सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 52 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 16

( ९ )
हरिजन हरिहि और ना जाने, तजै आन तन त्यागी।
कह रैदास सोई जन निर्मल, निसि दिन जो अनुरागी ॥३॥
॥ १६ ॥
भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आइ भगति तब गई बड़ाई ॥टेक॥
कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे।
कहा भयो जे चरन पखारे, जौँ लौँ तत्त्व न चीन्हे ॥१॥
कहा भयो जे मूँड़ मुड़ायो, कहा तीर्थ ब्रत कीन्हे।
स्वामी दास भगत अरु सेवक, परम तत्त्व नहिँ चीन्हे ॥२॥
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक१ ह्वै चुनि खावै ॥३॥
॥ १७ ॥
अब कछु मरम बिचारा हो हरि।
आदि अंत औसान राम बिन, कोइ न करै निवारा हो हरि ॥टेक॥
जब मैँ पंक पंक२ अमृत जल, जलहि सुद्ध होइ जैसे।
ऐसे करम भरम जग बाँध्यो, छूटै तुम बिन कैसे हो हरि ॥१॥
जप तप बिधी निषेध नाम करूँ, पाप पुन्न दोउ माया।
ऐसे मोहिँ तन मन गति बीमुख जनम जनम डँहकाया३ हो हरि ॥२॥
ताड़न४ छेदन५ त्रायन६ खेदन७, बहु बिधि कर ले उपाई।
लोनखड़ी८ संजोग बिना जस, कनक कलंक न जाई हो हरी ॥३॥
भन रैदास कठिन कलि के बल, कहा उपाय अब कीजै।
भव बूड़त भयभीत जगत जन, करि अवलंबन९ दीजै हो हरी ॥४॥
॥ १८ ॥
नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना हो।
दीनानाथ दयाल नरहरे ॥ टेक ॥
जनमेउँ तौही ते बिगरान। अहो कछु बूझै बहुरि सयान ॥१॥
१ पिपीलिका—चींटी। २ कीचड़। ३ ठगाया। ४ मारना। ५ काटना। ६ रक्षा करना।
७ शोक करना, त्याग करना। ८ नौसादर। ९ सहारा।
२