रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
रिमंदिरसौंअनुरागी ॥ २५ ॥ अमृतगतिछंद ॥ निपटपति-
व्रतधरणी । जगजनकैदुखहरणी ॥ निगमसदागतिसुनिये।
अगतिमहापतिगुनिये ॥ २६ ॥
टी०-कंजजब्रह्मा ब्रह्माकीमतिहूको अनुरागहारी मंदिर बैकुण्ठ में है औ
गोदावरी हू को है काहेते जो कोऊ स्नान करत हैं ताको आपनो जानि बैकुण्ठ
पठावति है ॥ २५ ॥ यामें विरोधाभास है सदा पति जो समुद्र हैं तामें लीन
रहतिहै तोसों निपट पतिब्रत धरणी कह्यो विरोध पक्षमें दुःख काम पीडा
अविरोध में पापजनित दुःख दरिद्रादि निगम जे वेद हैं तिनमें सदा गति कहे
सदा है गति मुक्ति जासों ऐसी सुनियत है अर्थ जो कोऊ स्नान करत हैं
ताकोमुक्तिदेतिहैं औ पति जो समुद्रहै ताही को अगति सुनियत है अर्थ ताको
गति मुक्ति नहीं देति यह विरोधार्थ है अविरोधहू की अगति गमन रहित समुद्रको
जल वहत नहीं ॥ २६ ॥
मू०-दोहा ॥ विषमयहैगोदावरी, अमृतनकोफलदेति ॥
केशवजीवनहारको, दुखअशेषहरिलेति ॥ २७ ॥ त्रिभंगी-
छंद ॥ जबजबधरिबीनाप्रगटप्रबीनाबहुगुणलीनासुखसीता ।
पियजियहिरिझावैदुखनिभजावै विविधबजावैगुणगीता ॥
तजिमतिसंसारीविपिनविहारीदुखसुखकारीघिरिआवै ।
तबतबजगभूषण रिपुकुलदूषणसबकोभूषणपहिरोवै ॥ २८ ॥
तोटकछंद ॥ कबरी कुसुमालिसिखीनदई । गजकुंभनिहार-
निशोभमई ॥ मुकुताशुक सारिकनाकरचे । कटिकेहरिकिं-
किणिशोभसचे ॥ २९ ॥ दुलरी कलकोकिलकंठबनी ॥
मृगखंजनअंजनभाँतिठनी ॥ नृपहंसनि नूपुरशोभभिरी ।
कलहंसनिकंठनिकंठसिरी ॥ ३० ॥
टी०-याहूमें विरोधाभास है विषमयहै जलमय ॥ "विषन्तुगरलेतोये
इति मेदिनी"॥औ जैसे अमृत अमर करत है तैसे याहू मुक्तकै अमर करतिहै विरोध
पक्षमें जीवन जीव अविरोधमें जल दुःख प्यास दुःख अथवा विषयमें कहे टेढ़ीहै