रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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जाति भी ओछी जनम भी ओछा, ओछा करम हमारा ।
हम रैदास रामराई को, कह रैदास विचारा ॥३॥
॥ ३९ ॥
माधो अविद्या हित कीन्ह,
तां ते मैं तोर नाम न लीन्ह ॥टेक॥
मृग मीन भृंग पतंग कुंजर, एक दोस विनास ।
पंच व्याधि असाधि यह तन, कौन ता की आस१ ॥१॥
जल थल जीव जहाँ तहाँ लौं, करम न या सन जाई ।
मोह पासी२ अबंध बंध्यो, करिये कौन उपाई ॥२॥
त्रिगुन जोनि अचेत भ्रम भरमे, पाप पुन्न न सोच ।
मानुखा औतार दुरलभ, तहूँ संकट पोच ॥३॥
रैदास उदास मन भौ, जप न तप गुन ज्ञान ।
भगत जन भवहरन कहिये, ऐसे परमनिधान ॥४॥
॥ ४० ॥
देहु कलाली एक पियाला, ऐसा अबधू है मतवाला ॥टेक॥
हे रे कलाली तैं क्या किया, सिरका सा तैं प्याला दिया ॥१॥
कहै कलाली प्याला देउँ, पीवनहारे का सिर लेउँ ॥२॥
चंद सूर दोउ सनमुख होई, पीवै प्याला मरै न कोई ॥३॥
सहज सुन्न मेँ भाठी संरवे, पावै रैदास गुरुमुख दरवे ॥४॥
॥ ४१ ॥
भाई रे सहज बंदो लोई, बिन सहज सिद्धि न होई ।
लौलीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होई ॥टेक॥
आपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस ।
कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देस ॥१॥
१ हिरन, मछली, भौंरा, पतगा, हाथो, इन का एक एक इंद्री के बेग से न
होता है तो तन जोकि पाँचों इंद्रियों के वशीभूत है उसका क्या ठिकाना ? २ फाँसी