रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशप्रकाशः ११. ( १०९ )
अमृत जे देवता हैं तिनके फलको देति है अर्थ शुद्धगनिको देति है औ जीवन-
हार जे यमराज हैं तिनको दुःख कहे तिनकृत दुःख यम यातना इति । ताको
अशेष कहे संपूर्ण हरिलेति है ॥ २७ ॥ सुख कहे सुखसों गुण सीतारामचंद्रकी
गुणगीता दुःख कारी व्याघ्रादि सुखकारी कोकिलादि जे विपिनविहारी कहे
वन विहारी हैं ते संसारी मति कहे भेद भय मतिको तजिकै मनुष्यके समीपमें
वन जीवनको आपहीमें आइबो आश्चर्य है सो आवत हैं याही संसारी मतिको
त्याग जानो ॥ २८ ॥ तीनि छंदनमें एक वाक्यता है शिखी मोरकबरी
कहे केशपाश ॥ २९ ॥ नृप हंसराजहंस ॥ ३० ॥
मू०-मुखबासनिवासितकीनतवै । तृणगुल्मलतातरुशैल
सबै ॥ जलहूथलहूयहिरीतिरमैं । बनजीवजहांतहँसंगभ्रमैं ॥
॥ ३१ ॥ दोहा ॥ सहजसुगंधिशरीरकी, दिशिविदिशन-
अवगाहि ॥ दूतीज्योंआई लिये, केशवशूर्पन