परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः २७
ननु किमीदृशफललाभेनेत्यत आह
आत्मलाभान्न परं विद्यते॥२८॥
आत्मलाभात् स्वरूपलाभात् परं श्रेष्ठं फलम् इति पूर्वसूत्रस्थम-
नुषज्यते। न विद्यते नास्तीत्यर्थः। “पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा
गतिः” इति ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति’ इति च श्रुतिः। इममर्थं
प्रतिपादयति। मोक्षः परमपुरुषार्थ इत्यत्र न कोऽपि विवादं करोति।
अतस्तादृशभावनया परमपुरुषार्थ इति भावः। पूर्वं “स्वविमर्शः पुरुषार्थः”
इत्यनेन पुरुषार्थस्वरूपं प्रतिपादितम् अत्र स्तुतिरिति न पौनरुक्त्यम्॥२८॥
इस जीवन में स्वात्म रूप ही विस्मृत हो चुका है। इसी की उपलब्धि
जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि मानी जाती है। स्वरूप लाभ से बढ़कर कोई लाभ
नहीं हो सकता। इसे ही निर्विषय चिद्-विमृष्टि शब्द के माध्यम से पूर्व सूत्र
में परिभाषित किया गया है। भगवती श्रुति कहती है—
“पुरुष से पर अर्थात् उसको अतिक्रान्त कर वर्त्तमान कोई नहीं है। पुरुष
सत्ता की अनुभूति सर्वातिशायिनी सीमा है और वही सर्वोत्तम गति भी है।”
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि, “उस परमेश्वर को इस रूप में जानने
वाला स्वयम् अमृत हो जाता है।”
ये दोनों उक्तियाँ इस सूत्र का समर्थन कर रही हैं। मोक्ष को परम पुरुषार्थ
कहते हैं। वह निर्विवाद तथ्यात्मक सत्य है। इस आधार पर यह कहा जा सकता
है कि, उक्त पुरुषार्थ भाव का भावन जीवन के चरम उत्कर्ष का साधक हो
सकता है। पहले स्वात्मविमर्श को पुरुषार्थ कहा गया है। यहाँ पुरुषार्थ के महत्त्व
का प्रतिपादन है, पुनरुक्ति नहीं है॥२८॥
अत्रायं सिद्धान्तः इत्यारभ्य प्रक्रान्तमर्थमुपसंहरति
सैषा शास्त्रशैली॥२९॥
सैषा पूर्वोक्ता शास्त्रशैली। शास्तीति शास्त्रं पञ्चाम्नायरूपं, तस्य शैली
रीतिर्भवतीति शेषः ॥२९॥
ऊपर निर्दिष्ट धर्मों का स्वरूप, उनका प्रतिपादन और उनके अनुसन्धान-
पूर्वक आचरण विज्ञान का सारा विस्तार शास्त्र की शैली मानी जाती है। शैली