रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४ )
थोरे थोरे मुसियत परायो धना।
कह रैदास सुन संत जना ॥३॥
॥ २७ ॥
मरम कैसे पाइब रे।
पंडित कौन कहै समुझाई, जा ते मेरो आवा गमन बिलाई ॥टेक॥
बहु बिधि धरम निरूपिये, करते देखै सब कोई।
जेहि धरमे भ्रम छूटिहै, सो धरम न चीन्हे कोई ॥१॥
करम अकरम बिचारिये, सुनि सुनि वेद पुरान।
संसा सदा हिरदै बसै, हरि बिन कौन हरै अभिमान ॥२॥
बाहर मूँदि के खोजिये, घट भीतर बिबिध विकार।
सुची१ कौन बिधि होहिँगे, जस कुंजर बिधि व्यौहार ॥३॥
सतजुग सत त्रेता तप करते, द्वापर पूजा अचार।
तिहूँ जुगी तीनो दृष्टी, कलि केवल नाम अधार ॥४॥
रबि प्रकास रजन जथा, यौं गत दीसै संसार।
पारस मलि ताँबौ छिपा, कनक होत नहिँ बार३ ॥५॥
धन जोबन हरि ना मिलै, दुख दारुन अधिक अपार।
एकै एक बियोगियाँ, ता को जानै सब संसार ॥६॥
अनेक जतन करि टारिये, टारे न टरै भ्रम पास४।
प्रेम भगति नहिँ ऊपजै, ता ते जन रैदास उदास ॥७॥
( राग जगली गौडी )
॥ २८ ॥
पहिले पहरे रैन दे बनिजरिया५, तैँ जनम लिया संसार बे।
सेवा चूकी राम की, तेरी बालक बुद्धि गँवार बे ॥१॥
बालक बुद्धि न चेता तूँ, भूला मायाजाल बे।
कहा होइ पाछे पछिताये, जल पहिले न बाँधी पाल बे ॥२॥
१ पवित्र । (२) जैसे हाथी नहा कर फिर अपने ऊपर धूल डाल लेता है। ३ लोहा
पारस में लगाने से सोना हो जाता है, तांबा वार भर भी सोना नहीं होता। ४ फाँसी।
५ बनजारा, व्योपारी।