकलिकाछन्द ॥ शोभतदण्डककीरुचिबनी । भाँति-
नभातिनसुन्दरघनी ॥ सेवबडेनृपकीजनुलसै ॥ श्रीफलभूरि-
भाव जहँबसै ॥२०॥ बेरभयानकसीअतिलगै । अर्कसमूहज-
हाँजगमगै॥नैननकोबहुरूपनग्रसै। श्रीहरिकीजनुमूरतिलसै २१
टी०-दण्डकनाम राजा रहे हैं तिनको राज्य शुकके शाप सों वन ह्वै गयो
है तासों दंडकारण्य कहावत है रुचि शोभा श्रीफल बेल औ लक्ष्मीको फल
बडे राजाकी सेवामें बहुत द्रव्य पाइयत है ॥२०॥ भयानक बेर प्रलयकाल अर्क
मदार औ सूर्य प्रलय कालहूमो बारहौं आदित्य उगत हैं नैननको अनेक रूपकरि
ग्रसत हैं यासों या जनायो कि क्षणमें अधिक अधिक नवीन शोभा धरत है
ऐसी विष्णुकी मूर्तिहू है तासों समता कर्यो सुंदरताको याही प्रकार वर्णन है
यथामाघकाव्ये ॥ “ दृष्टोपिशैलःसमुहुर्मुरारेरपूर्ववद्विस्मयमाततान ॥ क्षणेक्षणे
यन्नवतामुपैति तदेव रूपंरमणीयतायाः ” ॥ २१ ॥
मू०-राम-दोधकछंद ॥ पांडवकीप्रतिमासमलेखो । अर्जुनं
भीममहामतिदेखो ॥ हैंसुभगासमदीपतिपूरी । सिंदुरकीतिल-

एकादशप्रकाशः ११. ( १०७ )

कावलिरूरी ॥ २२ ॥ राजतिहैयहज्योंकुलकन्या । धाइविरो-
जतिहै सँगधन्या ॥ केलिथलीजनुश्रीगिरिजाकी । शोभधरे-
शितकंठप्रभाकी ॥ २३ ॥ मनहरनछंद ॥ अतिनिकटगोदा-
वरीपापसंहारिणी। चलतरंगतुंगावलीचारुसंचारिणी। अलि-
कमलसौगंधलीलामनोहारिणी । बहुनयनदेवेशशोभामनो-
धारिणी ॥ २४ ॥
टी०-प्रतिमा चित्र अर्जुन ककुभवृक्ष औ पांडुपुत्र ॥ "अर्जुनः ककुभे पार्थे
इति मेदिनी" ॥ औ भीम अम्लवेतस वृक्ष औ भीमसेन ॥ "भीमोवृकोदरघोरे
शंकरप्यम्लवेतसं इत्यभिधानचिंतामणिः" ॥ जो कहौ रामावतार प्रथम भयो है
अर्जुनादि कृष्णावतार समय मो रहे हैं पूर्वापर विरोधहै तौ सब कल्पनमें दशौ
अवतार होतहैं सो अनेक रामावतार कृष्णावतार भये हैं तासों दोष नहीं है
यथा-तुलसीकृत रामायण में कहा है ॥ 'कल्पकल्पप्रति प्रभुअवतारा' । सुभगा
सौभाग्यवती स्त्री अथवा इति ताके सम शोभा पूरीहै दंडककी रुचि सिंदूरक जो
है वृक्ष विशेष औ तिलक वृक्ष करिकै रूरी सुन्दर है ॥ "सिन्दूरस्तरुभेदेस्या-
दितिमेदिनी ॥ तिलकोद्रुमरोगारूभेदेचतिलकालके इतिमेदिनी ॥ औ सुभगा
सिन्दूरक जो सेंदुर है ताके तिलक की अवली करिके रूरी है अथवा
सिन्दुरक कारिकै और और जे सुवर्ण मणि आदि के तिलक हैं तिनकी अवली
करिकै रूरी सुंदर है ॥ २२ ॥ कुलकन्या पद सों बडे की कन्या जानो धाइ
वृक्षविशेष औ उपमातास्तना दूध पिआवति है गिरिजा पार्वती शितकण्ठ
मयूर औ महादेव ॥ २३ ॥ जा पर्णकुटीके अति निकट पापसंहारिणी गोदा-
वरी नाम नदी है फेरि कैसी है गोदावरी चल चंचल जे तरंग हैं तिनके जे
तुंग समूह हैं तिनकी जे अवली पांती हैं तिनकी चारु कहे अच्छी भाँति संचा-
रिणी चलावन हारी है अर्थ अनेक तरंगें उठायो करति है अथवा तरंग तुंगाव-
लिन करिकै चारु संचारिणी चलनहारी है अलि भ्रमर युक्त जे कमल हैं तिनके
सौगंध सुगंध करिकै लीला है मनोहारिणी जाकी औ अलियुक्त कमलन करिकै
बहुनयन जे देवेश इंद्र हैं तिनकी शोभा की मानो धारिणी धारण कर्त्री है इंद्रेके
सहस्त्रनेत्र हैं यहाँ नेत्र सदृश अलियुक्त कमलहैं ॥ २४ ॥
मू०-दोधकछन्द ॥ रीतिमनोअविवेककीथापी ॥ साधुज-
की गति पावत पापी । कंजजकीमतिसीबडभागी । श्रीह-

( १०८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
रिमंदिरसौंअनुरागी ॥ २५ ॥ अमृतगतिछंद ॥ निपटपति-
व्रतधरणी । जगजनकैदुखहरणी ॥ निगमसदागतिसुनिये।
अगतिमहापतिगुनिये ॥ २६ ॥
टी०-कंजजब्रह्मा ब्रह्माकीमतिहूको अनुरागहारी मंदिर बैकुण्ठ में है औ
गोदावरी हू को है काहेते जो कोऊ स्नान करत हैं ताको आपनो जानि बैकुण्ठ
पठावति है ॥ २५ ॥ यामें विरोधाभास है सदा पति जो समुद्र हैं तामें लीन
रहतिहै तोसों निपट पतिब्रत धरणी कह्यो विरोध पक्षमें दुःख काम पीडा
अविरोध में पापजनित दुःख दरिद्रादि निगम जे वेद हैं तिनमें सदा गति कहे
सदा है गति मुक्ति जासों ऐसी सुनियत है अर्थ जो कोऊ स्नान करत हैं
ताकोमुक्तिदेतिहैं औ पति जो समुद्रहै ताही को अगति सुनियत है अर्थ ताको
गति मुक्ति नहीं देति यह विरोधार्थ है अविरोधहू की अगति गमन रहित समुद्रको
जल वहत नहीं ॥ २६ ॥
मू०-दोहा ॥ विषमयहैगोदावरी, अमृतनकोफलदेति ॥
केशवजीवनहारको, दुखअशेषहरिलेति ॥ २७ ॥ त्रिभंगी-
छंद ॥ जबजबधरिबीनाप्रगटप्रबीनाबहुगुणलीनासुखसीता ।
पियजियहिरिझावैदुखनिभजावै विविधबजावैगुणगीता ॥
तजिमतिसंसारीविपिनविहारीदुखसुखकारीघिरिआवै ।
तबतबजगभूषण रिपुकुलदूषणसबकोभूषणपहिरोवै ॥ २८ ॥
तोटकछंद ॥ कबरी कुसुमालिसिखीनदई । गजकुंभनिहार-
निशोभमई ॥ मुकुताशुक सारिकनाकरचे । कटिकेहरिकिं-
किणिशोभसचे ॥ २९ ॥ दुलरी कलकोकिलकंठबनी ॥
मृगखंजनअंजनभाँतिठनी ॥ नृपहंसनि नूपुरशोभभिरी ।
कलहंसनिकंठनिकंठसिरी ॥ ३० ॥
टी०-याहूमें विरोधाभास है विषमयहै जलमय ॥ "विषन्तुगरलेतोये
इति मेदिनी"॥औ जैसे अमृत अमर करत है तैसे याहू मुक्तकै अमर करतिहै विरोध
पक्षमें जीवन जीव अविरोधमें जल दुःख प्यास दुःख अथवा विषयमें कहे टेढ़ीहै

एकादशप्रकाशः ११. ( १०९ )
अमृत जे देवता हैं तिनके फलको देति है अर्थ शुद्धगनिको देति है औ जीवन-
हार जे यमराज हैं तिनको दुःख कहे तिनकृत दुःख यम यातना इति । ताको
अशेष कहे संपूर्ण हरिलेति है ॥ २७ ॥ सुख कहे सुखसों गुण सीतारामचंद्रकी
गुणगीता दुःख कारी व्याघ्रादि सुखकारी कोकिलादि जे विपिनविहारी कहे
वन विहारी हैं ते संसारी मति कहे भेद भय मतिको तजिकै मनुष्यके समीपमें
वन जीवनको आपहीमें आइबो आश्चर्य है सो आवत हैं याही संसारी मतिको
त्याग जानो ॥ २८ ॥ तीनि छंदनमें एक वाक्यता है शिखी मोरकबरी
कहे केशपाश ॥ २९ ॥ नृप हंसराजहंस ॥ ३० ॥
मू०-मुखबासनिवासितकीनतवै । तृणगुल्मलतातरुशैल
सबै ॥ जलहूथलहूयहिरीतिरमैं । बनजीवजहांतहँसंगभ्रमैं ॥
॥ ३१ ॥ दोहा ॥ सहजसुगंधिशरीरकी, दिशिविदिशन-
अवगाहि ॥ दूतीज्योंआई लिये, केशवशूर्पन

( ११० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

जो वनमें वायु योगसों फैलि रह्यो है ताको आघ्रानकै ताके अनुसार शूर्पणखा
रामचंद्रके पास आई इति भावार्थः ॥ ३२ ॥ ३३ ॥
मू०-शूर्पणखा-सवैया ॥ किन्नरहो नररूपबिचक्षणयच्छकी
स्वच्छशरीरनिसोहौ । चित्तचकोरकेचंदकिधौंमृगलोचनचा-
रुबिमाननिरोहौ । अंगधरेकि अनंगहौ केशव अंगी अनेकनके-
मनमोहौ । बीरजटानिधरेधनुबाणलियेबनिताबनमेंतुमकोहौ
॥ ३४ ॥ राम-मनोरमाछंद ॥ हमहैं दशरथमहीपतिकेसुत ।
शुभरामसुलक्ष्मण नामनसंयुत ॥ यहशासनदैपठयेनृपकानन।
मुनिपालहुमारहुराक्षसकेगन ॥३५॥ शूर्पणखा॥नृपरावणकी-
भगिनीगनि मोकहँ। जिनकीठकुराइतितीनहुलोकहँ॥ सुनिजैदु
खमोचनपंकजलोचन। अबमोहिंकरोपतिनीमनरोचन ॥३६॥
तोमर छंद ॥ तबयोंकह्योहँसिराम । अबमोहिंजनिसवाम ॥
तियजायलक्ष्मणदेखि समरूपयौवनलेखि ॥३७॥ शूर्पणखा-
दोधकछंद ॥ रामसहोदरमोतनदेखो । रावणकीभगिनीजिय-
लेखो ॥ राजकुमाररमोसँगमेरे । होहिंसबैसुखसंपतितैरे
॥ ३८ ॥ लक्ष्मण ॥ वैप्रभुहोंजनजानिसदाई । दासिभये-
महँकौनिबड़ाई ॥ जौभजियेप्रभुतौप्रभुताई ॥ दासिभये
उपहास सदाई ॥ ३९ ॥
टी०-विचक्षणप्रवीण चित्तरूपी जो चकोर हैं ताके चंद्रमाही जैसे चन्द्रमा
चकोरको सुख देत है तैसे तुम चित्तको सुख देत हौ चंद्रमा मृगनके विमान
रथको रोहत है अर्थ चढत है तुम मृगरूपी जे लोचन हैं तिनहीके विमानको
रोहतहौ अर्थ जो तुमको कोऊ देखत है ताके नयननमें ऐसे बसि जात हौ कि
उतरत नहीं ॥ ३४ ॥ शासन आज्ञा ॥ ३५ ॥ हे मन ! रोचन अर्थ मेरे मनको
तुम अति रुचत हौ ॥ ३६ ॥ आपने रूप औ यौवन संग इन्हें लेखि कहे जानु
अर्थ जैसो रूप यौवन तेरो है तैसो इनहूंको है ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ मदाई जन हौं
कहि या जनायों कि कबहूं प्रभुता हैबेकी आशा नहीं है ॥ ३९ ॥

मू०-मल्लिकाछंद॥ हासकेबिलासजानि। दीहमानखंडमा-
नि ॥ भक्षिबेकोचित्तचाहि। सामुहेभईसियाहि ॥ ४० ॥ तो
मरछंद ॥ तबरामचन्द्रप्रवीन । हँसिबंधुत्यौंहगदीन ॥ गुनि-
दुष्टता सहलीन । श्रुतिनासिकाबिनुकीन ॥ ४१ ॥ दोहा-
शोन छिंछिछूटतबदन, भीमभईतेहिकाल ॥ मानोकृत्याकुटि-
लयुत, पावकज्वालकराल ॥ ४२ ॥
इति श्रीमत्सकलो कलोचनचकोरचिन्तामणि-श्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजि-
द्विरचितायां शूर्पणखाश्रवणनासिकाछेदनं नामैकादशः प्रकाशः ॥११॥
टी०-जब जान्यौ कि ये मोसों रमिहैं नहीं केवल मोसों हासके बिलास उप-
हास करत हैं तब दीह कहे बडो आपनो मानखंड कहे अपमान मानिकै॥ ४०॥
॥ ४१ ॥ कराल पावक ज्वाल-सों युक्त है वदनजाको ऐसी मानो कृत्यानामा
देवी है ॥ “कृत्याक्रियादेवतयोगितिमेदिनी” ॥ ४२ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायामेकादशः प्रकाशः ॥ ११ ॥
मू०-दोहा ॥ या द्वादशे प्रकाशखर, दूषण त्रिशिरानाश ॥
सीताहरणविलाप सु,-ग्रीवमिलन हरि त्रास ॥ १ ॥
टी०-त्रासजो भय है ताको हरिकै सुग्रीवको मिलन हैं अर्थ बालिको वध
निश्चय करि सुग्रीवको त्रास हरि रामचन्द्रमित्रता करि हैं ॥ १ ॥
मू०-तोटकछंद ॥ गइशूर्पणखाखरदूषणपै । सजिल्याइति-
न्हैंजगभूषणपै ॥ शरएकअनेकतेदूरिकिये । रविकेकरज्यौंत-
मपुंजपिये ॥ २ ॥ मनोरमाछंद ॥ वृषकेश्वरदूषणज्यौंखरदू-
षण । तबदूरिकियेरविकेकुलभूषण ॥ गदशत्रुत्रिदोषज्यौंदूरि
करैवर । त्रिशिराशिरत्यौंरघुनंदनकेशर ॥ ३ ॥ भजिशूर्पण-
खागइरावणपैतब । त्रिशिराखरदूषणनाशकहेसब॥ तबशूर्पण-

( ११२ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
खासुरवातसबैसूनि । उठिरावणगोमारीचजहाँमुनि ॥ ४ ॥
मनोरमाछंद ॥ रावणबात कहीसिगरीत्यों । शूर्पणखाहिंविरूप
करीज्यौं ॥ एकहिरामअनेक संहारे । दूषणस्यौंत्रिशिराखर
मारे ॥ ५ ॥ तूअबहोहिसहायकमेरो । हौंबहुतैगुणमानिहौँते-
रो ॥ जोहंरिसीतहिल्यावनपैहौं । वैभ्रमिकोकनहींमरिहैंहैं॥६॥
मारीच ॥ रामहिंमानुपकै जनिजानो । पूरणचौदहलोकबखा-
नो ॥ जाहुँजहाँतिय लैसुनदेखो । हौंहारिकोजलहूँथललेखो॥७॥
टी०-रामचन्द्रकी आज्ञासों लक्ष्मण सीताको लैके गुफामें राख्यो है यह
कथा शेष जानो ॥ २ ॥ वृष राशिके रवि जे शेखर कहे तृणके दूषण होत है
सुखाइ डारत हैं तैसे रविके कुलके पूषण जे रामचन्द्र हैं तिन खर औ दूषण
नाम राक्षस को दूरि कियो कहे मारयो औ गेद शत्रु जो वैद्य है सो जैसे त्रिदोष
कहे कफ पित्त वात तीनोंको दोष एकही बार दूरि करत हैं तैसे रघुनंदनके शर
त्रिशिराके शिरनको एकही बार दूर करयों ॥ ३ ॥ ४ ॥ स्यों कहे सहित ॥५॥
सीताको ढूंढत भूतलमें भ्रमि कहे भूमिकै अथवा संदेहमो प्राप्त व्हैकै ॥ ६ ॥
चौदहों लोकमें पूर्ण कहे व्याप्त ॥ ७ ॥
मू०-रावण-सुन्दरीछंद ॥ तूअबमोहि सिखावत हैशठ । मैं
वशजगतकियोहठहीहठ ॥ बेगिचलेअबदेहिनऊतरु । देव
सबैजएकनहींहरु ॥ ८ ॥ दोहा ॥ याचिचल्योमारीचमन,
मरणदुहूँविधिआसु ॥ रावणकेकरनरकहै, हरिकरहरिपुरबासु॥
॥ ९ ॥ राम-सुंदरीछंद ॥ राजसुताइकमंत्रसुनोअब । चाहत
हौंभवभारहरेउसब ॥ पावकमेंनिजदेहहिंराखहु । छायशरीर
मृगहिअभिलाषहु ॥ १० ॥ चामरछंद ॥ आइयो कुरंगएक
चारुहेमहीरको । जानकी समेतचित्तमोहि रामवीरको ॥ राज
पुत्रिकासमीपसाधुबंधुंराखिकै। हाथचापबाण लैगयेगिरीशनां-
१ सूर्य्य. २ रोग.

द्वादशप्रकाशः १२. (११३)
धिकै ॥ ११ ॥ दोहा ॥ रघुनायकजबहींहन्यो, सायकशठ
मारीच ॥ हालक्ष्मणयहकहिगिरेउ, श्रीपतिकेस्वरनीच ॥
॥ १२ ॥ निशिपालिकाछंद ॥ राजतनयातबहिंबोलसुनियों
कहेउ। जाहुचलिदेवरनजातहमपैरहेउ । हेममृगहोहिंनहींरै-
निचरजानिये । दीनस्वररामकेहिभाँजिमुखआनिये ॥ १३ ॥
टी०-एक हर महादेवको छोडिकै और सब देवता मेरेजन कहे सेवक हैं ॥
॥ ८ ॥ आशु कहे जल्दी ॥ ९ ॥ छाया शरीरसों मृगै कहे चलिबेको अभि-
लाष करौ अर्थ छाया शरीर आलंब्य रहौ अथवा छाया शरीरसों या सुवर्णमृगको
अभिलाषी ॥ १० ॥ हेम सुवर्ण औ हीरनको कुरंग हरिण बनि मारीच आयो
॥ ११ ॥ जैसो रामचन्द्रको स्वरकहे शब्द है ताही स्वरसों हा लक्ष्मण यह
कहिकै गिरचौ नीच मारीचको विशेषण है ॥ १२ ॥ यह कोऊ राक्षस है हरिण-
को रूप धरिकै आयो है ताने रामचन्द्रको मारचो तासों हा लक्ष्मण ऐसो दीन-
स्वर रामचन्द्र कह्यो इति भावार्थः ॥ १३ ॥
मू०-लक्ष्मण ॥ सोचअतिपोचउरमोचुदुखदानिये । मातु
यहबातअवदातमममानिये ॥ रैनिचरछद्मबहुभाँतिअभिलाष-
हीं । दीनस्वररामकबहूंदनमुखभाषहीं ॥ १४ ॥ चंचलाछंद ॥
पक्षिराजयक्षराजप्रेतराजयातुधान । देवताअदेवतानृदेवताजि-
तेजहान ॥ पर्वतारिअर्बखर्बसर्बसर्बथाबखानि । कोटिकोटिसूर
चन्द्ररामचन्द्रदासमानि ॥ १५ ॥ चामरछन्द ॥ राजपुत्रि-
काकह्योसोऔरकोकहैसुनै । कानमूंदिबारबारशीशबीसधा-
धुनै ॥ चापकीयरेखखाँचिदेवसाखिदैचले । नांघिहैंतेभस्म
होहिंजीवजेबुरेभले ॥ १६ ॥
टी०-अति पोच कहे निषिद्ध जो दुःखदानि सोच है ताको उरसों मोचु कहे
त्याग करौ छद्म कपट ॥ १४ ॥ पक्षिराज गरुड यक्षराज कुबेर प्रेतराज यम-
राज यातुधान राक्षस देवता औ अदेवता दैत्य नृदेवता राजा औ पर्वतारि इंद्रेते
ये सब अर्ब खर्ब संख्या परिमित औ अर्बखर्ब सर्वकहे महादेव अर्बखर्बको संबंध

( ११४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
सर्वपदहूमें है तिन्हें सर्वथा कहे सब प्रकार बखानि कहे कहौं औ कोटि सूर्य औ
चन्द्रमा हैं तिन सबको रामचन्द्रके दास कहे सेवक मानौ रामचन्द्रके मारिवे
लायक ये कोऊ नहीं हैं इति भावार्थः ॥ १५ ॥ लक्ष्मणको राजपुत्रिकाने जे
कटुवचन कहे तिन्हें और कौन कहै औ कौन सुनै अर्थ अतिकटुवचन कहे जे
काहूके कहिवे सुनिबे लायक नहीं हैं औ जो थोरो सुनिबोहू करै तौ जामें आगे
और ना सुनिपरै तालिये कान मूंदिकै बिनसुने वचननके शोकसों बीसधा अर्थ
अनेक प्रकारसों शीश धुनै अथवा सीताही कान मूँदिके शीश धुनत भई कान
मूंदिवेको हेतु यह जामें लक्ष्मणके ये बोध वचन न सुनिपरै तौ लक्ष्मण वातै ना कहैं
रामचन्द्रके पास जाइ अथवा जामें कटुवचन ना सुनिपरै तालिये लक्ष्मणहीं कान-
को मूंदिकै वारवार शीशधुनतभये ॥ १६ ॥
मू०-छिद्रताकिछुद्रराजलंकनाथआइयो । भिक्षुजानिजान-
कीसोभीषकोबोलाइयो ॥ शोचपोचमोचिकैसकोचभीमवेष-
को । अंतरिक्षहींकरीज्यौंराहुचंद्ररेखको ॥ १७ ॥ दण्डक ॥ धू-
मपुरकेनिकेतमानोंधूमकेतुकी शिखाकीधूमयोनिमध्यरेखसु-
धाधामकी । चित्रकीसीपुत्रिकाकीरूरैबयरूरैमां हशम्बरछोडा-
इलईकामिनिकीकामकी ॥ पाखंडकीश्रद्धाकीमठे शबशएकाद-
शीलीन्हीकैश्वपचराजशाखाशुद्धसामकी । केशवअदृष्टसाथ
जीवजीतिजैसीतैसीलंकनाथहाथपरीछायाजायारामकी ॥१८॥
टी०-क्षुद्रनको राज जो लंकनाथ है सो छिद्र कहे अवसर ताकि भिक्षुककहे
दंडीरूप धरिकै सीतापै आयो शूर्पणखाकी नासिका काटेको जो पोच कहे बुरो
शोच है सीता हरण निश्चय करि ताको मोचिकै छोडिकै अथवा पोच रावणको
विशेषण है औ भीमवेषको जो संकोच सिकोरनो रह्यो ताको मोचिकै अर्थ जो
लघुशरीर करचोरहै ताको बडाइक अंतरिक्ष आकाश ॥ १७ ॥ धूमपुर के निकेत
कहे घरमें अर्थ धूम समूह में धूमकेतु जो अग्नि है ताकी शिखाज्योति है कि
धूमयोनि जे मेघहैं तिनके मध्यमें सुधाधाम जो चन्द्रमा है ताकी रेखा कहे
कलाहै कि रूरेकहे बडे बघरूरै कहे बौंडर वायु ग्रंथि करिकै प्रसिद्ध है तामें
चित्रपुत्रिका है किं शंबरनामा जो दैत्य है सो कामको शत्रुहै तेहि काम की

द्वादशप्रकाशः १२. (११५)
कामिनी रतिको छडाइ लीन्ही है कि पाखंडके वशमों श्रद्धापरी है यह कथा
विज्ञानगीतामें प्रसिद्ध है कि मठपतिके वश एकादशी परी कि श्वपचराजु चांडा-
लन को राजा शुद्धसामवेद की शाखा लीन्होंहै अष्ट कर्मके साथ में जैसी जीवं
ज्योति परी है तैसी छाया कृत जो राम की जाया सीता है सो लंकनाथ के
हाथ में परी ॥ १८ ॥
मू०-सीताजू-हरिलीलाछंद॥हारामहारमनहाररघुनाथधीर।
लंकाधिनाथवशजानहूँमोहिंवीर ॥ हापुत्रलक्ष्मणछोडावहुबे-
गिमोहिं। मार्त्तंडवंशयशकीसबलाजतोहिं ॥१९॥ पक्षीजटायु
यहबातसुनंतधाइ। रोक्योतुरंतबलरावणदुष्टजाइ॥कीन्हों प्रचंड
रथछत्रध्वजाबिहीन। छोड्योविपक्षतबभोजबपक्षहीन ॥२०॥
संयुताछंद॥ दशकंठसीतहिलेचल्यो।अतिवृद्धगीधहियोदल्यो॥
चितजानकीअधंकौकिये। हरितीनिद्वैअवलोकिये ॥ २१ ॥
पदपद्मकीशुभघूंघरी। मणनीलहाटकसेंजरी ॥ जनुउत्तरीय
विचारिकै । शुभडारिदीयगठारिकै ॥२२॥ दोहा ॥ सीताके
पदपद्मको, नूपुरपटजनिजानु। मनहुँकरयोसुग्रीवचर, राजश्री
प्रस्थानु॥२३॥यद्यपिश्रीरघुनाथजू, समसर्वगसर्वज्ञ।नरकैसी
लीला करत, जेहिमोहतसबअज्ञ ॥२४॥ राम-सवैया॥ निज
देखोंनहीँशुभगीतहिसीतहिकारणकौनकहै।अबहीँ।अतिमोहि-
तकैबनमांझगई सुरमारगमैमृगमारच्योजहीं ॥ कटुबातकहूतुम
सोंकहिआईकिधौँतेहित्रासडेराइरहीँ। अबहैयाहपर्णकुटीकिधौँ
और किधौंवहलक्ष्मणहोइनहीँ ॥ २५ ॥
टी०- ॥ १९ ॥ प्रचंडपदजटायुरावणरथतीन्योकोविशेषण ह्वै सकते है विपक्ष
शत्रु रावण ॥२०॥ तीनि औ द्वै कहे पांच अथवा द्वै तीनि कहिबेकी रीति शुभा-
वोक्ति है हरि वानर ॥२१॥ उत्तरीय ओढिबेको वस्त्र ॥२२॥ जब प्रस्थान भयो तब
आप आयोई चाहै ॥ २३ ॥ सम कहे सदा एक रस रहत हैं और सर्वग कहे सर्वत्र
व्याप्त हैं और सर्वज्ञ कहे सबजानत हैं ॥ २४ ॥ जो हमारे स्वरसों हा लक्ष्मण यह

( ११६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

कहिके मृग मरयो है सो हमारो शब्दजानि ताही स्वरके मार्ग ह्वै हमारे बडे
हितसों बनके मध्यमें गई है कि हे लक्ष्मण ! यह पर्णकुटी है कि कछू औरई वस्तु
है औ कि वह पर्णकुटी नहीं है और ई पर्णकुटी है ॥ २५ ॥
मू०-दोधकछन्द॥ धीरजसोंअपनोमनरोक्यो । गीधजटायु
पर्योअवलोक्यो ॥ छत्रध्वजारथदेखिकैबूझैउ । गीधकहौरण
कौनसोजूझेउ ॥ २६ ॥ जटायु ॥ रावणलैगयोराघवसीता ।
हारघुनाथरटैशुभगीता ॥ मैंबिनछत्रध्वजारथकीन्हों । ह्वैगयो
हौंवलपक्षविहीनो ॥२७॥ मैंजगमेंसबतेबडभागी । देहदशा
तबकारणलागी ॥ जो बहुभांतिनवेदनगायो।रूपसोंमैंअवलो-
कनपायो ॥२८॥ राम ॥ साधुजटायुसदाबडभागी । तोमन-
मोवपुसोंअनुरागी ॥ छूट्योशरीरसुनीयहबानी । रामहिमेंतब
ज्योतिसमानी ॥ २९ ॥ तोटकछंद ॥ दिशिदक्षिणकोकरिदा-
हचले । सरितागिरिदेखतवृक्षभले ॥ बनअंधकवंधबिलोकत
हीं। दोउसोदरखैंचलियेतबहीं ॥३०॥ जबखैवेहिकोजियबुद्धि
गुनी । दुहुँबाणनिलैदोउबाहिहनी॥वहँछाडिकैदेहचल्योजवहीं
यहव्योममेंबातकह्योतबहीं ॥ ३१ ॥ तोटकछंद ॥ पीछे
मधवामोहिंशापदई । गंधर्वतेराक्षसदेहभई॥ फिरिकैमघवास-
ह्युद्धभयो । उनकोधकैशीशमेंवज्रहयो ॥ ३२ ॥
टी०-॥२६ ॥ २७ ॥ दशा अवस्था अर्थ यह कि यह देह गृध्रकी औ यह
वृद्धावस्था तुम्हारे कछू उपकारके लायक नहीं रही तासों तुम्हारोउपकार भयो
औ ऐसो जो तुम्हारो रूप है ताकों देख्यो तासों जगमें मैं सबसों बडभागी
हौं ॥ २८ ॥ अर्थ सायुज्य मुक्ति पायो ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१॥ बाहु दई पर्यन्त
तीनिछंदके क्षेपकहैं पीछेकहे पूर्वहीं ॥ ३२ ॥
मू०-दोहा ॥ गयोशीशगडिपेटमें, पर्योधरणिपरआय ॥
कछुकरुणाजियमोंभई, दीन्हीबाहुबढ़ाय॥३३॥बाहुदई द्वैको-

शक्ती, आवैतेहिगहिखाउँ ॥ रामरूपसीताहरण,उधरहुगहनउ
पाउ॥३४॥सुरसरितेआगेचले,मिलिहैंकपिसुग्रीव।दैहैंसीताकी
खवरि, बाढैसुखअतिजीव ॥३५॥ तोटकछंद ॥ सरिताएकके-
शवसोभरई । अवलोकितहांचकवाचकई ॥ उरमेंसियप्रीतिस-
माइरही । तिनसोंरघुनायकबातकही ॥ ३६ ॥ अवलोकतहौं
जबहींजबहीं। दुखहोततुम्हैंतबहींतबहीं॥ वहबैरनचित्तकछूध-
रिये । सियदेहुबताइ कृपाकरिये ॥ ३७॥ शशिकेअवलोकन
दूरिकिये । जिनकेमुखकीछविदेखिजिये। कृतचित्तचकोरकछू-
कधरौ । सियदेहुबताय सहायकरौ ॥ ३८ ॥
टी०-॥३४॥करुणा करिकै द्वै कोश कि वाहु दई औ यह वर दियो कि जो इन
बाहुनके मध्यमें आवै ताको खाहु जब सीताहरण हैहै तब रामचन्द्र या मग अइहैं
तिनके गहन उपाय सों उद्धरहु कहै तुम्हारो उद्धार होई अर्थ जब रामचन्द्रको इन
बाहुनसों गहिहै तब तेरो उद्धार हैहै ॥ ३४ ॥ सुरसरि गोदावरी ॥ ३५ ॥३६ ॥
जब सीताको तुम अवलोकत रहे कहै देखत रहौ तब अपनासों अधिक सुन्दर
सीताके कुच देखि तुम्हारे दुख होत रहै अथवा हमको संयोगी देखत तासों
तुम्हारे दुःख होत रह्यो ॥ ३७ ॥ शशि जो अति सुन्दर जिनके मुखको देखि
शशिकी ओर विलोकिबो छोड़ि केवल जिनके मुखकी छविको देखिकै जियत
रहेहौ अथवा शशिके अवलोकन दर्शन दूरिकिये पर अर्थ जब कृष्णपक्षमें चन्द्रमा
आपनो दर्शनदृष्टि सों दूरि कियो न देखि परयो तब चन्द्रसम केवल जिनके
मुखकी छविको देखि जियत रहे हौ वह कृत कहै उपकार कछु चित्तमें धरिकै
सीताको बताइ देउ ॥ ३८ ॥
मू०-सवैया ॥ कहिकेशवयाचककेअरिचंपकशोकअशोक
लियेहरिकै । लखिकेतककेतकिजातिगुलाबतेतीक्षणजानितजे
डरिकै ॥ सुनिसाधुतुम्हैं हमबूझनआयेरहेमनमौनकहाधरिकै ।
सियकोकछुसोधुकहौकरुणामयसोकरुणाकरुणाकरिकै॥३९॥
नाराजछंद॥ हिमांशुमूरसोलगैसोबातबज्रसोबहै। दिशालगैंकु-

( ११८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

शानुज्यौविलेपअंगकोदहै ॥ विशेषिकालरातिलोकरालराति
मानिये । वियोगसीयकोनकाललोकहारजानिये ॥ ४० ॥
टी०-रामचन्द्र करुण वृक्षसों कहत हैं कि चम्पक जेहैं ते याचकर्क अरि शत्रुहैं
पुष्पनको याचक जो भ्रमर है ताकों निकट नहीं आवनदेत चंपकमें भ्रमर नहीं
बैठत यह प्रसिद्ध है ता भयसों चंपक सो सीताको सोधु नहीं जांचे अशोक जे
वृक्ष हैं तिनकं शोककों हरिकै छोडिकै अशोक यह जो नाम है ताको लीन्हों
है तासों जिनहूको तज्यौहै कि जिनके शोक हैही नहीं ते हमारो दुःख देखि
दुःखी है कृपा करि सीताको सोधु काहेको बताई है केतक केवरा औ केतकी
औ गुलाब इनकी जाति जे और कंटक वृक्ष हैं कमलादि तिन्हें तीक्ष्ण कहे कंट-
कित जानिकै डरिकै तज्यौ है सो हे करुणा कहे करुण वृक्ष ! करुणा कहे
दीनतामय जे हमहैं तिनसों सीताको कछू सोधु कहौ ॥३९॥ रामचन्द्र लक्ष्मणसों
कहत हैं कि हिमांशु जो चन्द्रमा है सो हमको सूर्य सम तप्त लागत है औ वायु
वज्रसम बहात है औ दशों दिशा अग्निके समान तप्तलागतिहैं औ तुम जो
शीतलताके अर्थ हमारे अंगनमें विलेप करतहौ सो अंगनकोजारतहै औ राति
काल राति समकराल लागति है औ सीताको वियोग लोक हरकाल संहार काल
सम लागत है ॥ ४० ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ यहिभाँतिविलोकेसकलठौर । गये
शबरीपैदोउदेवमौर ॥ लियोपादोदकत्यहिपदपखारि । पुनि
अर्ध्यादिकदीन्हेंसुधारि ॥ ४१ ॥ हरदेतमंत्रजिनकोविशाल
शुभकाशीमेंपुनिमरणकाल॥ तेआयेमेरेधामआज । सबसफ-
लकरनजपतपसमाज ॥४२॥ फलभोजनकोतेहिधरेआनि ।
भयेयज्ञपुरुषअतिप्रीतिमानि ॥ तिनरामचन्द्रलक्ष्मणस्वरूप ।
तबधरेचित्तजगजोतिरूप॥४३॥ दोहा ॥ शबरीपावकपंथतब,
हरखिगईहरिलोक ॥ बननबिलोकितहरिगये, पंपातीरसशोक
॥ ४४ ॥ तोटकछंद ॥ अतिसुन्दरशीतलसोभवसै । जहँरू-
पअनेकनिलोभलसै ॥ बहुपंकजपक्षिविराजतहैं । रघुनाथवि-
लोकतलाजतहैं ॥ ४५ ॥ सिगरीऋतुशोभितसुभ्रजही । लहै

ग्रीषमपैनप्रवेशसही ॥ नवनीरनीरताँहँसरसैं । सियकेशुभ
लोचनसेदरसैं ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४१ ॥ मंत्र राम तारक तप औ जप समाज के सफल करन कहे
सफल कर्त्ता अर्थ जो कोऊ जप तप करत है ताको फल रामचंद्र ही देत हैं ॥
॥ ४२ ॥ ४३ ॥ जीवतही अग्निमां जरिकै ॥ ४४ ॥ कैसो है पंपासर अति
सुंदर है औ अति शीतल है जहां शोभा जो है सदा आय वास करति है औ
जहां कहे स्थान में जातही प्राणिन के अनेक रूप सो लोभ बसतहै अर्थ जहां
जातही प्राणिन के रहिबेको लोभबाढत हैं औ बहुत पंकज कमल औ हंसादि
पक्षी विराजतहैं ते रामचन्द्रको देखिकै लज्जित होत हैं जा अंगको जो उपमान
है ता अंगको निरखि अपना सों अधिक जानि लजात हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
मू०-विजयछंद ॥ सुन्दरसेतसरोरुहमें करहाटकहाटककी
द्युतिकोहै । तापरभौरभलेमनरोचनलोकविलोचनकीरुचिरो-
है। देखिदईउप

कह्यो सों संग मित्र जो चंदहै ताको विलोकि इनको चित्त जरत है सोऊ न्यायही
है काहेते निशाचरन की पद्धति परिपाटीको लिये है निशाचर राक्षसहू हैं चंदहू
है सो निशाचरन की राक्षसन की परिपाटीको लिये है राक्षसनहूंको देखतही
चित्तजरतहै औ मृग मित्रकहिया जनायो कि पशुनको मित्र है प्रतिकूला दुःखद
जो शुकादिक होतहैं सोऊ न्यायही है काहेते वे पक्षी पशुहैं इनकी गतिको नहीं
जानत कि ये ईश्वरहैं कमलाकरपद श्लेष है कमलनके आकर समूहसों युक्त औ
कमला लक्ष्मीके उत्पन्नकर्ता युक्ति यह कि ये तुम्हारे जामोतु हैं इनको दुःख
देना तुम्हें न चाहिये ॥ ४८ ॥

मू०-दोहा ॥ ऋष्यमूकपर्वतगये, केशवश्रीरघुनाथ ॥ देखे
वानरपंचविभु, मानोदक्षिणहाथ ॥४९॥ कुसुमविचित्राछंद ॥
तबकपिराज रघुपतिदेखे । मननरनारायणसमलेखे॥ द्विजव-
पुधरि तहँहनुमत आये । बहुविधिआशिषदैमनभाये ॥ ५० ॥
हनुमान ॥ सबविधिरूरेबनमहँकोहौ । तनमनसूरेमनमथमों-
हौ ॥ शिरसिजटावकलाबपुधारी । हरिहरमानहुँविपिनबिहारी
॥ ५१ ॥ परमबियोगीसमरसभीने । तनमनएकैयुगतनकी-
ने ॥ तुमकोहौकालगिबन आये । क्यहिकुलहौकौनैपुनिजाये
॥ ५२ ॥ राम-चंचरीछंद ॥ पुत्रश्रीदशरथकेबनराजशासन
आइयो । सीयसुन्दरिसंगहीबिछुरीसोसोधनपाइयो ॥ राम
लक्ष्मणनामसंयुक्तशूरवंशबखानिये । रावरेबनकौनहौक्यहि
काजक्यौंपहिंचानिये ॥ ५३ ॥

टी०-सुग्रीव हनूमान नल नील सुषेण य पांच जे वानरहैं बिभु कहे प्रतापी
तिन सहित ऋष्यमूक को देख्यो मानों सो पृथिवीको दक्षिण हाथहै पृथिवी इति
शेषः अथवा मानों अपनो दक्षिण हाथही देख्यो है मित्रको औ भ्राता को दक्षिण
बाहुसम कहिबेकी रीतिहै ॥ ४९ ॥ नरनारायणके द्वैरूप हैं ॥ ५० ॥ रूरे सुन्दर

१ दामाद ।

द्वादशप्रकाशः १२. ( १२१ )

॥ ५१ ॥ परम वियोगी हौ अर्थ तुम्हारी चेष्टाते जानि परत है कि काहू बडे
हितको बियोग भयो है औ जटा वल्कलादि सों शान्तरसमें भीनेजानि परतहौ ॥
॥ ५२ ॥ शासनआज्ञा ॥ ५३ ॥
मू०-हनुमान-दोहा ॥ यागिरिपरसुग्रीवनृप, तासँगमंत्री
चारि ॥ वानरलईछँड़ाइतिय, दीन्होवालिनिकारि ॥ ५४ ॥
दोधकछंद ॥ वाकहँजोअपनोकरिजानो । मारहुवालिविनैयह
मानो ॥ राजदेहुजोवाकीतियाको । तोहमदेंहिंबतायसिया-
को ॥ ५५ ॥ लक्ष्मण ॥ आरतकेप्रभुआरतटारौ । दीनअना-
थनकोप्रतिपारौ ॥ स्थावरजंगमजीवजोकोऊ । सन्मुखहोतकृ-
तारथसोऊ ॥ ५६ ॥ वानरहैहनुमानसिधारेउ । सूरजकोसु-
तपायँनिपारेउ ॥ रामकह्योउठिवानरराई । राजसिरीसखिस्यो
तियपाई ॥ ५७ ॥ दोहा ॥ उठेराजसुग्रीवतब, तनमनअतिसु-
खपाइ ॥ सीताजूकेपटसहित, नूपुरदीन्हेआइ ॥५८॥ तारक
छंद ॥ रघुनाथजबैपटनूपुरदेखे । कहिकेशवमानसमानाहँले-
खे ॥ अवलोकतलक्ष्मणकेकरदीन्हे । उनआदरसोंशिरमानि-
कैलीन्हे ॥ ५९ ॥ राम-दंडक ॥ पंजरकीखंजरीटनैननको-
किधौंमीनमानसको केशोदासजलुहैकिजालुहै । अंगकोकि
अंगरागगेडुआकीगलसुईकिधौंकटिजेबहीकोउरकोकिहारुहै॥
बंधनहमारोकामकेलिकोकिताडिबेकोताजनोंविचारकोकीच-
मरबिचारुहै । मानकीजमनिकाकी कंजमुखमूंदिबेकोसीता-
जूकोउत्तरीयसबसुखसारुहै ॥ ६० ॥
टी०-वानर वालिको विशेषण है ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ कृतार्थ कहे कृतहै अर्थ
प्रयोजन जाको ॥ ५६ ॥ अर्थ वालिको मारि कै राज्य श्रीसहित तुम्हारी स्त्री
हम तुमको दैंहैं ऐसा निश्चय वचन रामचंद्र सुग्रीवको दियो ॥ ५७ ॥ ५८ ॥