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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

( ९ )
हरिजन हरिहि और ना जाने, तजै आन तन त्यागी।
कह रैदास सोई जन निर्मल, निसि दिन जो अनुरागी ॥३॥
॥ १६ ॥
भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आइ भगति तब गई बड़ाई ॥टेक॥
कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे।
कहा भयो जे चरन पखारे, जौँ लौँ तत्त्व न चीन्हे ॥१॥
कहा भयो जे मूँड़ मुड़ायो, कहा तीर्थ ब्रत कीन्हे।
स्वामी दास भगत अरु सेवक, परम तत्त्व नहिँ चीन्हे ॥२॥
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक१ ह्वै चुनि खावै ॥३॥
॥ १७ ॥
अब कछु मरम बिचारा हो हरि।
आदि अंत औसान राम बिन, कोइ न करै निवारा हो हरि ॥टेक॥
जब मैँ पंक पंक२ अमृत जल, जलहि सुद्ध होइ जैसे।
ऐसे करम भरम जग बाँध्यो, छूटै तुम बिन कैसे हो हरि ॥१॥
जप तप बिधी निषेध नाम करूँ, पाप पुन्न दोउ माया।
ऐसे मोहिँ तन मन गति बीमुख जनम जनम डँहकाया३ हो हरि ॥२॥
ताड़न४ छेदन५ त्रायन६ खेदन७, बहु बिधि कर ले उपाई।
लोनखड़ी८ संजोग बिना जस, कनक कलंक न जाई हो हरी ॥३॥
भन रैदास कठिन कलि के बल, कहा उपाय अब कीजै।
भव बूड़त भयभीत जगत जन, करि अवलंबन९ दीजै हो हरी ॥४॥
॥ १८ ॥
नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना हो।
दीनानाथ दयाल नरहरे ॥ टेक ॥
जनमेउँ तौही ते बिगरान। अहो कछु बूझै बहुरि सयान ॥१॥
१ पिपीलिका—चींटी। २ कीचड़। ३ ठगाया। ४ मारना। ५ काटना। ६ रक्षा करना।
७ शोक करना, त्याग करना। ८ नौसादर। ९ सहारा।
२

( १० )
परिवारि बिमुख मोहिँ लागि । कछु समुझि परत नहिँ जागि¹ ॥२॥
यह भौ बिदेस कलिकाल । अहो मैं आइ पर्योँ जमजाल ॥४॥
कबहुक तोर भरोस । जो मैं न कहूँ तो मोर दोस ॥ ४ ।
अस कहिये तेऊ न जान । अहो प्रभु तुम सरबस में सयान ॥५॥
सुत सेवक सदा असोच । ठाकुर पितहिँ सब सोच ॥ ६ ॥
रैदास बिनवै कर जोरि । अहो स्वामी तुम मोहिँ न खोरि² ॥७
सु³ तौ पुरबला अकरम मोर । बलि जाउँ करौ जिन कोर⁴ ॥८॥
॥ १९ ॥
त्यौँ तुम कारन केसवे, लालच जिव लागा ।
निकट नाथ प्रापत नहीँ, मन मोर अभागा ॥टेक॥
सागर सलिल⁵ सरोदिका⁶, जल थल अधिकाई ।
स्वाँति बुंद की आस है, पिउ प्यास न जाई ॥ १ ॥
जौँ रे सनेही चाहिये, चित्त बहु दूरी ।
पंगुल फल न पहुँच ही, कछु साध न पूरी ॥ २ ॥
कह रैदास अकथ कथा, उपनिषद⁷ सुनीजै ।
जस तूँ तस तूँ तस तुहीँ, कस उपमा दीजै ॥ ३ ॥
॥ २० ॥
गोबिंदे भवजल ब्याधि अपारा ।
ता में सूझै वार न पारा ॥टेक॥
अगम घर दूर उरतर, बोलि भरोस न देहू ।
तेरी भगति अरोहन संत अरोहन⁸, मोहिँ चढ़ाइ न लेहू ॥१॥
लोह की नाव पखान बोझी, सुकिरित भाव बिहीना ।
लोभ तरंग मोह भयो काला, मीन भयो मन लीना ॥२॥
दीनानाथ सुनहु मम बिनती, कवने हेत बिलंब करीजै ।
रैदास दास संत चरनन, मोहिँ अब अवलंबन दीजै ॥३॥
१ संसार या जगने पर। २ दोष न विचारो। ३ सो। ४ कसर। ५ पानी
६ तालाब का पानी। ७ वेद का एक अंग जिस में ब्रह्म का निरूपन है। ८ सीढ़ी।

( ५५ )
॥ २१ ॥
कहाँ सूते मुग्ध नर काल के मँझ मुख।
तजिय बस्तु राम चितवत अनेक सुख ॥टेक॥
असहज धीरज लोप कृस्न उधरंत कोप,
मदन भुवंग१ नहिँ मंत्र जंता।
बिखम पावक ज्वाल ताहि वार न पार,
लोभ की अयनी२ ज्ञान हंता ॥१॥
बिखम संसार ब्याल१ ब्याकुल तबै,
मोह गुन बिखै सँग बंधभूता३ ।
टेरि गुन गारुड़ी४ मंत्र स्रवना दियो,
जागि रे राम कहि कहि के सूता ॥२॥
सकल सिम्रित५ जिती सत मति कहै तिती,
हैँ इनही परम गति परम वेता६ ।
ब्रह्म ऋषि नारद संभु सनकादिक,
राम राम रमत गये पार तेता ॥३॥
जजन जाजन७ जाप रटन तीरथ दान,
ओषधी रसिक गदमूल८ देता।
नागदवनि जरजरी राम सुमिरन बरी,
भनत रैदास चेत निमेता९ ॥४॥
॥ २२ ॥
रामा हो जग जीवन मोरा।
तूँ न बिसोरि राम मैं जन तोरा ॥टेक॥
सकट सोच पोच दिन राती।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती ॥१॥
१ सांप। २ सेना, फौज। ३ बँधा हुआ। ४ सांप के विष उतारने का मंत्र।
५ धर्मशास्त्र। ६ जानने वाला। ७ यज्ञ करना और कराना। ८ रोग की जड़ को पैदा
करता है। ९ नियम करने वाला।

( १२ )
हरहु बिपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अलंबन ।
बेगि मिलौ जीन करौ विलंबन ॥३॥
॥ २३ ॥
तेरा जन काहे को बोलै ।
बोलि बोलि अपनी भगति को खोलै ॥टेक॥
बोलत बोलत बढ़ै वियाधी, बोल अबोलै जाई ।
बोलै बोल अबोल कोप करै, बोल बोल को खाई ॥१॥
बोलै ज्ञान मान परि बोलै, बोलै वेद बड़ाई ।
उर मेँ धरि धरि जब ही बोलै, तब ही मूल गँवाई ॥२॥
बोलि बोलि औरहि समझावै, तब लगि समझ न भाई ।
बोलि बोलि समझी जब बूझी, काल सहित सब खाई ॥३॥
बोलै गुरु अरु बोलै चेला, बोल बोल की परतीति आई ।
कह रैदास मगन भयो जबही, तबहि परमनिधि पाई ॥४॥
॥ २४ ॥
ऐसी भगति न होइ रे भाई ।
राम नाम बिन जो कछु करिये, सो सब भरम कहाई ॥टेक॥
भगति न रस दान भगति न कथै ज्ञान ।
भगति न बन मेँ गुफा खुदाई ॥१॥
भगति न ऐसी हाँसी भगति न आसापासी ।
भगति न यह सब कुल कान गँवाई ॥२॥
भगति न इंद्री बाँधा भगति न जोग साधा ।
भगति न अहार घटाई ये सब करम कहाई ॥३॥
भगति न इंद्री साधे भगति न बैराग बाँधे ।
भगति न ये सब वेद बड़ाई ॥४॥

भगति न मूड़ मुड़ाये भगति न माला दिखाये ।
भगति न चरन धुवाये ये सब गुनी जन कहाई ॥५॥
भगति न तौ लौं जाना आप को आप बखाना ।
जोइ जोइ करै सो सो करम बड़ाई ॥६॥
आपो गयो तब भगति पाई ऐसी भगति भाई ।
राम मिल्यो आपो गुन खोयो रिधि सिधि सबै गँवाई ॥७॥
कह रैदास छूटी आस सब तब हरि ताही के पास ।
आत्मा थिर भई तब सबही निधि पाई ॥८॥
॥ २५ ॥
है सब आतम सुख परकास साँचो ।
निरंतर निराहार कलपित ये पाँचो ॥टेक॥
आदि मध्य औसान१ एक रस, तार बन्यो हो भाई ।
थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रह्यो हरिराई ॥१॥
सर्बेस्वर सर्वांगी सब गति, करता हरता सोई ।
सिव न असिव न साध अस सेवक, उनै भाव नहिँ होई ॥२॥
धरम अधरम मोच्छ नहिँ बंधन, जरा मरन भव नासा ।
दृष्टि अदृष्टि गेय२ अरु ज्ञाना, एकमेक रैदासा ॥३॥
(राग गौरी)
॥ २६ ॥
कोई सुमार३ न देखूँ ये सब उपल४ चोभा ।
जा को जेता प्रकास ता को तेति ही सोभा ॥टेक॥
हम हिये सीखि सीखै हम हिये माड़े ।
थोरे ही इतराइ चलै पतिसाही५ छाड़े ॥१॥
अतिही आतुर वह काची ही तोरे ।
बूड़े जल पैसे६ नहिँ पड़ै रे खोरे ॥२॥
१ अंत । २ जानने योग्य । ३ गिनती । ४ पत्थर । ५ बादशाही । ६ पैठे ।

( १४ )
थोरे थोरे मुसियत परायो धना।
कह रैदास सुन संत जना ॥३॥
॥ २७ ॥
मरम कैसे पाइब रे।
पंडित कौन कहै समुझाई, जा ते मेरो आवा गमन बिलाई ॥टेक॥
बहु बिधि धरम निरूपिये, करते देखै सब कोई।
जेहि धरमे भ्रम छूटिहै, सो धरम न चीन्हे कोई ॥१॥
करम अकरम बिचारिये, सुनि सुनि वेद पुरान।
संसा सदा हिरदै बसै, हरि बिन कौन हरै अभिमान ॥२॥
बाहर मूँदि के खोजिये, घट भीतर बिबिध विकार।
सुची१ कौन बिधि होहिँगे, जस कुंजर बिधि व्यौहार ॥३॥
सतजुग सत त्रेता तप करते, द्वापर पूजा अचार।
तिहूँ जुगी तीनो दृष्टी, कलि केवल नाम अधार ॥४॥
रबि प्रकास रजन जथा, यौं गत दीसै संसार।
पारस मलि ताँबौ छिपा, कनक होत नहिँ बार३ ॥५॥
धन जोबन हरि ना मिलै, दुख दारुन अधिक अपार।
एकै एक बियोगियाँ, ता को जानै सब संसार ॥६॥
अनेक जतन करि टारिये, टारे न टरै भ्रम पास४।
प्रेम भगति नहिँ ऊपजै, ता ते जन रैदास उदास ॥७॥
( राग जगली गौडी )
॥ २८ ॥
पहिले पहरे रैन दे बनिजरिया५, तैँ जनम लिया संसार बे।
सेवा चूकी राम की, तेरी बालक बुद्धि गँवार बे ॥१॥
बालक बुद्धि न चेता तूँ, भूला मायाजाल बे।
कहा होइ पाछे पछिताये, जल पहिले न बाँधी पाल बे ॥२॥
१ पवित्र । (२) जैसे हाथी नहा कर फिर अपने ऊपर धूल डाल लेता है। ३ लोहा
पारस में लगाने से सोना हो जाता है, तांबा वार भर भी सोना नहीं होता। ४ फाँसी।
५ बनजारा, व्योपारी।

( १५ )
बीस बरस का भया अयाना, थाँभि न सका भाव बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, जनम लिया संसार बे ॥३॥
दूजे पहरे रैन दे बनिजरिया, तूँ निरखत चाल्यौ छाँह बे ।
हरि न दमोदर ध्याइया बनिजरिया, तैँ लेय ना सका नाँव बे ॥४॥
नाँव न लीया औगुन कीया, जस जोबन दै तान बे ।
अपनी पराई गिनी न काई१, मंद करम कमान२ बे ॥५॥
साहिब लेखा लेसी तूँ भरि देसी, भीर परै तुझ ताँह बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तूँ निरखत चाला छाँह बे ॥६॥
तीजे पहरे रैन दे बनिजरिया, तेरे ढिलड़े पड़े पिय प्रान बे ।
काया रविनि का करै बनिजरिया, घट भीतर बसे कुजान बे ॥७॥
एक बसै कायागढ़ भीतर, पहला जनम गँवाय बे ।
अबकी बेर न सुकिरित कीया, बहुरि न यह गढ़ पाय बे ॥८॥
कंपी देह कायागढ़ खाना, फिरि लागा पछितान बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तेरे ढिलड़े पड़े परान बे ॥६॥
चौथे पहरे रैन दे बनिजरिया, तेरी कंपन लागी देह बे ।
साहिब लेखा माँगिया बनिजरिया, तेरी छाड़ि पुरानी थेह३ बे ॥१०॥
छाड़ि पुरानी जिह अजाना, बालदि४ हाँकि सबेरियाँ बे ।
जम के आये बाँधि चलाये, बारी पूगी५ तेरियाँ बे ॥११॥
पंथ अकेला बराउ६ हेला, किस को देह सनेह बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तेरी कंपन लागी देह बे ॥१२॥
॥ २९ ॥
देवा हमन पास करंत अनंता,
पतितपावन तेरा बिरद क्यों कहंता ॥टेक॥
तोहिँ मोहिँ मोहिँ तोहिँ अंतर ऐसा ।
कनक कटक७ जल तरंग जैसा ॥१॥
१ कोई। २ कमाया। ३ सहारा। ४ बरधौ। ५ पारी पूरी हो गई। ६ बराओ,
चुनलो। ७ कड़ा।

( १६ )
मैं केई नर तुहिँ अंतरजामी ।
ठाकुर थैँ जन जानिये जन थैँ स्वामी ॥
तुम सबन में सब तुम माहीं ।
रैदास दास असमझि सी कहौँ कहाँ हीँ ॥३
॥ ३० ॥
या रामा एक तूँ दाना, तेरी आदि भेख ना ।
तूँ सुलतान सुलतानां, बंदा सकिसता१ अजाना ॥टेक
मैं बेदयानत न नजर दे, दरमंद२ बरखुरदार३ ।
बेअदब बदबखत बौरा, बेअकल बदकार ॥१॥
मैं गुनहगार गरीब गाफिल, कमदिला दिलतार४ ।
तूँ कादिर५ दरियावजिहावन६, मैं हिरसिया हुसियार ॥
यह तन हस्त खस्त खराब, खातिर अंदेसाबिसियार७ ।
रैदास दासहि बोलि८ साहिब, देहु अब दीदार ॥३॥
॥ ३१ ॥
अब हम खूब वतन घर पाया,
ऊँचा खेर९ सदा मेरे भाया ॥टेक॥
बोगमपूर सहर का नाम ।
फिकर अँदेस नहीं तेहि ग्राम ॥१॥
नहिँ जहाँ साँसत लानत मार ।
हैफ न खता न तरस जवाल ॥२॥
आव न जान रहम औजूद ।
जहाँ गनी१० आप बसै माबूद११ ॥३॥
जोई सैलि करै सोई भावै ।
महरम महल मेँ को अटकावै ॥४॥
१ टूटा हुआ, निर्बल । २ दरमांदा, आजिज । ३ अयाना । ४ सियाह दिल ।
५ समरथ । ६ भवसागर लँघाने या पार कराने वाला । ७ बहुत । ८ बुला कर ।
९ गाँव । १० बेपरवाह । ११ जिस की इबादत याने पूजा की जाय ।

कह रैदास खलास१ चमारा,
जो उस सहर सो मीत हमारा ॥५॥
( राग आसावरी )
॥ ३२ ॥
केसवे बिकट माया तोर, ताते बिकल गति मति मोर ॥टेक॥
सुविषंग सन कराल अहिमुख, ग्रसति सुटल सुभेष ।
निरखि माखी बकै ब्याकुल, लोभ कालर देख ॥१॥
इंद्रियादिक दुक्ख दारुन, असंख्यादिक पाप ।
तोहि भजन रघुनाथ अंतर, ताहि त्रास न ताप ॥२॥
प्रतिज्ञा प्रतिपाल प्रतिज्ञा चिन्ह, जुग भगति पूरन काम ।
आस तोर भरोस है, रैदास जै जै राम ॥३॥
॥ ३३ ॥
बरजि हो बरजिवी उतूले२ माया ।
जग खेयां महाप्रबल सबही बसं करिये,
सुर नर मुनि भरमाया ॥टेक॥
बालक बृद्ध तरुन अरु सुन्दर, नाना भेष बनावै ।
जोगी जती तपी सन्यासी, पंडित रहन न पावै ॥१॥
बाजीगर के बाजी कारन, सब को कौतिग३ आवै ।
जो देखै सो भूलि रहै, वा का चेला मरम जो पावै ॥२॥
षड ब्रह्मण्ड लोक सब जीते, येहि बिधि तेज जनावै ।
सब ही का चित चोर लिया है, वा के पीछे लागे धावै ॥३॥
इन बातन से पचि मरियत है, सब को कहै तुम्हारी ।
नेक अटक किन राखो कैसो, मेटो बिपति हमारी ॥४॥
कह रैदास उदास भयो मन, भाजि कहाँ अब जैये ।
इत उत तुम गोविन्द गोसाईं, तुमहीँ माहिँ समैये ॥५॥
१ खालिस । २ अतुल्य । ३ कौतुक ।
३

( १८ )
॥ ३४ ॥
राम मैँ पूजा कहा चढ़ाऊँ ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ ॥टेक॥
थनहर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ॥१॥
मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
बिष अमृत दोउ एकै संगा ॥२॥
मनही पूजा मनही धूप ।
मनही सेऊँ सहज सरूप ॥३॥
पूजा अरचा न जानूँ तेरी ।
कह रैदास कवन गति मेरी ॥४॥
॥ ३५ ॥
तुझ चरनारबिँद भँवर मन ।
पान करत मैँ पायो रामधन ॥टेक॥
संपति बिपति पटल माया घन ।
ता मैँ मगन होइ कैसे तेरो जन ॥१॥
कहा भयो जै गत तन छन छन,
प्रेम जाइ तौ डरै तेरो निज जन ॥२॥
प्रेमरजा१ लै राखो हृदै धरि,
कह रैदास छूटिबौ' कवन परि ॥३॥
॥ ३६ ॥
बंदे जानि साहिब गनी२ ।
समझि बेद कतेब बोलै काबे३ मैँ क्याँ मनी ॥टेक॥
स्याही सपेदी तुरँगी नाना रंग बिसाल बे ।
नापैद तैँ पैदा किया पैमाल करत न बार बे ॥१॥
१ आज्ञा वा प्रेम का रज अर्थात् धूर । २ बेपरवाह, धनी । ३ मुसलमानों का
तीरथ ।

( १९ )
ज्वानी जुमी१ जमाल सूरत देखिये थिर नाहिँ बे ।
दम छ सै सहस इकइस२ हर दिन खजाने थैँ जाहिँ बे ॥२॥
मनी मारे गर्व गाफिल बेमेहर बेपीर बे ।
दरी खाना३ पड़े चोबा४ होइ नहीँ तकसीर बे ॥३॥
कुछ गाँठि खरची मिहर तोसा, खैर खूबीहा थीर बे ।
तजि बदवा५ बेनजर कमदिल, करि खसम कान बे ।
रैदास की अरदास सुनि, कछु हक हलाल पिछान बे ॥४॥
॥ ३७ ॥
सुकछु बिचार्यो तातैं मेरो मन थिर ह्वै गयो ।
हारे रंग लाग्यो तब बरन पलटि भयो ॥टेक॥
जिन यह पंथी पंथ चलावा ।
अगम गवन मेँ गम दिखलावा ॥१॥
अबरन बरन कहै जनि कोई ।
घट घट व्यापि रह्यो हरि सोई ॥
जेइ पद सुन नर प्रेम पियासा ।
सो पद रमिरह्यो जन रैदासा ॥२॥
॥ ३८ ॥
माधो संगत सरति६ तुमारी, जगजीवन किसन मुरारी ॥टेक॥
तुम मखतूल७ चतुरभुज, मैं बपुरो जस कीरा ।
पीवत डाल फूल फल अमृत, सहज भई मति हीरा ॥१॥
तुम चंदन हम अरँड बापुरो, निकट तुम्हारी बासा ।
नीच बिरिछ ते ऊँच भये हैं, तेरी बास सुबासन बासा ॥२॥
१ जोश । २ इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास दिन रात में चलते हैं । ३ दरगाह ।
४ छड़ी की मार । ५ ठग । ६ मानी है । ७ श्रेष्ठ ।

( २० )
जाति भी ओछी जनम भी ओछा, ओछा करम हमारा ।
हम रैदास रामराई को, कह रैदास विचारा ॥३॥
॥ ३९ ॥
माधो अविद्या हित कीन्ह,
तां ते मैं तोर नाम न लीन्ह ॥टेक॥
मृग मीन भृंग पतंग कुंजर, एक दोस विनास ।
पंच व्याधि असाधि यह तन, कौन ता की आस१ ॥१॥
जल थल जीव जहाँ तहाँ लौं, करम न या सन जाई ।
मोह पासी२ अबंध बंध्यो, करिये कौन उपाई ॥२॥
त्रिगुन जोनि अचेत भ्रम भरमे, पाप पुन्न न सोच ।
मानुखा औतार दुरलभ, तहूँ संकट पोच ॥३॥
रैदास उदास मन भौ, जप न तप गुन ज्ञान ।
भगत जन भवहरन कहिये, ऐसे परमनिधान ॥४॥
॥ ४० ॥
देहु कलाली एक पियाला, ऐसा अबधू है मतवाला ॥टेक॥
हे रे कलाली तैं क्या किया, सिरका सा तैं प्याला दिया ॥१॥
कहै कलाली प्याला देउँ, पीवनहारे का सिर लेउँ ॥२॥
चंद सूर दोउ सनमुख होई, पीवै प्याला मरै न कोई ॥३॥
सहज सुन्न मेँ भाठी संरवे, पावै रैदास गुरुमुख दरवे ॥४॥
॥ ४१ ॥
भाई रे सहज बंदो लोई, बिन सहज सिद्धि न होई ।
लौलीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होई ॥टेक॥
आपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस ।
कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देस ॥१॥
१ हिरन, मछली, भौंरा, पतगा, हाथो, इन का एक एक इंद्री के बेग से न
होता है तो तन जोकि पाँचों इंद्रियों के वशीभूत है उसका क्या ठिकाना ? २ फाँसी

( २१ )
कहिये तो कहिये काहि कहिये, कहाँ कौन पतियाइ ।
रैदास दास अजान है करि, रह्यो सहज समाइ ॥२॥
( राग सोरठ )
॥ ४२ ॥
ऐसी मेरी जाति बिख्यात चमारं ।
हृदय राम गोबिँद गुनसारं ॥टेक॥
सुरसरि जल कृत बारुनी रे१,
जेहि संत जन नहिँ करत पानं ।
सुरा अपवित्र तिनि गंगजल आनिये,
सुरसरि मिलत नहिँ होत आनं२ ॥१॥
ततकरा३ अपबित्र कर मानिये,
जैसे कागदगर४ करत बिचारं ।
भगवत भगवंत जब ऊपरे लेखिये,
तब पूजिये करि नमस्कारं ॥२॥
अनेक अधम जिव नाम गुन ऊधरे,
पतित पावन भये परसि सारं ।
भनत रैदास ररंकार गुन गावते,
संत साधू भये सहज पारं ॥३॥
॥ ४३ ॥
पार गया चाहै सब कोई,
रहि उर वार पार नहिँ होई ॥टेक॥
पार कहै उर वार से पारा ।
बिन पद परचे भ्रमै गँवारा ॥१॥

१ गंगाजल से जो शराब बनाई जाय तौ भी उसे साधु लोग नहीं पीयेंगे।
२ अगर वही शराब गंगा मे डाल दी जाय तो वह गंगाजल हो जाती है।
३ तत्काल । ४ लेखक ।

( २२ )
पार परम पद मंझ मुरारी ।
ता में आप रमै बनवारी ॥२॥
पूरन ब्रह्म बसै सब ठाईँ ।
कह रैदास मिले सुख साईँ ॥३॥
॥ ४४ ॥
बापुरो सत रैदास कहै रे ।
ज्ञान बिचार चरन चित लावै, हरि की सरनि रहै रे ॥टेक॥
पाती तोड़े पूजि रचावै, तारन तरन कहै रे ।
मूरति काहिँ बसै परमेसुर, तौ पानी माहिँ तिरै रे ॥१॥
त्रिबिध संसार कौन बिधि तिरबौ, जे दृढ़ नाव न गहे रे ।
नाव छाड़ि दे डूंगे१ बसे, तौ दूना दुःख सहे रे ॥२॥
गुरू को सबद अरु सुरति कुदाली, खोदत कोई रहै रे ।
राम कहहु कै न बाढ़ै आपो, सोने कूल बहै रे ॥३॥
झूठी माया जग डहकाया, तौ तिन२ ताप दहै रे ।
कह रैदास राम जेपि रसना, काहु के सँग न रहै रे ॥४॥
॥ ४५ ॥
यह अँदेस सोच जिय मेरे । निसिबासर गुन गाऊँ तेरे ॥टेक॥
तुम चिंतत मेरी चिंतहु जाई । तुम चिंतामनि हौ इक नाईँ ॥१॥
भगति हेत का का नहिँ कीन्हा । हमरी बेर भये बलहीना ॥२॥
कह रैदास दास अपराधी । जेहि तुम द्रवो सो भगति न साधी ॥३॥
॥ ४६ ॥
रामराय का कहिये यह ऐसी, जन की जानत हौ जैसी तैसी ॥टेक॥
मीन पकरि काट्यो अरु फाट्यो, बाँटि कियो बहु घानी ।
खंड खंड करि भोजन कीन्हो, तहउँ न बिसरचो पानी ॥१॥
तैँ हमैँ बाँधे मोह फाँसी से, हम तोको प्रेम जेवरिया बाँधे ।
अपने छुटन कै जतन करते हाँ, हम छूटे तोको आराधै ॥२॥
१ डोंगी। २ तीन।

( २३ )

कह रैदास भगति इक बाढ़ी, अब का की डर डरिये ।
जो डर को हम तुम को सेवौँ, सो दुख अजहूँ मरिये ॥३॥
॥ ४७ ॥
रे मन माछला संसार समुदे, तूँ चित्र बिचित्र बिचारि रे ।
जेहि गाले गलिये ही मरिये, सो सँग दूरि निवारि रे ॥टेक॥
जम छै डिगन¹ डोरि लै कंकन, पर तिया² लागो जानि रे ।
होइ रस लुबुध³ रमै यौं मूरख, मन पछितावै अजान रे ॥१॥
पाप गुलीचा⁴ धरम निबोली⁵ देखि देखि फल चीख रे ।
परतिरिया सँग भलो जौँ होवै, तौ राजा रावन देख रे ॥२॥
कह रैदास रतनफल कारन, गोबिंद का गुन गाइ रे ।
काँचे कुंभ भरो जल जैसे, दिन दिन घटतौ जाइ रे ॥३॥
॥ ४८ ॥
रे चित चेत अचेत काहे, बालक को देख रे ।
जाति ते कोई पद नहिँ पहुँचा, रामभगति बिसेख रे ॥टेक॥
खटकर्म सहित जे बिप्र होते, हरिभगति चित दृढ़ नाहिँ रे ।
हरि की कथा सुहाय नाहीं, सुपच तूलै ताहि रे⁶ ॥१॥
मित्र शत्रु अजात सब ते, अंतर लावै हेत रे ।
लाग वाँकी कहाँ जानै तीन लोक पवेत रे ॥२॥
अजामिल गज गनिका तारी, काटी कुंजर की पास रे ।
ऐसे दुरमत मुक्त कीये, तो क्यों न तरै रैदास रे ॥३॥
॥ ४९ ॥
रथ को चतुर चलावन हारो ।
खिन हाँकै खिन उभटै⁷ राखै, नहीँ आन कौ सारो ॥टेक॥
जब रथ थकै सारथी थाकै, तब को रथहि चलावै ।
नाद बिंद ये सबही थाके, मन मंगल नहिँ गावै ॥१॥


१ बंसी लगाने वाला, मछली मारने वाला। २ पराई स्त्री। ३ लुभाय कर। ४ एक
मीठे फल का नाम। ५ नीम का फल, जो कड़वा होता है। ६ वह डोम के तुल्य है।
७ डगरी लीक पर।

द्वितीय भाग: रागबद्ध पद संग्रह (बेगमपुरा एवं पद उपसंहार)

( २४ )
पाँच तत्त को यह रथ साज्यो, अरधै उरध निवासा ।
चरन कमल लव लाइ रह्यो है, गुन गावै रैदासा ॥२॥
॥ ५० ॥
जो तुम तोरो राम मैँ नहिँ तोरौँ ।
तुम से तोरि कवन से जोरौँ ॥टेक॥
तीरथ बरत न करौँ अँदेसा ।
तुम्हरे चरन कमलँ क भरोसा ॥१॥
जहँ जहँ जाऔँ तुम्हरी पूजा ।
तुम सा देव और नहिँ दूजा ॥२॥
मैँ अपनो मन हरि से जोरयौँ ।
हरि से जोरि सबन से तोरयौँ ॥३॥
सबही पहर तुम्हारी आसा ।
मन क्रम बचन कहै रैदासा ॥४॥
॥ ५१ ॥
केहि बिधि अब सुमिरौँ रे, अति दुर्लभ दीनदयाल ।
मैँ महा बिषई अधिक आतुर, कामना की झाल ॥टेक॥
कहा बाहर डिंभ कीये, हरि कनक कसौटीहार ।
बाहर भीतर साखि तूँ, म कियौ ससौ* अँधियार ॥१॥
कहा भयो बहु पाखंड कीये, हरि हृदय सपने न जान ।
जो दारा बिभिचारिनी, मुख पतिब्रत जिय आन ॥२॥
मैँ हृदय हारि बैठ्यौँ हरी, मो पै सरयो न एको काज ।
भाव भगति रैदास दे, प्रतिपाल करि मोहिँ आज ॥३॥
॥ ५२ ॥
माधवे नो कहियत भ्रम ऐसा । तुम कहियत होहु न जैसा ॥टेक॥
नरपति एक सेज सुख सूता, सपने भयो भिखारी ।
आछत राज बहुत दुख पायो, सो गति भई हमारी ॥१॥
✲ चंद्रमा ।

जब हम हुते तबै तुम नाहीं, अब तुम हौ हम नाहीं।
सरिता¹ गवन कियो लहर महोदधि², जल केवल जल माहीं॥२॥
रजु भुअंग रजनी परगासा³, अस कछु भरम जनावा।
समुझि परी मोहिँ कनक अलंकृत⁴, अब कछु कहत न आवा॥३॥
करता एक जाय जग भुगता, सब घट सब बिधि सोई।
कह रैदास भगति एक उपजी, सहजै होइ सो होई ॥४॥
॥ ५३ ॥
माधो भरम कैसेहुं न बिलाई। ताते द्वैत दरसै आई ॥टेक॥
कनक कुंडल सूत पट जुदा, रजु भुअंग भ्रम जैसा।
जल तरंग पाहन प्रतिमा ज्योँ, ब्रह्म जीव द्वति ऐसा ॥१॥
बिमल एक रस उपजै न बिनसै, उदय अस्त दोउ नाहीं।
बिगता बिगत घटै नहिँ कबहुँ, बसत बसै सब माहीं ॥२॥
निश्चल निराकार अज अनुपम, निरभय गति गोबिन्दा।
अगम अगोचर अच्छर अतरक⁵, निरगुन अंत अनंदा ॥३॥
सदा अतीत ज्ञान घन बर्जित, निरबिकार अबिनासी।
कह रैदास सहज सुन्न सत, जिवनमुक्त निधि⁶ कोसी ॥४॥
॥ ५४ ॥
मन मेरो सत्त सरूप विचारं।
आदि अंत अनंत परम पद, संसा सकल निवारं ॥टेक॥
जस हरि कहिये तस हरि नाहीं, है अस जस कछु तैसा।
जानत जानत जान रह्यो सब, मरम कहौ निज कैसा ॥१॥
करत आन अनुभवत आन, रस मिलै न बेगर⁷ होई।
बाहर भीतर प्रगट गुप्त, घट घट प्रति और न कोई ॥२॥
आदिहु एक अंत पुनि सोई, मध्य उपाइ जु कैसे।
अहै एक पै भ्रम से दूजो, कनक अलंकृत जैसे ॥३॥
१ नदी। २ समुद्र। ३ रात को रस्सी देख कर सांप का धोखा हुआ। ४ गहना।
५ तर्क से रहित। ६ खजाना। ७ बिगाड़।
४

( २६ )
कह रैदास प्रकास परम पद, का जप तप बिधि पूजा ।
एक अनेक अनेक एक हरि, कहौँ कौन बिधि दूजा ॥४॥
॥ ५५ ॥
थोथो जानि पछोरी रे कोई ।
जोइ रे पछोरो जा मेँ निज कन होई ॥टेक॥
थोथी काया थोथी माया ।
थोथा हरि बिन जनम गँवाया ॥ १ ॥
थोथा पंडित थोथी बानी ।
थोथी हरि बिन सबै कहानी ॥ २ ॥
थोथा मंदिर भोग बिलासा ।
थोथी आन देव की आसा ॥ ३ ॥
साचा सुमिरन नाम बिसासा¹ ।
मन बच कर्म कहै रैदासा ॥ ४ ॥
---०---
( राग भैरो )
॥ ५६ ॥
ऐसा ध्यान धरौँ बरो बनवारी,
मन पवन दै सुखमन नारी ॥टेक॥
सो जप जपौँ जो बहुर न जपना ।
सो तप तपौँ जो बहुरि न तपना ॥ १ ॥
सो गुरु करौँ जो बहुरि न करना ।
ऐसा मरौँ जो बहुरि न मरना ॥ २ ॥
उलटी गंग जमुन मेँ लावैँ ।
बिनही जल मंजन द्वै पावौँ ॥ ३ ॥
लोचन भरि भरि बिंब निहारौँ ।
जोति बिचारि न और बिचारौँ ॥ ४ ॥
१ बिस्वास ।

पेंड परे जिव जिस घर जाता ।
सबद अतीत अनाहद राता ॥५॥
ता पर कृपा सोई भल जानै ।
गूँगो साकर¹ कहा बखानै ॥६॥
सुन्न मँडल में मेरा बासा ।
ता ते जिव में रहौँ उदासा ॥७॥
कह रैदास निरंजन ध्यावौँ ।
जिस घर जावँ सो बहुरि न आवौँ ॥८॥
॥ ५७ ॥
अबिगति नाथ निरंजन देवा ।
मैं क्या जानूँ तुम्हरी सेवा ॥टेक॥
बाँधूँ न बंधन छाऊँ न छाया ।
तुमहीं सेऊँ निरंजन राया ॥१॥
चरन पताल सीस असमाना ।
सो ठाकुर कैसे सँपुट² समाना ॥२॥
सिव सनकादिक अंत न पाये ।
ब्रह्मा खोजत जनम गँवाये ॥३॥
तोडूँ न पाती पूजूँ न देवा ।
सहज समाधि करूँ हरि सेवा ॥४॥
नख प्रसाद जाके सुरसरि³ धारा ।
रोमावली अठारह भारा⁴ ॥५॥
चारो बेद जाके सुमिरत साँसा ।
भगति हेत गावै रैदासा ॥६॥
१ शकर, चीनी। २ डब्बा। ३ कथा है कि भगीरथ की तपस्या से विष्णु के
' से साठ हजार सगर के लड़कों के तारने के लिये गंगा पृथ्वी पर आईं ।
ठारह लोक ।

( २५ )
॥ ५८ ॥
भेष लियो पै भेद न जान्यो ।
अमृत लेइ बिखै सों मान्यो ॥टेक॥
काम क्रोध में जनम गँवायो ।
साधु संगति मिलि राम न गायो ॥१॥
तिलक दियो पै तपनि न जाई ।
माला पहिरे घनेरी लाई ॥२॥
कह रैदास मरम जो पाऊँ ।
देव निरंजन सत कर ध्याऊँ ॥३॥
(राग बिलावल)
॥ ५९ ॥
का तूँ सोवै जाग दिवाना ।
झूठी जिउन¹ सत्त करि जाना ॥टेक
जिन जनम दिया सो रिजक² उमड़ा³
घट घट भीतर रहट चलावै ।
करि बंदगी छोड़ि मैं मेरा,
हृदय करीम सँभारि सबेरा ।