सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

( १०४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
पूजे ॥ जाके निमित्तहमयज्ञयज्योसोपायो । ब्रह्मांडमंडनस्व-
रूपजोवेदगायो ॥ १२ ॥
टी०-निर्वाण जो मोक्ष है ताके पंथ कहे राह में ठयो कहे युक्त करचो
अर्थ मुक्ति दियो ॥ ९ ॥ सकल लोक शिरमौर जे रघुनाथ हैं ते सायक जे
बाण हैं तिनको धरे अगस्त्यके ठौरमें गये अथवा रघुनायक भक्तिके वश कृपा-
कारिकै अगस्त्यके ठौर गये तहां सकललोक शिरमौर जे अपने सायक हैं तिन्हें
धरे धारण करचो विष्णु के धनुर्वाण अगस्त्य के यहां धरे रहे हैं ते रामचंद्र को
अगस्त्य दियो हे यह कथा वाल्मीकीय रामायणमें है अथवा सकललोक शिर-
मौर जो विष्णु हैं तिनके सायकधरेधारणकरचो अथवा रघुनायकके सकल लोक
शिरमौर सायक अगस्त्यके ठौर धरे हैं तालिये औ भक्ति वश कृपाकारि अग-
स्त्यके ठौर गये ॥ १० ॥ स्वाहा अग्नि की स्त्री ॥ ११ ॥ सबै आपने अभि-
लाष पूजे पूर्ण करे ब्रह्माण्ड को मंडन भूषण जो यह रावरो स्वरूप है ताहीके
मिलिबे के लिये हम यज्ञ यज्यो होम्योकरचो इति सो यह स्वरूप पायो ॥ १२ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ ब्रह्मादिदेवजबबिनयकीन । तटक्षीर
सिन्धुकेपरमदीन ॥ तुमकह्योदेवअवतरहूजाइ। सुतहोंदशरथ-
कोहोतुआइ ॥ १३॥ हमतबतेमनआनन्दमानि । मनचितवत
तवआगमनजानि। ह्वाँरहिजैकारिजैदेवकाजु । ममफूलिफल्यो
तपवृक्षआजु ॥ १४ ॥ श्रीराम-पृथ्वीछंद ॥ अगस्त्यऋषिरा-
जजुबचनएकमेरोसुनौ।प्रशस्तसबभाँतिभूतलसुदेशजीमेंगुनौ॥
सनीरतरुखंडमंडितसमृद्धशोभाधरैं। तहांहमनिवासकीबिमल
पर्णशालाकरैं ॥ १५ ॥ अगस्त्य-पद्मावतीछंद ॥ यद्यपिजग
कर्त्तापालकहर्त्तापरिपूरणवेदनगाये । अतितदपिकृपाकरिमा-
नुषवपुधारिथलपूछनहमसोंआये ॥ सुनिसुरवरनायकराक्षस-
घायकरक्षहुमुनिजनयशलीजै । शुभगोदावरितटविशदपंचव-
टपर्णकुटीतहँप्रभुकीजै ॥ १६ ॥ दोहा ॥ केशवकहेअगस्त्यके-
पंचवटीकेतीर ॥ पर्णकुटीपावनकरी, रामचन्द्ररणधीर॥ १७॥