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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 269 में से

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पृष्ठ 112

( १०६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
कीछूटतीतटी । अघओघकीबेरीकटीबिकटीनिकटीप्रकटीगुरु-
ज्ञानगटी । चहुँओरननाचतिमुक्तिनटीगुणधूरजटीवनपञ्च-
वटी ॥ १९ ॥
टी०-दुपटी द्वैपाटको ओढिबे को वस्त्र सो जहाँ जा पंचवटीकं निकट सब
फाटि जाति है नेकहू नहीं रहति अर्थ सब दुःख जहां नशि जात हैं औ कपटी
जीव जहां एक घडी नहीं रहत यासों या जनायो कि जहाँ जातही कपटीको
कपट दूरि होतहै औ जाकी शोभा निरखि जगके जे यती तपस्वी जीव हैं तिनकी
तटी कहैं ध्यान स्थिती सो छूटि औ मीचुकी रुचि घटीहू घटी कहैं घरी
घरीमें निघटी घटत भई अर्थ यती जीवनको मरे ते मुक्ति होति है परन्तु जा
स्थानकी शोभा निरखि मुक्तिहू की इच्छा नहीं करत अघ पाप ओघ समूह बेरी
बंधन जंजीरसो ऐसी जो पंचवटीहै सो धूर्जटी जो महादेव हैं तिनके गुणनसों
जटी कहे युक्त है यई दुःख नाशनादि गुण महादेवहू मों हैं अथवा ये जे दुःख
नाशनादि गुणहैं तिनसों औ धूर्जटी जे महादेव हैं तिनसों जटी कहे युक्त हैं
पंचवटी ॥ १९ ॥
मू०-हाकलिकाछन्द ॥ शोभतदण्डककीरुचिबनी । भाँति-
नभातिनसुन्दरघनी ॥ सेवबडेनृपकीजनुलसै ॥ श्रीफलभूरि-
भाव जहँबसै ॥२०॥ बेरभयानकसीअतिलगै । अर्कसमूहज-
हाँजगमगै॥नैननकोबहुरूपनग्रसै। श्रीहरिकीजनुमूरतिलसै २१
टी०-दण्डकनाम राजा रहे हैं तिनको राज्य शुकके शाप सों वन ह्वै गयो
है तासों दंडकारण्य कहावत है रुचि शोभा श्रीफल बेल औ लक्ष्मीको फल
बडे राजाकी सेवामें बहुत द्रव्य पाइयत है ॥२०॥ भयानक बेर प्रलयकाल अर्क
मदार औ सूर्य प्रलय कालहूमो बारहौं आदित्य उगत हैं नैननको अनेक रूपकरि
ग्रसत हैं यासों या जनायो कि क्षणमें अधिक अधिक नवीन शोभा धरत है
ऐसी विष्णुकी मूर्तिहू है तासों समता कर्यो सुंदरताको याही प्रकार वर्णन है
यथामाघकाव्ये ॥ “ दृष्टोपिशैलःसमुहुर्मुरारेरपूर्ववद्विस्मयमाततान ॥ क्षणेक्षणे
यन्नवतामुपैति तदेव रूपंरमणीयतायाः ” ॥ २१ ॥
मू०-राम-दोधकछंद ॥ पांडवकीप्रतिमासमलेखो । अर्जुनं
भीममहामतिदेखो ॥ हैंसुभगासमदीपतिपूरी । सिंदुरकीतिल-