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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 320 में से

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पृष्ठ 81

दीक्षाविधिः ३९
त्रिकटु, त्रिफला, उशीर-इलायची-लवङ्ग-नागकेसर रूप चतुर्जात,
ताम्बूल-सहद्रव्य रूप तक्कोल, सहदेवी, दूर्वा, भस्म, मृत्तिका इन ओषधि रूप
द्रव्यों से वासित जल में चन्दन, कुङ्कुम, गोरोचन और कर्पूर मिलाकर तैयार
पवित्र जल से कलश को भर देना चाहिये। साथ ही दो लाल वस्त्रों से उसे
सजा कर उस कलश की पूजा करनी चाहिये। पूजा में पहला कार्य कलश का
संस्कार माना जाता है। कलश उसी समय संस्कृत होता है, जब उसे बालाषडङ्ग
मन्त्र से अभिमन्त्रित किया जाता है। इन मन्त्रों को मैंने संस्कृत टीका में कोष्ठक
में स्पष्ट कर दिया है। इनसे सभी पूर्वादि दिशाओं एवं अग्नि, ईशान, नैऋत्य
और वायुकोणों में भी पूजन का विधान है।
दूसरी पूजा प्रक्रिया चक्रपूजा है। श्रीविद्या-चक्र, श्यामा-चक्र और वार्त्ताली-
चक्र इन तीनों चक्रों की पूजा-पद्धति कलश के अतिरिक्त भूमि पर, पत्र पर
या यन्त्र पर करने की प्रक्रिया को भी मान्यता देती है। किन्तु सूत्रकार के अनुसार
चक्र पर पूजा कर चक्र कलश में ही स्थापित किया जाना प्रतीक बन जाता
है। उसी समय कलश पूजा पूरी होनी चाहिये।
इसके बाद ललिताम्बा, श्यामा और वार्त्ताली के आवरण मन्त्रों से
सचक्र, सवस्त्रवेष्टित जलपूर्ण कुम्भ की भी अर्चना सम्पन्न करनी चाहिये।
परम्परा के अनुसार चक्रोद्धार की भी क्रिया करते हैं। अस्त्रमन्त्र से विघ्नों
का अपसारण कर चक्र स्थान पर चक्रों को रख देते हैं। तदनन्तर धेनु-
मुद्रा और योनि-मुद्रा का प्रदर्शन करते हैं। धेनु-मुद्रा से आराध्या परमाम्बा
में वात्सल्य का उद्रेक होता है और योनि-मुद्रा से यह सिद्ध होता है
कि, माँ तू ही विश्व की मूल उत्स है। ये मुद्रायें स्तुतिपरक मुद्रायें मानी
जाती हैं।।३७।।
मातृकायन्त्रमाह
शिवयुक्सौवर्णकर्णिके स्वरद्वन्द्वजुष्ट-किञ्जल्काष्टके क च ट
त प य श लाक्षरवर्गाष्टियुक्ताष्टदले दिगष्टकस्थित ठं वं चतुरस्रे
मातृकायन्त्रे शिष्यं निवेश्य तेन कुम्भाम्भसा तिसृभिः विद्याभिः
स्नपयेत् ।।३८।।