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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

पेंड परे जिव जिस घर जाता ।
सबद अतीत अनाहद राता ॥५॥
ता पर कृपा सोई भल जानै ।
गूँगो साकर¹ कहा बखानै ॥६॥
सुन्न मँडल में मेरा बासा ।
ता ते जिव में रहौँ उदासा ॥७॥
कह रैदास निरंजन ध्यावौँ ।
जिस घर जावँ सो बहुरि न आवौँ ॥८॥
॥ ५७ ॥
अबिगति नाथ निरंजन देवा ।
मैं क्या जानूँ तुम्हरी सेवा ॥टेक॥
बाँधूँ न बंधन छाऊँ न छाया ।
तुमहीं सेऊँ निरंजन राया ॥१॥
चरन पताल सीस असमाना ।
सो ठाकुर कैसे सँपुट² समाना ॥२॥
सिव सनकादिक अंत न पाये ।
ब्रह्मा खोजत जनम गँवाये ॥३॥
तोडूँ न पाती पूजूँ न देवा ।
सहज समाधि करूँ हरि सेवा ॥४॥
नख प्रसाद जाके सुरसरि³ धारा ।
रोमावली अठारह भारा⁴ ॥५॥
चारो बेद जाके सुमिरत साँसा ।
भगति हेत गावै रैदासा ॥६॥
१ शकर, चीनी। २ डब्बा। ३ कथा है कि भगीरथ की तपस्या से विष्णु के
' से साठ हजार सगर के लड़कों के तारने के लिये गंगा पृथ्वी पर आईं ।
ठारह लोक ।