रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
DevanagariHindipublished269 पृष्ठ
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बलीपावनपादुकालै। प्रदक्षिणारामसियाहुकोदै॥ गयेतेनंदी
पुरबासकीनौं। सबंधुश्रीरामहिचित्तदीनों ॥ ४५ ॥ दोहा ॥
केशवभरतहिआदिदै, सकलनगरकेलोग ॥ बनसमानघरघर
बसे सकलविगतसंभोग ॥ ४६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिद्रजिद्विरचितायांभरतस्यचित्रकूटागमनं
नामदशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
टीका-पादुकारूपी इष्ट कहे स्वामी देहु आशय यह कि राज्य पर स्वामी
चाहिये ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजाकीजानकीजानिप्रसादायजनजान-
कीप्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायादशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
मू०-दोहा ॥ एकादशैप्रकाशमें, पंचवटीकोवास॥शूर्पणखा-
केरूपको, रघुपतिकरिहैंनाश ॥ १॥ भरतोद्धता