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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 32

जब हम हुते तबै तुम नाहीं, अब तुम हौ हम नाहीं।
सरिता¹ गवन कियो लहर महोदधि², जल केवल जल माहीं॥२॥
रजु भुअंग रजनी परगासा³, अस कछु भरम जनावा।
समुझि परी मोहिँ कनक अलंकृत⁴, अब कछु कहत न आवा॥३॥
करता एक जाय जग भुगता, सब घट सब बिधि सोई।
कह रैदास भगति एक उपजी, सहजै होइ सो होई ॥४॥
॥ ५३ ॥
माधो भरम कैसेहुं न बिलाई। ताते द्वैत दरसै आई ॥टेक॥
कनक कुंडल सूत पट जुदा, रजु भुअंग भ्रम जैसा।
जल तरंग पाहन प्रतिमा ज्योँ, ब्रह्म जीव द्वति ऐसा ॥१॥
बिमल एक रस उपजै न बिनसै, उदय अस्त दोउ नाहीं।
बिगता बिगत घटै नहिँ कबहुँ, बसत बसै सब माहीं ॥२॥
निश्चल निराकार अज अनुपम, निरभय गति गोबिन्दा।
अगम अगोचर अच्छर अतरक⁵, निरगुन अंत अनंदा ॥३॥
सदा अतीत ज्ञान घन बर्जित, निरबिकार अबिनासी।
कह रैदास सहज सुन्न सत, जिवनमुक्त निधि⁶ कोसी ॥४॥
॥ ५४ ॥
मन मेरो सत्त सरूप विचारं।
आदि अंत अनंत परम पद, संसा सकल निवारं ॥टेक॥
जस हरि कहिये तस हरि नाहीं, है अस जस कछु तैसा।
जानत जानत जान रह्यो सब, मरम कहौ निज कैसा ॥१॥
करत आन अनुभवत आन, रस मिलै न बेगर⁷ होई।
बाहर भीतर प्रगट गुप्त, घट घट प्रति और न कोई ॥२॥
आदिहु एक अंत पुनि सोई, मध्य उपाइ जु कैसे।
अहै एक पै भ्रम से दूजो, कनक अलंकृत जैसे ॥३॥
१ नदी। २ समुद्र। ३ रात को रस्सी देख कर सांप का धोखा हुआ। ४ गहना।
५ तर्क से रहित। ६ खजाना। ७ बिगाड़।
४