परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ परशुरामकल्पसूत्रम्
भवति एवं वृत्तिवेद्यानां सर्वेषां शिवरूपेऽग्नौ होमे सति शिवाकारसम्पत्तेस्तेषु
हविष्ट्वेन भावनं युक्तम्।
तादृशहविष आधारभूतहोमसाधनीभूत-जुहूरेव स्रुक्पदेन गृह्यते, न
स्रुवादयः, तेषां स्रुक्पदवाच्यत्वेऽपि होमसाधनत्वाभावेन होमभावनाप्रकरणे
स्रुवादीनामयोग्यत्वात्।।२६।।
यह सारा विश्व ही वेद्य है। वेद्यवस्तु का ज्ञान अन्तःकरण की वृत्तियों
से होता है। इसलिये यह कहा जा सकता है कि, अन्तःकरण की वृत्तियों द्वारा
सारा वेद्यमात्र आध्यात्मिक यज्ञ में अर्पित करने योग्य हवनीय द्रव्य है। सारी
इन्द्रियाँ स्रुक् हैं। हविष्य के आधारभूत होम में साधन रूप से प्रयुक्त मुख्य पात्र
स्रुक् होता है। स्रुवा आदि नहीं। स्रुवा होम का साधन नहीं होता। होम भावना
के सन्दर्भ में स्रुवा स्रुक् के समक्ष कोई महत्त्व नहीं रखता। शक्तियाँ ज्वाला
हैं। स्वात्मा शिव ही पावक है। और उपासक स्वयं होता माना जाता है। जैसे
अग्नि में अर्पित हविष्य अग्निसात् होकर अग्निरूप में परिवर्त्तित हो जाता है।
इसी तरह वृत्तिवेद्य सभी वस्तुजात को शिवरूप अग्नि की ज्वाला में हवन से
शिवरूपत्व की उपलब्धि हो जाती है। इसलिये वेद्यों का हविष्ट्व-भावन और
शिव रूप में सर्व समर्पण का भाव उपासक व्यक्ति के लिये अनिवार्यतः
आवश्यक माना जाता है।।२६।।
एवमनुष्ठितभावनायाः फलमाह
निर्विषयचिद्विमृष्टिः फलम्।।२७।।
निर्विषयाया निर्विकल्परूपायाश्चितो विमृष्टिः फलम्। पूर्वोक्तभावनाया
इति शेषः।।२७।।
पौराणिक भगवान् शिव को सच्चिदानन्द कहते हैं। आगमिक चिदानन्दघन
कहते हैं। चित् निर्विकल्प रूप ज्ञान होता है।
आणव भाव में सविकल्पकात्मकता का प्रभाव होता है। जब उपासक
अणुता पर विजय कर आध्यात्मिक यज्ञ का होता बनकर इसे सिद्ध कर लेता
है, उस समय उसका चिद्विमर्श निर्विकल्पदशा का स्पर्श कर लेता है। यही इस
उपासना का फल है।।२७।।