परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः २५
मपञ्चकालाभे मुख्यं नास्तीति न कर्मलोपः। किन्तु प्रतिनिधिनाऽपि
नित्यक्रमो नित्यपूजा तस्याः प्रत्यवमृष्टिः अनुष्ठानं कर्त्तव्यमिति शेषः। तेन
नित्यपूजायां विशेषद्रव्यालाभेऽपि प्रतिनिधिना निर्वाहः सूचित इति नित्य-
पूजायामेवाभ्यनुज्ञा, नान्यत्रेति।।२४।।
मपञ्चक द्रव्यों की अप्राप्ति होने पर मुख्य द्रव्य नहीं है, यह सोच कर
कर्म में अवरोध नहीं आने देना चाहिये। प्रतिनिधि द्रव्य से भी नित्यपूजा का
क्रम पूरा करना कर्म का अनुष्ठान ही होता है। इसलिये यह सिद्धान्त रूप से
मान्य है कि, विशेष द्रव्य के न रहने पर भी प्रतिनिधि द्रव्य से निर्वाह करना
आवश्यक है। यह अभ्यनुज्ञा नित्यकर्म के लिये है। किसी अन्य काम्य या
नैमित्तिक के लिये नहीं।।२४।।
द्वादशं गुणमाह
निर्भयता सर्वत्र ।।२५।।
सर्वत्र सर्वतः मपञ्चकस्वीकारे कौलमार्गावलम्बनेन नरकादि-
प्रतिपादकानि यानि शास्त्राणि तेभ्यः सर्वेभ्यो निर्गतं भयं यस्मात् स निर्भयः,
तस्य भावस्तत्ता सम्पादनीयेति शेषः। तानि सर्वाणि शास्त्राणि रागिणं
भीषयन्ति कामं भीषयन्तु, अहं तु न रागी किन्तु शास्त्रेण प्रवर्तितेन न मे
भीतिरिति निर्धारणेन निर्भयता सम्पादनीयेति भावः।।२५।।
मपञ्चक से सर्वत्र पूजा को कौलमार्ग अङ्गीकार करता है। कौल शास्त्र
यह प्रतिपादित करते हैं कि, इनसे निरय (नरक) आदि की सम्भावना नहीं होती।
इससे उपासक निर्भय हो जाता है। भय तो रागी व्यक्तियों को होता है।
श्रीविद्योपासक रागी नहीं होता। अतः इसे निर्भय रहना चाहिये।।२५।।
सकलसिद्धान्तसारभूतं धर्ममाह
सर्वं वेद्यं हव्यम्, इन्द्रियाणि स्रुचः शक्तयो ज्वालाः स्वात्मा
शिवः पावकः स्वयमेव होता।।२६।।
इति भावयेदिति शेषः। अन्तःकरणवृत्तिभिरिति वेद्यमित्यस्यादौ पूरणीयम्।
अन्तःकरणवृत्तिवेद्यं सर्वं हविष्ट्वेन भावयेत्। यथा अग्नौ प्रक्षिप्तं हविस्तदाकारं