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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( १२ )
हरहु बिपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अलंबन ।
बेगि मिलौ जीन करौ विलंबन ॥३॥
॥ २३ ॥
तेरा जन काहे को बोलै ।
बोलि बोलि अपनी भगति को खोलै ॥टेक॥
बोलत बोलत बढ़ै वियाधी, बोल अबोलै जाई ।
बोलै बोल अबोल कोप करै, बोल बोल को खाई ॥१॥
बोलै ज्ञान मान परि बोलै, बोलै वेद बड़ाई ।
उर मेँ धरि धरि जब ही बोलै, तब ही मूल गँवाई ॥२॥
बोलि बोलि औरहि समझावै, तब लगि समझ न भाई ।
बोलि बोलि समझी जब बूझी, काल सहित सब खाई ॥३॥
बोलै गुरु अरु बोलै चेला, बोल बोल की परतीति आई ।
कह रैदास मगन भयो जबही, तबहि परमनिधि पाई ॥४॥
॥ २४ ॥
ऐसी भगति न होइ रे भाई ।
राम नाम बिन जो कछु करिये, सो सब भरम कहाई ॥टेक॥
भगति न रस दान भगति न कथै ज्ञान ।
भगति न बन मेँ गुफा खुदाई ॥१॥
भगति न ऐसी हाँसी भगति न आसापासी ।
भगति न यह सब कुल कान गँवाई ॥२॥
भगति न इंद्री बाँधा भगति न जोग साधा ।
भगति न अहार घटाई ये सब करम कहाई ॥३॥
भगति न इंद्री साधे भगति न बैराग बाँधे ।
भगति न ये सब वेद बड़ाई ॥४॥