सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

एकादशप्रकाशः ११. (१०३)
राजै जनुकेशवतपबलकी। तनुवलितपलितजनुसकलवासना
निकरिगईथलथलकी॥ कांपतिशुभग्रीवासबअँगसींवादेखत
चित्तभुलाहीं। जनुअपनेमनप्रतियहउपदेशतियाजगमेंकछु
नाहीं॥६॥प्रमिताक्षराछंद॥ हरवाइजाइ सियपाँइँपरी।
ऋषिनारिसूंघिशिरगोदधरी॥ बहुअंगरागअँगअंगरये। बहु
भाँतिताहिउपदेशदये॥ ७॥ स्रग्विणीछंद॥ रामआगेचले
मध्यसीताचली। बंधुपाछेभयेसामसोमैभली॥ देखिदेहीसबै
कोटिधाकेभनो। जीवजीवैशकेबीचमायामनो॥ ८॥
टी०-मनको शोधिसांधि शुद्ध करि करि गुनकी जो उर विशेष धरयो है
अर्थ तुम्हारो ध्यान करयो है अथवा मनहींको शुद्ध करिकै जो उरमें धारण करयो
अर्थ मनकी जो चंचलता है ताहि छोड़ाइ अपनेवश्य करचो है सो हे रामचन्द्र !
ताको सब को फल जो तुम्हारे दर्शन हैं ताको पायो॥ ३॥ ४॥ जरा कहे
बुढाईरूपी जो सखी है ताके साथ देख्यो॥ ५॥ तन वलितकहे युक्त है पलितकहे
ढिलाइसों अर्थ वृद्धता सों त्वचामें सिकुरा परिगये हैं सो मानों थलथल की
अंगअंगकी वासना विषय वासना निकरिगई है ताहीते अंग अंग सिकुरि
गयेहैं सींवा मर्यादा॥ ६ ॥ हरवाइकहं हरवराइकै॥ ७॥ बनोकहे कह्यो
जीवैश ईश्वर॥ ८॥
मू०-मालतीछंद॥ विपिनविराधबलिष्ठदेखियो। नृपतन-
याभयभीतलेखियो॥ तबरघुनाथबाणकैकहयो। निजनिर्णवा
पंथकोठयो॥ ९॥ दोहा॥ रघुनायकसायकधरे, सकललोक
शिरमौर॥ गयेकृपाकरिभक्तिवश,ऋषिअगस्त्यकेठौर॥१०॥
वसंततिलकाछंद॥ श्रीरामलक्ष्मणअगस्त्यसनारिदेख्यो।
स्वाहासमेतशुभपावकरूपलेख्यो॥ साष्टांगक्षिप्रअभिवंदन
जाइ कीन्हों॥ सानंदआशिषअशेषऋषीशदीन्हों॥ ११॥
बैठारि आसनसबैअभिलाषपूजे। सीतासमेतरघुनाथसबन्धु-