रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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पाँच तत्त को यह रथ साज्यो, अरधै उरध निवासा ।
चरन कमल लव लाइ रह्यो है, गुन गावै रैदासा ॥२॥
॥ ५० ॥
जो तुम तोरो राम मैँ नहिँ तोरौँ ।
तुम से तोरि कवन से जोरौँ ॥टेक॥
तीरथ बरत न करौँ अँदेसा ।
तुम्हरे चरन कमलँ क भरोसा ॥१॥
जहँ जहँ जाऔँ तुम्हरी पूजा ।
तुम सा देव और नहिँ दूजा ॥२॥
मैँ अपनो मन हरि से जोरयौँ ।
हरि से जोरि सबन से तोरयौँ ॥३॥
सबही पहर तुम्हारी आसा ।
मन क्रम बचन कहै रैदासा ॥४॥
॥ ५१ ॥
केहि बिधि अब सुमिरौँ रे, अति दुर्लभ दीनदयाल ।
मैँ महा बिषई अधिक आतुर, कामना की झाल ॥टेक॥
कहा बाहर डिंभ कीये, हरि कनक कसौटीहार ।
बाहर भीतर साखि तूँ, म कियौ ससौ* अँधियार ॥१॥
कहा भयो बहु पाखंड कीये, हरि हृदय सपने न जान ।
जो दारा बिभिचारिनी, मुख पतिब्रत जिय आन ॥२॥
मैँ हृदय हारि बैठ्यौँ हरी, मो पै सरयो न एको काज ।
भाव भगति रैदास दे, प्रतिपाल करि मोहिँ आज ॥३॥
॥ ५२ ॥
माधवे नो कहियत भ्रम ऐसा । तुम कहियत होहु न जैसा ॥टेक॥
नरपति एक सेज सुख सूता, सपने भयो भिखारी ।
आछत राज बहुत दुख पायो, सो गति भई हमारी ॥१॥
✲ चंद्रमा ।