परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीक्षाविधिः ३३
सर्वप्रथम करने योग्य सारे अङ्गों से समन्वित क्रम का प्रवर्तन कर लिया है।
शिष्य आ गया है। उसके नेत्र बाँध दिये गये हैं। अब उसे श्रीविद्योपासना के
सिद्धान्तों को सुनाना है।
सूत्रकार के निर्देशानुसार सर्वप्रथम गणपति, ललिता, श्यामा, वार्त्ताली,
और परा रूप उपास्यों के निर्धारित विशेषार्घ्य पात्र में रखे पवित्र जल-बिन्दुओं
से शिष्य को प्रोक्षित करते हैं। यह ध्यान देने की बात है कि, इनमें प्रधान
उपास्या माँ ललिताम्बा है। सूत्र में प्रयुक्त अङ्गशब्द क्रम का भी द्योतन करता
है। अङ्गक्रम के साथ ही प्रधान क्रम अपनाना उचित होता है।
इस अङ्ग क्रम के अनुसार प्रथम अङ्ग गणपति हैं। द्वितीय खण्ड के
आरम्भ में एक तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है। वहाँ लिखा गया
है कि,
“सद्गुरु द्वारा दीक्षा के लिये निर्देशानुसार स्वीकृत अनुशासन की योग्यता
से विभूषित और दीक्षा के लिये निर्धारित स्थान पर अवस्थित दीक्ष्य
श्रीविद्योपासना में आने वाले विघ्नों के निराकरण के लिये गणपति-क्रम-पद्धति
का स्वात्म परामर्श करे।”
इस निर्देश में यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि, विघ्नों के निराकरण
के लिये जो सबसे पहले स्वीकार्य होता है, वही प्रधान अङ्ग माना जाता है।
यह लोकसमर्थित दृष्टि है।
इसी तरह तृतीय खण्ड के आरम्भ में भी लिखा है कि, गणपति की
आराधना से उपासना में आने की सम्भावना वाले सारे विघ्नों का निराकरण
करने के उपरान्त समस्त शक्तिचक्र की एकमात्र नायिका सर्वेश्वरी भगवती
श्री माँ ललिताम्बा की उपासना का क्रम अपनाये।”
इस देशना में आने वाली पूर्वकालिक क्रिया के प्रत्यय से यह प्रतीत
होता है कि, गणपति-क्रम के बाद ललितोपासना का ही क्रम अपनाना चाहिये।
श्यामोपासना खण्ड में यह स्पष्ट उल्लेख है कि, “माँ ललिताम्बा के
प्रधान सचिव पद पर श्यामा ही प्रतिष्ठित हैं।” इस प्रकार अङ्ग की दृष्टि से
विचार करने पर अन्य सभी अङ्ग रूप से उपास्य हैं, यह स्पष्ट हो जाता है।
अन्त में सिद्धान्त श्रावण की प्रक्रिया अपनायी जाती है। सिद्धान्त शब्द