रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगति न मूड़ मुड़ाये भगति न माला दिखाये ।
भगति न चरन धुवाये ये सब गुनी जन कहाई ॥५॥
भगति न तौ लौं जाना आप को आप बखाना ।
जोइ जोइ करै सो सो करम बड़ाई ॥६॥
आपो गयो तब भगति पाई ऐसी भगति भाई ।
राम मिल्यो आपो गुन खोयो रिधि सिधि सबै गँवाई ॥७॥
कह रैदास छूटी आस सब तब हरि ताही के पास ।
आत्मा थिर भई तब सबही निधि पाई ॥८॥
॥ २५ ॥
है सब आतम सुख परकास साँचो ।
निरंतर निराहार कलपित ये पाँचो ॥टेक॥
आदि मध्य औसान१ एक रस, तार बन्यो हो भाई ।
थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रह्यो हरिराई ॥१॥
सर्बेस्वर सर्वांगी सब गति, करता हरता सोई ।
सिव न असिव न साध अस सेवक, उनै भाव नहिँ होई ॥२॥
धरम अधरम मोच्छ नहिँ बंधन, जरा मरन भव नासा ।
दृष्टि अदृष्टि गेय२ अरु ज्ञाना, एकमेक रैदासा ॥३॥
(राग गौरी)
॥ २६ ॥
कोई सुमार३ न देखूँ ये सब उपल४ चोभा ।
जा को जेता प्रकास ता को तेति ही सोभा ॥टेक॥
हम हिये सीखि सीखै हम हिये माड़े ।
थोरे ही इतराइ चलै पतिसाही५ छाड़े ॥१॥
अतिही आतुर वह काची ही तोरे ।
बूड़े जल पैसे६ नहिँ पड़ै रे खोरे ॥२॥
१ अंत । २ जानने योग्य । ३ गिनती । ४ पत्थर । ५ बादशाही । ६ पैठे ।