रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशप्रकाशः ११. (१०५)
॥ त्रिभंगीछंद ॥ फलफूलनपूरेतरुवररूरैकोकिलकुलकल रव-
बोलैं । अतिमत्तमयूरीपियरसपूरीवनबनप्रतिनाचतिडोलैं ॥
साराशुकपंडितगुणगणमण्डितभावनिमैंअरथबखानैं ॥ देखहु
रघुनायकसीयसहायकमदनरतिमधुजानै ॥ १८ ॥
टी०-॥ १३ ॥ तब कहे तुम्हारो ॥ १४ ॥ प्रशस्तनीको सुदेश समउच्च
नीच रहितेति सनीरु सजल औ नरु जे वृक्ष हैं तिनको जो खण्ड समूह है तासों
मण्डित युक्त औ समृद्ध कहे बर्द्धमान अधिक इति शोभाको धरै धारण करे
होई निवासको कहे बसिवे की ॥ १५ ॥ १६ ॥ १७ ॥ रामचन्द्रके आगमन-
सों दंडकारण्यमें रूरै कहे सुन्दर जे तरुवृक्ष हैं ते फल, औ फूलनसों पूरे युक्त
भये अथवा रूरैजे फल औ फूल हैं तिनसों तरुवर पूरे औ कोकिल के जे कुल-
जाति समूह हैं ते कल कहे अव्यक्त मधुररव शब्दको बोलतहैं ॥"काकलीतुकले-
सूक्ष्मध्वनौतुमधुरास्फुटे ॥ कलो मंद्रस्तुगंभीरेतारोत्युच्चैस्त्रयस्त्रिषु ” इत्यमरः ॥
औ अतिमत्त जे मयूरीहैं ते पिय जे मयूर हैं तिनके रसमैं प्रेममें पूरी वनवन प्रति
नाचत डोलती हैं अर्थ जहाँ जहाँ मोर नाचत हैं तहाँ तहाँ संग मयूरी डोलती
हैं औ सारो सारिका औ शुक जे गुणगणसों मंडित पंडित प्रवीणहैं अर्थ अनेक
गुणनमें पंडित हैं ते भावनियम कहे अनेक भाव अभिप्राय युक्त गानके अर्थ को
बखानत हैं अथवा नृत्यके जे अनेक भाव चेष्टा हैं तिनमें अर्थ को बखानत हैं
जब जैसी चेष्टा देखत हैं तब तैसे अर्थ के प्रयोजनको बखान करत हैं तामैं
तर्क करतहैं कि रघुनायक रामचन्द्र औ सीता औ सहायक जे लक्ष्मण हैं तिनको
इन वृक्षादिकन देख्यो है सो मानो मदन काम औ रतिसहित मधुवसन्त जानत
हैं तौ वसंतहूकै आगमनमें ये कौतुक होत हैं तासों उत्प्रेक्षा करयो औ युक्ति
यह कि वसंत वनको प्रभुहैं मो प्रभुकी अवाईमें अनेक वितान बिछावन नृत्यादि
रचना सब करत हैं सो रतिसहित मदन जो मित्र है तासों युक्त वसंतको आवत
देखि वन करचो प्रफुल्लित जे अनेक कुंज हैं तेई वस्त्र भवन औ वितान हैं औ
गिरे जे पुष्पहैं तेई पुष्प बिछावने हैं कोकिल गावत हैं मोर नाचन हैं सारो
शुक बखान करत हैं वेश्यादि नृत्य कारिनहूमें बखान कर्त्ता एकरहत है ॥ १८ ॥
मू०-लक्ष्मण-सवैया ॥ सबजातिफटीदुखकीदुपटीकपटी
नरहैजहँएकघटी । निघटीरुचिमीचघटीहूँघटीजगजीवयतीन-