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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 320 में से

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पृष्ठ 76

३४ परशुरामकल्पसूत्रम्
श्रीविद्योपासना में स्वीकृत विधियों के प्रतिपादक वाक्य समूह की ओर संकेत
करता है। यहाँ सिद्धान्त का सुनाना मात्र ही निर्दिष्ट है। अर्थबोधपूर्वक समझाने
की अपेक्षा एक संस्कार उत्पन्न करने के लिये शिष्य को सिद्धान्त श्रावण करे,
यही तात्पर्य है।।३४।।
अथ शाम्भवीदीक्षामाह
तच्छिरसि रक्तशुक्लचरणं भावयित्वा तदमृतक्षालितं
सर्वशरीरमलङ्कुर्यात् ।।३५।।
तच्छिरसि शिष्यस्य शिरसि। रक्तशुक्लचरणं, रक्तं कामेश्वर्या रजः-
स्वभावात्। तदुक्तं 'रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम्' इति। श्यामा-
रहस्येऽपि—
"रक्तं तु चरणं देव्या रजोरूपं प्रकीर्त्तितम्।
शुक्लं च तदधिष्ठानचरणं सात्त्विकं भवेत्।।"
एतेन शुक्लचरणमपि व्याख्यातम्। प्राण्यङ्गत्वादेकवद्भावः। भावयित्वा
ध्यात्वा। तदमृतं चरणसम्बन्धि यदमृतम् उदकं तेन क्षालितं नाशितं सर्वपातकं
यस्य। ईदृशं शिष्यं कुर्यात्। तस्य सर्वं यावच्छरीरं गन्धवस्त्रभूषणकुसुमादिभिः
गुरुः अलङ्कुर्यात्।।३५।।
शाम्भवी दीक्षा के लिये तैयार शिष्य के शिर पर रक्त-शुक्ल चरणों का
ध्यान गुरु करे। भावन क्रिया ध्यानमय होती है। शिर व्यक्ति का उत्तमाङ्ग होता
है। उसमें नादानुसन्धान से लेकर समनापर्यन्त समस्त शक्तियों का उल्लास होता
है। इसलिये शाम्भवी दीक्षा सदृश महत्त्वपूर्ण दीक्षा के लिये उसके शिरोभाग में
कामेश्वरी के रक्त और कामेश्वर के शुक्ल चरणों का भावन कर शिष्य के मस्तिष्क
चक्र को चरण चेतना की चिन्मयता से समन्वित करना आवश्यक होता है।
जहाँ तक रक्त चरण का प्रश्न है, आगम कहता है कि, "रजः स्वभाव
के कारण कामेश्वरी के चरण रक्तवर्णी होते हैं।"
साथ ही यह भी कहा गया है कि, "परा अम्बिका का ध्यान करते समय
माँ के चरणों की लाली में डूब जाना चाहिये"।